शनिवार, फ़रवरी 20, 2010

अघोर साधना के मूल तत्व

" भग बिच लिंग, लिंग बिच पारा \
जो राखे सो गुरु हमारा \\ "

इस पूरी धरती में आदिकाल से ही मानव जीवन के प्रति मुख्यतः दो दृष्टिकोण प्राप्त होते हैं । एक तो वे लोग हैं जो जीवन को भोग का अवसर मानकर तद् अनुरुप आचरण करते हैं । वे किसी परमसत्ता के अस्तित्व को, जो धरती पर के समस्त क्रियाकलापों का संचालन करता हो, स्वीकार नहीं करते । उनका तर्क है कि परमसत्ता के अस्तित्व का ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जो सार्वकालिक होने के साथ ही निर्विवाद भी हो । यह लोगों के मन की कल्पना मात्र है । कुछ प्रबुद्धजनों ने अपना हित साधन के उद्देश्य से परमसत्ता के प्रति भय का वातावरण बनाया और अपने मन की कल्पना को जन सामान्य के हृदय में बड़े ही चतुराई से प्रतिस्थापित कर दिया है । दूसरे प्रकार के लोग परमात्म तत्व की सत्ता को न केवल स्वीकार करते हैं वरन् स्वयं को परमात्मा का अंश आत्मन् के रुप में मानकर आत्मा के परमात्मा में मिलन के लिये चेष्टा करते है, जिसे साधना कहते हैं । इसी भित्ती पर संसार के समस्त धर्म, सम्प्रदाय, आदि खड़े हैं ।

भारत में आदिकाल से ही निष्ठा के आधार पर साधकों, श्रद्धालुओं, भक्तों, संतों, महात्माओं को पाँच प्रकार में बाँटा गया है ।

१, शैव, जिनके आराध्य देव शिव जी हैं ।

२, शाक्त, जिनके आराध्य देव शक्ति हैं ।

३, वैष्णव, आराध्य देव श्री विष्णु हैं ।

४, गाणपत्य, जिनके आराध्य देव गणेश हैं ।

५, सौर, जिनके आराध्य देव सूर्य देव हैं ।

जो एकनिष्ठ देव आराधक नहीं हैं उनमें या विशेष प्रयोजनवस पँच देवोपासना भी प्रचलित है ।

अघोरपथ इनमें शामिल नहीं हैं, क्योंकि अघोरियों का कोई एक देवता आराध्य नहीं है । अघोर आश्रमों में सामान्यतः देवी मंदिर के अलावा शिव लिंग, गणेश पीठ, पाये जाते हैं । अघोरेश्वर भगवान राम जी ने विष्णु यज्ञ भी कराया था । सूर्य देव तो प्रत्यक्ष देवता हैं ही ।

इस विषय में अघोरेश्वर भगवान राम जी ने अपने आशीर्वचनों में कहा हैः

" हम लोग शैव और शाक्त दोनों के मत में रहने वाले हैं । हम लोगों का अनुष्ठान शैव और शाक्त के मध्य से चलता है । औघड़ न शाक्त होते हें न शैव होते हैं । इनका मध्यम मार्ग है । शक्ति की भी उपासना करते हैं और रुद्र की भी उपासना करते है । हमारी भगवती जिसकी हम आराधना करते हैं, श्री सर्वेश्वरी, काली, या दुर्गा, इनकी मूर्तियाँ वैदिक युग की नहीं हैं क्योंकि वैदिक युग में शिव के यंत्रों की आकृति है और उसे ही माना गया है । उस युग से पहले की हो सकती है या उस युग में भी हो सकती है । यह ब्राह्मणों के ध्यान की मूर्ति नहीं है । यह योगियों के ध्यान की मूर्ती है । "

अघोरी जाति, वर्ण, धर्म, लिंग, आदि किसी में भेद नहीं करते । अघोर दीक्षा के पश्चात क्रीं कुण्ड स्थल के महंथ बाबा राजेश्वर राम जी ने किशोर अवधूत भगवान राम जी को समझाया था ।

" हमारी कोई जाति नहीं, हम सभी धर्मों के प्रति आदर रखते हैं । हम छूआछूत में विश्वास नहीं करते । हम प्रत्येक मनुष्य को अपना भाई और प्रत्येक स्त्री को माता समझते हैं । मानव मानव में कैसा भेद, कैसा दुराव ? "

अघोरी, औघड़, अवधूत विधि निषेध से परे होते हैं ।

१, शिष्य का अधिकार

अघोर पथ में गुरु का स्थान सर्वोपरी हैं । अध्यात्म के अन्य क्षेत्रों में सामान्यतः शिष्य गुरु बनाता है , लेकिन अघोर पथ में ऐसा नहीं है । श्रद्धालु का , भक्त का, औघड़, अवधूत से निवेदन करने से दीक्षा, संस्कार हो जावे यह अवश्यक नहीं है । यहाँ गुरु शिष्य को चुनता है । हमें यह प्रक्रिया अन्य सिद्धों के मामले में भी दिखाई देती है । पूर्व में लाहिड़ी महाशय का चुनाव उनके गुरु बाबा जी ने किया था और अपने पास बुलाकर उन्हें दीक्षा देकर साधना पथ पर अग्रसर कराया था । स्वामी विवेकानन्द जी का चुनाव रामकृष्ण देव ने किया था । और भी अनेक उदाहरण हैं । स्पष्ठ है कि यह शिष्य के अधिकार की बात है । अनेक जन्मों के संचित सत् संस्कार जब फलीभूत होते हैं तो शिष्य का क्षेत्र , अधिकार, पात्र तैयार हो जाता है और दीक्षादान हेतु गुरु के हृदय में करुणा का संचार हो जाता है । इस प्रकार दीक्षा घटित होती है ।

शिष्य के अधिकार के अनुसार गुरू उसका संस्कार करते हैं ।

२, दीक्षा

पूर्व में दीक्षा संस्कार की चर्चा हो चुकी है । अघोरपथ में गृहस्थों को तथा अधिकार के अनुसार विरक्तों को भी साधक दीक्षा प्रदान होती है । योगी दीक्षा सम्पन्न साधु मुड़िया कहलाते हैं । हम यहाँ दीक्षा के प्रकार की चर्चा एक बार पुनः कर लेते हैं ताकि विषय स्पष्ठ रहे ।

अघोर पथ में दीक्षा दो प्रकार की होती है ।

"अ, योगी दीक्षाः

योगी दीक्षा की प्रक्रिया थोड़ी अलग होती है । योगी की कुण्डलिनी को गुरुदेव दीक्षा के समय ही जगा देते हैं । योगी को कुण्डलिनी शक्ति साकार इष्टदेवता के रुप में प्राप्त हो जाती है, बाद में अपने कर्मों के द्वारा उसकी आराधना शुरु करता है । योगी अधिक सामर्थवान होता है । उसे वासना का त्याग नहीं करना पड़ता । योगी वासनादि को निर्मल बनाकर अपनी निज स्वरुप में नियोजित कर लेता है । वह शरीर से भी इष्टदेवता का दर्शन करने में समर्थ हो जाता है । योगी जब पूर्ण सिद्ध हो जाता है तब उन्हें निर्मल ज्ञान मिलता है या सत्य का साक्षात्कार हो जाता है । वह अलौकिक शक्ति का अधिकारी बन जाता है । इसमें तीन प्रधान शक्तियाँ हैं इच्छा, ज्ञान और क्रिया । ज्ञान शक्ति से वह सर्वज्ञ तथा क्रिया के प्रभाव से सर्वकर्ता बन जाता है । इच्छा शक्ति के प्रभाव से योगी कोई भी कार्य कर सकता है । इस शक्ति के उदय होने से ज्ञान तथा क्रिया की आवश्यकता नही् होती पर योगी के इच्छानुसार कार्य होता है । अघोर पथ में दीक्षा संस्कार के समय गुरु अधिकारी शिष्य की कुण्डलिनी जगाकर तीन चक्र ! मूलाधार, स्वाधिष्टान और मणिपुर तक उठा देते हैं । इसके बाद उस योगी का ईष्ट साकार हो जाता है और फिर शुरु हो जाती है उनकी बिलक्षण आराधना ।"

ब, साधक दीक्षाः

दीक्षादान होने पर गुरुपदिष्ठ बीजमन्त्र साधक के हृदयदेश में स्थापित होता है तथा साधक के द्वारा गोपनीय विधियों के द्वारा शोधित और रक्षित होकर पुष्ट होता रहता है । समयकाल पाकर बीज आकार धारण करता है और बाद में यही सत्ता साकार इष्टदेवता के रुप में प्रकट होता है । योगी दीक्षा और साधक दीक्षा दोनो में ही कुण्डलिनी जागरण होता है । साधक दीक्षा में शक्ति का इतना संचार हो जाता है कि जैसे ही पुरुषाकार का योग होता है कुण्डलिनी जाग जाती है । बाद में गुरु प्रदत्त कर्म के समुचित सम्पादन से उक्त जाग्रत शुद्ध तेज प्रज्वलित होकर साधक के वासना, संस्कार आदि के आवरण को भस्म कर देता है । साधक का विकास होते होते अन्त में सिद्धावस्था आती है जब वासनादि समस्त कल्मशों का सम्पूर्ण रुप से क्षय हो जाता है और कुण्डलिनी शक्ति इष्टदेवता के रुप में प्रकट होती है, पर उस समय साधक का देह नहीं रहता । साधक में सिद्धि के आविर्भाव के साथ साथ देहान्त हो जाता है ।

अघोरपथ में साधना विषयक समस्त बातें गोपनीय होती हैं । दीक्षा की प्रणाली, मन्त्र, बिधि, क्रिया, ओषधि समस्त बातें व्यक्तिनिष्ठ होने के कारण उन तक किसी की भी पहुँच असंभव है । अधिकारी सन्त, महापुरुष जितना अपने प्रवचनों में बतला देते हैं वही ज्ञात हो पाता है । दीक्षा का मूल मन्त्र कहा गया है, अतः कुछ चर्चा मन्त्र की भी आवश्यक हो जाती है ।

३, मन्त्र

भारत में मन्त्र का एक अलग शास्त्र है । मन्त्र विज्ञान इतना उन्नत है कि जीवन के प्रत्येक क्रियाकलाप हेतु अलग अलग मन्त्र हैं । हम मन्त्र के विषय में विशद चर्चा पूर्व में कर चुके हैं अतः उसे दुहराना आवश्यक नहीं है ।

अघोरमन्त्र को समस्त मन्त्रों में सर्वोपरि बतलाया गया है और कहा गया है किः

" ॥ अघोरान्ना परो मन्त्रः नास्ति तत्वं गुरो परम् ॥"

शिष्य को गुरु, उसकी प्रकृति, अधिकार, शक्ति तथा इष्ट के अनुरुप मन्त्र दान करते हैं । इसीलिये गुरु प्रदत्त इस मन्त्र को इष्टमन्त्र या गुरुमन्त्र भी कहते हैं । यह मन्त्र शिष्य के हृदय देश में स्थापित होकर उसकी सिद्धी तथा मुक्ति का वाहक बनता है । इष्ट मन्त्र के अलावा प्रयोजन के अनुसार साधक अन्य अनेक मन्त्रों का भी प्रयोग करता है ।

अघोरेश्वर भगवान राम जी ने मन्त्र के विषय में बतलाया हैः

" मन्त्रों में किसी का नाम नहीं दिया गया है । ॠषियों ने उन मन्त्रों का दर्शन किया है, और उस दर्शन में उन शब्दों का, जिससे उसमें आकर्षण होता है । वह द्रवित होता है, और वह उस महान आत्मा की तरफ झुकता है । और उस महान आत्मा की तरफ झुक कर इतना तेज, इतना काँति, बल, पौरुष पा जाता है । उसके शरीर की रश्मियाँ, उसके शरीर की वह दिव्य, तेजोमय कान्तियाँ, जिसके शरीर में वह छोड़ता है, यह सब कुछ देता है । "

४, क्रिया

इस शरीर से विधिपूर्वक निश्चित उद्देश्य से किये गये काम को क्रिया कहते हैं । जप, हवन, तर्पण आदि कार्य इसके अन्तर्गत शुमार होते हैं । यह एक विशद विषय है । अघोरपथ में क्रियाएँ गुरु प्रदान करते हैं ।

५, औषधि

फूल, फल, दूब, पत्र, दुधुवा आदि औषधि के भीतर गिनी जाती हैं । हर एक वस्तु का अपना प्रयोजन है । मदिरा या दुधुवा का प्रयोग साधना की उच्चावस्था में कतिपय मानसिक दुर्बलताओं पर विजय पाने के लिये किया जाता रहा है, परन्तु अघोरेश्वर भगवान राम जी ने मदिरा का सेवन निषिद्ध कर दिया है ।

क्रमशः

शुक्रवार, फ़रवरी 12, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः किशोरवय के सहचर

अघोरेश्वर की लीला यत्र तत्र सर्वत्र शिष्यों, श्रद्धालुओं, भक्तों के हृदय में बिखरी पड़ी हैं । कुछ एक को शब्दों की माला में पिरोकर ज्ञानीजनों ने जन सामान्य के लिये सुलभ करा दिया है, परन्तु बहुत कुछ अभी बाकी है । अनेक लोग बाबा के सम्पर्क में आकर नाना प्रकार की अनुभूति से दो चार हुए हैं । बहुत कुछ देखा है, सुना है और उनकी प्रेरणा से किया भी है । बाबा प्रत्यक्ष में कुछ करते कभी नहीं दिखते थे । सब कुछ सामान्य ढ़ंग से होता रहता था, जिसे आप चमत्कार कहें या और कुछ और । बाबा की किशोरावस्था में जो लोग सम्पर्क में आये, उनमें से कुछ से यहाँ पर हम परिचय पाने का प्रयास करेंगे ।

बाबा कृष्णाराम अघोरी

अघोरेश्वर के प्रथम सहचर के रुप में आपकी चर्चा बहुत ही सीमित रुप में आती है । आप बहुत ही थोड़े समय तक ही बाबा के साथ देखे गये थे । आप उड़िया भाषी थे । उत्कल प्रदेश से दूर बनारस में किशोर अवधूत के साधनाकाल में उनकी सेवा में होना, साबित करता है कि कृष्णा राम जी सिद्धावस्था प्राप्त अघोरी थे । बाबा कृष्णा राम जी के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है क्योंकि आप हिन्दी नहीं बोलते थे, या शायद हिन्दी नहीं जानते थे, अतः अन्य श्रद्धालु, भक्तों से आपका सम्पर्क नहीं हो पाया । आपके नाम के साथ राम लगा है अतः निश्चित रुप से आप किनारामी परम्परा के औघड़ थे । किशोर अवधूत की गुण्डी तथा बगवाँ यात्रा के समय वहाँ के लोगों ने आपको देखा था । उनकी स्मृति में आप भाषा के कारण ही जगह पा गये । बनारस के भक्तों ने आपकी कभी चर्चा नहीं की है । उक्त एक यात्रा के बाद आपको कभी, कहीं, किसी ने नहीं देखा ।

श्री केदार सिंह उर्फ फोकाबीर

श्री केदार सिंह जी, जिन्हें अघोरेश्वर प्यार से फोंकाबीर कहते थे, बाबा के समर्पित भक्तों में अन्यतम थे । आपका निवास ईश्वरगंगी, बनारस में था । अधिक वय वाले फोकाबीर को बाबा ने अपनी किशोरावस्था में, जब वे कठिन साधना में लगे थे, सखा के रुप में स्वीकार किया था । श्री केदार सिंह जी और अघोरेश्वर बहुत काल तक साथ साथ रहे हैं । उन दिनों आप दोनों की सवारी सायकिल हुआ करती थी । फोकाबीर की सायकिल की पिछली सीट पर बैठकर बाबा बहुत घूमें हैं । केदार सिंह युवावस्था तक प्रकृति से उदण्ड माने जाते थे । स्कूल में उनका जी नहीं लगता था । ठाकुर होने का दम्भ तो उनमें जीवनपर्यन्त रहा । अघोरेश्वर के सानिध्य में आने के पश्चात श्री केदार सिंह में जो परिवर्तन उनके परिचितों, जानकारों ने देखा वह आश्चर्यजनक था । लोहा जैसे पारस का स्पर्ष पाकर सोना बन चुका था । श्री दयानारायण पाण्डेय जी ने श्री केदार सिंह का साक्षात्कार के आधार पर " औघड़ की गठरी" नामक एक पुस्तक का प्रणयन किया है, जिसमें हम अघोरेश्वर के इस कृपापात्र के भीतर के भावों के विशाल भंडार से साक्षात्कार कर सकते हैं । इस पुस्तक में फोकाबीर जी ने उन्मुक्त भाव से अपने गुरु अघोरेश्वर के विषय में विस्तार से बतलाया है ।
श्री केदार सिंह जी की धर्मपत्नि का नाम श्रीमति लक्ष्मी देवी है । अघोरेश्वर लक्ष्मी देवी जी को अपना पुत्री मानते थे । कई अवसरों पर लक्ष्मी देवी के मानसिक संकल्पों को अघोरेश्वर ने परोक्ष से जानकर भी पूर्ण किया है । लक्ष्मी देवी पति के प्रति पूर्णतया समर्पित नारी थीं । इस दम्पत्ति की करुणा की मिशाल नहीं मिलती । एक भक्त की सन्तान विव्हलता देखकर अपने गर्भ का भ्रूण दान कर उसकी बंध्या पत्नि को पुत्रवती बनाकर स्वयं निःसंत्तान की स्थिति का वरन करना त्याग की पराकाष्ठा है ।

श्री केदार सिंह जी का देहावसान ६ जनवरी १९९१ को हुआ था । अघोरेश्वर उस समय अमेरिका में अपना इलाज करवा रहे थे । अपने सखा, शिष्य श्री केदार सिंह जी की अंतिम यात्रा हेतु अघोरेश्वर बिना किसी को सूचना दिये अमेरिका से आ जाते हैं । यह गुरु अघोरेश्वर भगवान राम जी की प्रत्यक्ष सर्वज्ञता है, जो उन्हें ६ जनवरी १९९१ को बनारस ले आती है ।

क्रमशः

शनिवार, जनवरी 30, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः आश्रम योजना

आदि आश्रम हरिहरपुर
मुगलसराय से पूरब दिशा में जी. टी. रोड पर एक किलोमीटर की दूरी पर अलिनगर नाम का एक शहर है । अलिनगर से एक पक्की सड़क सकलडीहा तक जाती है । सकलडीहा चौमुहानी से उत्तर लगभग एक डेढ़ किलोमीटर पर हरिहरपुर आश्रम अवस्थित है ।
सन् १९५३ ई० में बाबा महड़ौरा श्मशान में साधनारत थे । मनिहरा ग्राम के ठा. देवी सिंह के आग्रह पर मनिहरा ग्राम में तालाब के तट पर फूस की झोपड़ी में कुछ दिन निवास किये थे । उनकी आयु उस समय मात्र सोलह बरस की ही थी । उनकी ख्याति की सुगन्ध निकट के गाँव ताजपुर तक पहुँची, जो मनिहरा से लगभग २ कि. मी. दक्षिण में अवस्थित है । फिर क्या था ताजपुर निवासी ठा० मुक्तेश्वर सिंह, ठा० श्यामधाता सिंह, ठा० कालिका प्रसाद सिंह , ठा० मेवा सिंह आदि कई श्रद्धालु महाप्रभु के दर्शन के लिये मनिहरा पहुँच गये । इन श्रद्धालुओं के अर्जी बिनती करने पर बाबा ताजपुर में निवास हेतु आश्रम बनाना स्वीकार कर लिये परन्तु जब वे लोग सब बाबा के साथ ताजपुर के लिये चले तो रास्ते में हरिहरपुर का वह स्थल दिखाई पड़ा, जहाँ तीन चार बेल और कुछ आम और महुआ के पेड़ खड़े थे । बेल बृक्ष के पास ही एक कुआँ भी था । लोगों ने बताया कि अंधेरा पड़ने के बाद गाँव के निवासी भूत परेत के डर से इस स्थल के समीप से भी नहीं गुजरते हैं । अघोरेश्वर ने स्थल का निरीक्षण कर वहीं रहने का निर्णय सुना दिया । स्थल की सफाई कर सर्वप्रथम फूस का एक घर बना दिया गया और कुएँ का जीर्णोद्धार कर दिया गया ।
इस प्रकार आदि आश्रम हरिहरपुर का निर्माण हो गया । अघोरेश्वर इस आश्रम में लगभग नौ वर्षों तक अनुष्ठान, साधना करते रहे हैं । वे यहाँ से बनारस बराबर जाया करते थे । उन दिनों किसी को भी आश्रम में रात में रहने की आज्ञा नहीं होती थी ।
अघोरेश्वर के हरिहरपुर आश्रम के प्रवास काल में श्रावण मास में आश्रम की छटा निराली रहती थी । भारत भर से बिशिष्ट कोटी के कलाकार आश्रम में आते और अपने नृत्य संगीत से महाप्रभु की आराधना करते थे ।
जनसेवा अभेद आश्रम, चिटक्वाइन, नारायणपुर, जिला जशपुर
जशपुर नगर से दक्षिण दिशा में रायगढ़ रोड पर लगभग ३० किलोमीटर के बाद एक तिराहा आता है । वहाँ से पक्की सड़क पश्चिम में बगीचा जनपद की ओर जाती है । आठ दस किलोमीटर पर नारायणपुर गाँव अवस्थित है । आश्रम इस गाँव के उत्तर में चिटक्वाइन गाँव की सीमा में बना है । इस आश्रम की जमीन एवं खेती योग्य भूमि महाराजा विजयभूषण सिंह जू देव, जशपुरनगर ने दान में दी थी । आश्रम में पूर्ण तान्त्रोक्त बिधि से देवी पीठ का निर्माण अघोरेश्वर ने कराया है । निवास हेतु भवन एवं अन्य साधन जुटाये गये हैं । बाबा ने इस आश्रम में अनेक अनुष्ठान कर इस पीठ को जागृत कर दिया है । यहाँ समय, काल से अनुष्ठान , पूजन करने से सिद्धी लाभ आवश्यम्भावी है ।
ब्रह्मनिष्ठालय, सोगड़ा आश्रम
जशपुर जनपद के उत्तर में लगभग तेरह किलोमीटर पर सुरम्य वादियों में यह आश्रम अवस्थित है । सदाशिव के उपर बैठी हुई भगवती की प्रतिमा पूरे संसार में अकेली है । गुरुघर यन्त्रवत बहुकोणीय है । नीचे साधना हेतु गुफा है । अघोरेश्वर की यह प्रिय साधना स्थली रही है । इस आश्रम में देश के अनेक शिर्षस्थ अधिकारी, नेता, मनस्वी, तपस्वी, सिद्ध, महात्मा एवं साधक अघोरेश्वर का सानिध्य लाभ के लिये आते रहे हैं । बाबा जी ने बहुत काल तक इस आश्रम में निवास किया है, साधना, अनुष्ठान किया है । दक्षिण दिशा के अनेक साधकों को इसी आश्रम में बाबा का अनुग्रह प्राप्त हुआ है । इस लेखक को भी बाबा के चरण में शरण इसी स्थल में प्राप्त हुआ था ।
इस आश्रम के चारों ओर सैकड़ों एकड़ की खेती है । आश्रमवासी खेती करते हैं, खुद भी खाते हैं और आगत, अभ्यागत को भी खिलाते हैं ।
आश्रम के उत्तर में देवीबिहार नामक पर्वत है । इस पर्वत पर अघोरेश्वर ने भैरव जी का स्थान बनाया है, जहाँ बैशाख शुक्ल चतुर्दशी की निशा रात्रि में पूजन होता है और बली दी जाती है ।
अघोरपीठ वामदेवनगर, जशपुर
जशपुरनगर से तीन किलोमीटर पूरब रायगढ़ जाने वाली सड़क पर "गम्हरिया" नामक एक गाँव है । पुरातन काल में इस गाँव में महाराजा विजयभूषण सिंह जू देव का भण्डार हुआ करता था, जिसे उन्होने अघोरेश्वर को दान कर दिया । उसी गम्हरिया गाँव के टीले पर बाबा का आश्रम स्थापित है । अब यह आश्रम जशपुर नगरपालिका की सीमा में आ गया है । शहर से समीप होने के कारण शहरवासी बहुतायत में इस आश्रम का लाभ लेते हैं । श्री मोरार जी देसाई, जब भारत के प्रधान मन्त्री थे, इसी आश्रम में बाबा से भेंट किये थे । आश्रम भवन चतुष्त्रिकोणाकार बना है । मंदिर के ठीक बाहर भैरव जी बिद्यमान हैं । मुख्य भवन के पीछे एक दो औघड़ों की समाधियाँ हैं । आश्रम में एक वैद्यशाला तथा एक औषधि निर्माणशाला है ।
अवधूत भगवान राम कुष्ठ सेवा आश्रम, पड़ाव, वाराणसी
श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना के पश्चात यह निश्चय हुआ कि संस्था का कुछ कार्यक्रम भी होना चाहिये । बाबा बोले कि देखो, परिवार के लोग भी कुष्ठी बन्धु को घृणा की दृष्टि से देखते हैं, समाज के हर वर्ग के लोग तो उनसे घृणा करते ही हैं । तुम लोग कुष्ठी बन्धुओं की सेवा करो। उनका उपचार करो । उन्हें आरोग्य करो ।
बाबा उस समय हाजी सुलेमान के बगीचे में रह रहे थे । कुष्ठ सेवा के लिये सेवाश्रम बनाना था अतः भूमि की आवश्यकता पड़ी । बाबा के एक भक्त ईश्वरगंगी के श्री कमाल साहू जी की नौ डिसमिल भूमि गँगा जी के उस पार पड़ाव नामक स्थान पर थी , जिसे वे अघोरेश्वर को दान करना चाहते थे । अघोरेश्वर को वह भूमि पसन्द आ गयी । श्री कमाल साहू जी के प्रयत्न से आसपास की कुछ और जमीन प्राप्त हो गयी । दो मास के भीतर कुष्ठ सेवाश्रम के लिये आउटडोर विभाग का भवन बनकर तैयार हो गया । दिनांक १० मई सन् १९६२ ई० को भवन का उदघाटन हुआ और रोगियों की चिकित्सा का कार्य भी शुरु हो गया । बाद में धीरे धीरे करके साठ बिस्तरों वाला विशाल अंतर्कक्ष बनकर तैयार हो गया, जहाँ कुष्ठ रोगियों के लिये हर आधुनिक सुविधा की व्यवस्था की गई ।
कुष्ठ सेवाश्रम का बाद में बहुत विस्तार हुआ । आश्रम परिसर में अघोरेश्वर के लिये सर्वेश्वरी निवास बना । सर्वेश्वरी मंदिर बना । श्री सर्वेश्वरी समूह का प्रधान कार्यालय लाया गया । शिशुओं के लिये " अवधूत भगवान राम नर्सरी विद्यालय " की स्थापना हुई । अतिथि कक्ष बना । अघोरी प्रेस की स्थापना हुई । औषधि निर्माण शाला बना ।
यह आश्रम अघोरेश्वर का स्थायी निवास बन गया ।
अन्य आश्रम
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, राय बरेली ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, रेणुकूट, जिला मिरजापुर ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, बलरामपुर, गोंडा ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, भुजौना, बिलथरा रोड, बलिया ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, डाल्टेनगंज, पलामू ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, नगर उँटारी, पलामू ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, धनबाद ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, लेक रोड, राँची ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, मानगो , जमशेदपुर ।श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, सिमडेगा , राँची ।
श्री सर्वेश्वरी समूह प्रार्थनागृह, गुमला, राँची ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, घाघरा, राँची ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, सोनुमूड़ा, रायगढ़, छत्तीसगढ़ ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, भाटापारा, रायपुर ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, जगदलपुर, बस्तर ।
इसके अलावा भारत के अन्य अनेक प्रदेशों में भी श्री सर्वेश्वरी समूह की शाखाएँ, आश्रम स्थापित हैं ।
क्रमशः

रविवार, जनवरी 24, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः श्री सर्वेश्वरी समूह










बाबा जी क्रींकुण्ड स्थल से निकलने के बाद से ही बनारस में अनेक स्थानों पर घूमते रहते थे । उनकी यात्रा कहीं ठहरती नहीं थी । आज इस जगह तो कल दूसरी जगह । मौज के दिन थे । जिधर मन किया निकल लिये । बन्धन कुछ था नहीं । बन्धन उन्हें स्वीकार भी नहीं था । इसी बीच आदि आश्रम हरिहरपुर का निर्माण भी हो गया था । वहाँ भी जाना होता था । जशपुर के आश्रमों के निर्माण के पश्चात कभी कभी वहाँ भी चले जाते थे । नवरात्री का अनुष्ठान प्रायः सोगड़ा आश्रम में होता था । बाबा बनारस में रहते थे तो १९५५, ५६ तक कोई एक ठिकाना नहीं था । पहले तो काशी के उत्तरी छोर पर ईश्वरगंगी के अखाड़े में कई साल तक छेदी बाबा के साथ अघोर साधना में रत रहे । औघड़ छेदी बाबा के निधन हो जाने के बाद पूना स्टेट के बाग में चले गये । उसके बाद राय पनारु दास के नाटी इमली वाली शीशे की बारादरी में ४ , ५ साल तक स्वच्छन्द रुप से अनुष्ठान और साधना करते रहे । यहाँ पर सत्संग और साधना में विश्वनाथ मंदिर के महँत लक्ष्मीशँकर तथा राय साहब का साथ बना रहा । यहीं पर काशी के एक मुसलमान भक्त हाजी इमामीसुलेमान मियाँ आपके सम्पर्क में आये । महँत लक्ष्मीशँकर जी के स्वर्गवास के उपराँत भक्त सुलेमान मियाँ के अनुरोध पर आपका आसन मंडुआडीह स्थित उनके बाग में लगा । यहाँ पर आप लम्बे समय तक रहे । बीच बीच में आप हरिहरपुर, सोगड़ा, नारायणपुर, तथा वामदेवनगर आदि आश्रमों में जाते रहे, परन्तु काशी लौटकर आप यहीं आते थे ।
श्रद्धालुओं और भक्तों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी । हर समय ५०,६० लोग आसपास रहते थे । कीर्तन भजन चलता रहता था । बातें भी होतीं रहतीं । बाबा के सम्मुख नाना प्रकार के प्रस्ताव रखे जाते । पूजा अर्चना यज्ञ आदि की चर्चा होती ही रहती थी । सन् १९६१ ई० के मध्य से ही भक्तों ने बाबा से निवेदन करना शुरु कर दिया था कि धर्म, जाति, राजनीति की कलुशता से मुक्त स्वच्छ और सार्वभौम मानव हितकारी भावनाओं एवं व्यवहारों से प्रेरित एक सँस्था होनी चाहिये । इस सँस्था निर्माण हेतु हाजी इमामीसुलेमान मियाँ भी भक्तों के साथ थे और अनुरोध करते रहते थे ।
अघोरेश्वर भगवान राम जी को भक्त लोग अब बाबा के अलावा सरकार भी कहने लगे थे । कोई कोई मालिक कहकर भी सम्बोधित करता था ।
सरकार मान गये । प्रत्यक्ष में तो भक्तों को यही लगा कि उनका प्रस्ताव सरकार ने स्वीकार कर लिया, परन्तु सत्य कुछ दूसरा ही था । बाबा बहुत पहले से ही परिस्थितियों को सँस्था निर्माण के लिये अनुकूल बनाते जा रहे थे । इसी क्रम में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तदनुसार जून १९६१ ई० को सरकार के आदेश से मड़ुवाडीह स्थित हाजी सुलेमान के बगीचे में ही , जहाँ आप निवास करते थे, सभी शाखाओं के लगभग तीस वैदिकों ने एकत्र होकर बसन्त पूजा की थी । बाद में निर्णय हुआ कि २१ सितम्बर सन् १९६१ ई० को सँस्था की स्थापना की जायेगी । सँस्था का नाम रखा गया "श्री सर्वेश्वरी समूह"
२१ सितम्बर सन् १९६१ ई० को श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना बड़े ही धूमधाम से की गई । हाजी सुलेमान के बगीचे में जहाँ सरकार का निवास था, सुबह से ही चहल पहल शुरु हो गयी थी । दोपहर बाद पँडित रामधारी शास्त्री जी ने स्थापना पूजन हेतु तैयारी शुरु कर दिया । श्री लल्लू सिंह जी एडवोकेट यजमान बने । उनके यजमान बनने की भी दिलचस्प कथा है । श्री लल्लूसिंह जी के शब्दों में हुआ कुछ इस प्रकार थाः
" शाम को साढ़े सात बजे हाजी सुलेमान के बगीचे में पहुँचा । देखा कि बगीचे में तमाम गाना बजाना , जलसा हो रहा है ।
बाबा को प्रणाम किया तो उन्होने कहा , " जा मामाजी से भेंट कई ल, ताहरा लायक कउनो काम होई त ऊ बता दिहें ।"
मैने जाकर मामाजी को प्रणाम किया और कहा कि मेरे लायक कोई काम हो तो बता दीजिये । उन्होने कहा कि सब कुछ है । बस पूजा का कलश नहीं है । मैंने कहा फिर सोच लीजिये । लाइन पार करके रात को नौ बजे हम जायेंगे । फिर ऐसा न हो कि कोई चीज छूट जाय । देखकर उनने कहा, बस, पूजा का कलश ले आइये । मैं गया । रात को साढ़े नौ बजे पूजा का कलश लाकर रख दिया । हमारे पंडित अंजनीनंदन मिश्र के मित्र रामधारी शास्त्री जी पूजा का संचालन कर रहे थे । साढ़े बारह बजे रात को उन्होंने बाबा से जाकर कहा, " बाबा कोई ऐसा व्यक्ति दीजिये जिसके हाथों से सँस्था को प्राण दिया जावे ।"
बाबा बोले, " हमरा ओकील के बुलाव ।"
गये तो बाबा बोले, " ई पंडित जी जौन कहें, तौन कुल कर दिह ।"
पंडित जी ले गये । उन्होंने हवन, पूजन, संकल्प सब कराया । उनकी आज्ञा से हमने अपने जीवन की प्रथम और आखिरी बलि भी वहाँ दी । श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना हो गई । उसके बाद पूज्य अघोरेश्वर अध्यक्ष, महाराजा जशपुर और महारानी जशपुर उपाध्यक्ष, लल्लूसिंह मंत्री, श्यामनारायण पाण्डेय संयुक्त मंत्री, भैयालाल सर्राफ कोषाध्यक्ष बने । सँस्था का लखनऊ में रजिस्ट्रेशन करवाकर, सन् १९६१ में ही ले आये । सँस्था रजिस्टर हो गई और हाजी सुलेमान के बगीचे में संस्था का प्रथम कार्यालय स्थापित हुआ । बाबा की आज्ञा से २१६४ नंबर का टेलीफोन उसी स्थान पर लगवाया गया । "










सँस्था रजिस्टर हो जाने के बाद बाबा ने समूह के पदाधिकारियों से बोले कि संस्था बन गई है तो उसका कार्यक्रम भी होना चाहिये । उन्होंने आगे कहा कि देखो, परिवार के लोग भी कुष्टी बन्धु को घृणा की दृष्टि से देखते हैं , समाज के हर वर्ग के लोग तो उनसे घृणा करते ही हैं । तुम लोग कुष्टी बन्धुओं की सेवा करो । उनका उपचार करो । उन्हें आरोग्य करो ।
इस प्रकार श्री सर्वेश्वरी समूह का संगठन हो गया ।
क्रमशः

रविवार, जनवरी 17, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः जशपुर नरेश महाराज बिजयभूषण सिंह जू देव

भारत में छत्तीसगढ़ प्रदेश के उत्तर पूर्वी कोने में झारखण्ड प्रदेश की सीमा में एक स्टेट हुआ करता था । अब यह राजस्व जिला बन गया है । यह पहाड़ों और जँगलों वाला स्टेट था । इस स्टेट में मुख्यतः आदिवासी निवास करते थे । इस स्टेट की राजधानी जशपुर नगर में थी । जशपुर नगर चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा छोटा, परन्तु सुन्दर सा शहर है । शहर के बीचों बीच राजा का पुराना महल जीर्णावस्था में अब भी खड़ा है । पुराने महल का सामने का हिस्सा ठीक ठाक कराकर कुछ दुकान, एक बैंक, तथा एक दो सरकारी कार्यालयों हेतु किराये पर दिया गया है । राजपरिवार अब नये महल में रहता है । इस अँचल में आज भी राजपरिवार का वही पुराना मान सम्मान देखा जाता है ।
भारत सँघ में राज्य बिलीनीकरण के समय इस स्टेट के राजा की गद्दी पर महाराज विजयभूषण सिंह जू देव आसीन थे । अब वे स्वर्गवासी हो चुके हैं । राजा साहब धर्मपरायण एवं चरित्रवान व्यक्ति थे । महाराजा साहब की सहधर्मिणी महारानी जयकुमारी देवी उदारमना, धर्मकर्म में आस्था रखने वाली सहृदय महिला हैं ।
अघोरेश्वर भगवान राम जी , जिन्हें अब हम बाबा कहेंगे, का जशपुर आगमन अलग अलग व्यक्तियों को अलग अलग अनुभवों से गुजरने का मौका प्रदान कर दिया । जशपुर नगर के गणमान्य नागरिकों में से एक श्री नूना बाबू ने " अघोरेश्वर का सानिध्य मेरे संस्मरण" नामक पुस्तक में , जो श्री सर्वेश्वरी समूह द्वारा प्रकाशित कराया गया है, अपने अनुभवों, श्रद्धा एवं भक्ति को बड़े ही सजीव ढ़ंग से संजोया है ।
"१९५५ ई० की बात है । स्वर्गीय महाराजा विजय भूषण सिंह जू देव विंन्ध्यवासिनी देवी के मंदिर में सहस्त्र चण्डी यज्ञ के अनुष्ठान हेतु विन्ध्याचल में ठहरे हुए थे । यज्ञ का कार्यक्रम चल रहा था । इसी बीच किसी ने उन्हें सूचित किया कि एक महान तेजस्वी संत निकटस्थ एक गुफा में टिके हुए हैं । जिनके दर्शनार्थी, श्रद्धालु, भक्त बहुत बड़ी संख्या में प्रतिदिन उपस्थित हो रहे हैं । स्वर्गीय महाराजा को भी उस संत के दर्शन की तीव्र इच्छा हुई और वे शीघ्र ही गुफा के पास पहुँच गये । उस समय गुफा के बाहर पाँच सात व्यक्ति बैठे हुए थे । उन्होने बतलाया कि उस समय अवधूत महाराज गुफा के भीतर विश्राम कर रहे थे । काफी समय बीत जाने पर भी जब अवधूत महाराज गुफा से बाहर नहीं निकले, तब स्वर्गीय महाराज ने अपने एक सेवक को गुफा के बाहर इस निर्देश के साथ बिठा दिया कि जैसे ही अवधूत महाराज बाहर निकलें महाराज को तत्छण सूचना दी जाय, ताकि वे वहाँ यथाशिघ्र पहुँच सकें । सेवक ने महाराज के आदेश का अक्षरशः पालन किया । वाँक्षित सूचना मिलते ही स्वर्गीय महाराज वहाँ पहुँच गये और अघोरेश्वर महाप्रभु का दर्शन कर अत्यंत ही भाव विभोर हो गये । जब तक महाप्रभु वहाँ निवास किये, स्वर्गीय महाराजा साहब प्रतिदिन नियमित रुप से वहाँ जाते, दर्शन करते और अपनी अटूट श्रद्धा निवेदित कर, महाप्रभु से अनुनय विनय करते । उनकी अगाध श्रद्धा और एकान्त प्रेम भाव को समझकर एक दिन परमपूज्य....बाबा ने निम्नांकित शब्दों में अपनी स्वीकारोक्ति दे दीः
" एक बार रउवा इहाँ जशपुर जायेब । "
वापस आकर महाराजा साहब ने अपने सेक्रेटेरी ह्रषिकेश मिश्र को कार से बाबा को जशपुर लाने के लिये भेजा । बाबा जशपुर आए ।
इसके अलावा जशपुर राज के राज ज्योतिषी परिवार की बहू स्वर्गीया श्रीमति सावित्री महापात्र, जो बाबा की आरम्भिक दिनों के शिष्यों में से एक थीं , ने इस लेखक को बाबा के प्रथम जशपुर आगमन का विवरण निम्नाँकित शब्दों में सुनाया था ।
"मैं नयी नयी शादी होकर जशपुरनगर आई थी । उस समय बहुएँ घर से बाहर नहीं निकलती थीं । मंदिर जाने के नाम पर जशपुर नगर को थोड़ाबहुत ही देख पाई थी । एक दिन शाम के समय डौँडी पिटाने लगा । महाराजा का कारिंदा डौंडी पीटने वाला जोर जोर से चिल्ला रहा थाः "सुनो, सुनो, सुनो । हर आम ओ खास के लिये सूचना । महाराजा साहेब एक औघड़ को पकड़ कर लाये हैं । औघड़ को शिव मंदिर में रखा गया है ।" औघड़ शब्द मेरे लिये नया नहीं था । उस जमाने में औघड़ से सभी डरते थे । इस इलाके में औघड़ द्वारा दारु, गाँजा, भाँग आदि का सेवन करने , कच्चा माँस खाने, जटा से दूध या पानी निकाल देने तथा नाराज हो जाने पर किसी का भी बुरा कर देने की कितनी ही कहानियाँ कही सुनी जाती थीं । औघड़ शब्द ही लोगों को भयभीत करने के लिये काफी होता था । डौंडी पिटाने के समय से ही मेरा मन व्याकुल हो उठा था । एक अजीब तरह का आकर्षण अनुभव हो रहा था । मैं औघड़ को देखने के लिये उतावली हो रही थी , परन्तु पारिवारिक मर्यादा मेरा पाँव बाँधे रही । उस रात और दूसरा पूरा दिन मैं बैचेन रही । मेरे पतिदेव को साथ चलने के लिये बड़ी मुश्किल से तैयार कर सकी । ये साथ जा रहे थे इसलिये सासु माँ को मनाना आसान हो गया । वे भी साथ हो लीं ।
दूसरे दिन साँझ के समय हम लोग शिव मंदिर गये । मंदिर में आज और दिनों से ज्यादा चहल पहल दिखी । मंदिर के बरामदे में पूरब तरफ कोने में एक कम्बल बिछा हुआ था, और उस पर एक दुबला पतला सा लड़का बैठा था । उनकी आयु उस समय लगभग १७ या १८ वर्ष की रही होगी । उनके शरीर पर कपड़े के नाम पर एक लंगोटी भर थी, बाकी शरीर में भस्म रमा हुआ था । हाथ पाँव लम्बे थे । बड़ी बड़ी आँखों में एक अजीब सा आकर्षण था । आँखें लाल, दृष्टि भेदक थी । मुखाकृति तेज से दप दप कर रहा था । उनके चेहरे पर ज्यादा देर आँखें ठहरतीं नहीं थीं । सामने हुक्का रखा था । बगल में मदिरा के एक दो बोतल इधर उधर लुढ़के पड़े थे ।
हम लोगों ने दूर से ही प्रणाम किया । बाबा जी ने मुझे घूरकर देखा फिर उनकी गम्भीर वाणी निनादित हुईः "कुछ कहना है, माता जी ? " मैं चुप रही । उस दिन हम लोग इसके बाद घर लौट आये ।

महाराजा साहब का बनारस जाना होता ही रहता था । वे जब भी बनारस जाते बाबा का पता करवाते और उनके दर्शन के निमित्त अवश्य ही जाते थे । महाराजा साहब बाबा को यदाकदा अनाज आदि भेंट स्वरुप भेजा करते थे । अघोरेश्वर बाबा भगवान राम जी ने एक बार बतलाया थाः
" ईस्वी सन् १९६० तक न मालुम कैसे उस "अज्ञात" ने अकस्मात स्थान स्थान पर अपार लोगों के साथ, सम्बन्ध तारतम्य जोड़ दिया । तब से अन्नपूर्णा के आगमन का एक न एक श्रोत बराबर उपलब्ध रहा । इसे अनवरत प्राप्ति नहीं भी कहा जाय तो अपर्याप्त भी नहीं कहा जा सकता । इसी अवधि में, एक दिन जिस ग्राम के बाहर बाटिका में निर्मित कुटी में निवास करता था वहीं पर भूतपूर्व जशपुर नरेश, स्वर्गीय राजर्षि श्री विजय भूषण सिंह देव ने सर्व प्रथम एक बैलगाड़ी में लदा हुआ चावल, गेहूँ, दाल इत्यादि सामग्रियाँ पहुँचा दी । अब क्या पूछना था । बहुतेरे अतिथि आने लगे । एक दूसरे के यहाँ कमीबेशी होने पर मेरे यहाँ से याचक बनकर ले भी जाने लगे । यह कारवाँ भी धीरे धीरे चलता रहा ।"
तीन चार बरस इसी प्रकार बीत गये । महाराजा बनारस जाते , बाबा से भेंट होती । बाबा भी दो तीन बार महाराजा साहब का निवेदन स्वीकार कर जशपुर आते थे । बाबा को जशपुर आने पर पैलेश में ठहरना होता था । उन्हे यह ठीक नहीं लगता था । वे महाराजा से कहतेः " महाराजा साहेब! हमरा के कहाँ जेल में बन्द कर देलन । " महाराजा विजय भूषण सिंह जू देव का मन जशपुर के निवासियों , अपनी प्रजा के लिये बैचैन था । वे चाहते थे कि कुछ ऐसा हो कि बाबा ज्यादा से ज्यादा समय तक जशपुर में रहें । सितम्बर सन् १९५९ ई० को महाराजा साहेब ने बाबा को दो गाँव दान देने हेतु कागज तैयार कराकर अपने सेक्रेटेरी के हाथों बनारस भेजे । दो दिनों के बाद उनके सेक्रेटेरी बनारस से लौट कर बतलाये कि उन कागजात को देखकर बाबा बहुत अप्रसन्न हुए और कागज को फैंकते हुए बोलेः " हमरा के महाराज गृहस्थ बनावे चाहतारन ।"
निकट बैठे हुए बाबा के भक्तों ने समझाया तो बाबा ने कागज अपने पास रख लिये और बोलेः " महाराजा साहेब हमरा के ई सब काहे देले बारन ऊ सब हम समझ गइलीं ।"
उन दो गाँवों में एक था लोदाम के पास "ढ़ौठा टोली" और दूसरा गाँव था नारायण पुर गाँव से लगा हुआ " चिटक्वायन" ग्राम । सन् १९६० ई० में बाबा ने चिटक्वायन गाँव में अपना आश्रम बनवाया, और उसका नाम रखा " जनसेवा अभेद आश्रम" । अघोरेश्वर जी ने इस आश्रम को तन्त्रपीठ के रुप मे विकसित किया है । आश्रम प्राँगण में देवी की स्थापना पूर्ण तन्त्रोक्त विधि से की गई है । दक्षिण दिशा से कई तान्त्रिक आकर इस पीठ पर तंत्र साधना करते एवं सिद्धी लाभ करते हैं ।
इसी साल महारानी जयकुमारी देवी, जशपुर जी ने जशपुर नगर के उत्तर पश्चिम कोण में लगभग तेरह किलोमीटर दूर स्थित सोगड़ा नामक गाँव के अपने भंडार को खेती की जमीन समेत बाबा को दान कर दिया । इसके अलावा भँडार घर में एक काली जी का छोटा परन्तु सुन्दर मंदिर भी बनवा दिया । उसी वर्ष कार्तिक अमावस्या के दिन काली जी की प्राण प्रतिष्ठा एवं पूजन का कार्यक्रम बड़े ही धूमधाम से सम्पन्न हुआ था । यह आश्रम " ब्रह्म निष्ठालय सोगड़ा" के नाम से विख्यात है । सोगड़ा आश्रम चारों तरफ पहाड़ियों से घिरा सुरम्य स्थान है । यह वैदिक काल के आश्रमों की कल्पना को साकार कर देता है । बाबा जी ने आश्रम के उत्तर दिशा में स्थित पहाड़ पर भैरव जी को स्थापित किया है, जहाँ पहुँचना श्रमसाध्य होने के अलावा कठिन भी है । बाबा के भैरव गुफा को जागृत कर देने के बाद हर बैशाख माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की मध्यरात्रि को पूजा तथा बलिदान आदि किया जाता है । वर्ष १९८० ई० में आश्रम में बाबा जी के निवास हेतु एक भवन बनवाया गया जिसे " गुरुघर" कहते हैं । यह भवन यन्त्रवत बहु कोणीय है । इसके भीतर एक तलघर या गुफा भी है, जो शून्यायतन में ध्यान धारणा के लिय बहुत ही उपयुक्त है । इसी आसपास आश्रम के मंदिर में माँ काली की नई प्रतिमा स्थापित की गई । यह प्रतिमा अपने आप में अन्यतम है । माँ काली महादेव के उपर खड़ी न होकर बैठी हुई हैं । अघोरेश्वर जी ने भी इस आश्रम में बहुत काल तक तप, नवरात्र, अनुष्ठान आदि किया है । अतः यह माँ काली का जाग्रत पीठ है ।
महारानी जशपुर जी ने अपना एक और भंडार दान किया है, जोकि जशपुर नगर से रायगढ़ रोड पर तीन किलोमीटर कि दूरी पर स्थित है । इस आश्रम का नाम " अघोर पीठ , वामदेव नगर" है । अब तो यह आश्रम जशपुर नगर की सीमा में आ गया है । इस आश्रम का मुख्य भवन चतुःत्रिकोणाकृति है । देवी एक त्रिकोण के शीर्ष बाग में अवस्थित हैं, बाहर भैरव जी विराजमान हैं । बाग, बगीचा, बैद्यशाला, यात्री निवास आदि से समृद्ध यह आश्रम देश के प्रधानमंत्री तथा अन्य उच्च पदस्थ महानुभावों का आतिथ्य कर चुका है ।
अघोरेश्वर भगवान राम जी का महाराजा जशपुर के दान तथा आश्रमों के महत्व के विषय में निम्नाँकित कथन " अघोरेश्वर स्मृति वचनामृत " ग्रँथ में सँगृहित है ।
" जशपुर के राजा श्री विजय भूषण सिंह देव ने बड़ी श्रद्धा के साथ, स्नेह के साथ, भक्तिभाव से परिपूरित हो आश्रम निर्माण के लिये अनुनय विनय किया । पाँच गाँव की भूमि, जो सैकड़ों एकड़ के रुप में है, श्री सर्वेश्वरी समूह को यह कहकर दान किया कि हरदम आपका आगमन जशपुर जनपद के क्षेत्रों में होता रहे । इससे औघड़, श्रद्धालु, संतमहात्मा, सर्वेश्वरी समूह के लोग जशपुर जनपद की शोभा बढ़ाते रहेंगे । साथ ही यहाँ के भोले भाले लोग आपके परिवार से, आपके आदर्श जीवन से सदैव प्रेरणा लेते रहेंगे । मैंने उसे स्वीकार किया और तीन आश्रमों को बड़े ही रमणीक पीठ के रुप में प्रतिष्ठित किया और निवास स्थान बनाया । कितने ही वर्षों यहाँ वर्षावास किया । बसंतॠतु और आश्विन महीने में अनुष्ठान किया और दिव्य पवित्र विचारों से बहुतेरे प्राणियों को दीन की तरफ प्रेरित किया ।"
महाराजा जशपुर सांसद बनेने के बाद ज्यादातर दिल्ली रहने लगे । उनका जशपुर और बनारस आनाजाना लगा ही रहता था । दिल्ली में महाराजा साहब का निवास विनय नगर के एक फ्लैट में होता था । कभी कभी अघोरेश्वर भी दिल्ली जाते थे और महाराजा साहब के फ्लैट मे ठहरते थे । धीरे धीरे दिल्ली में बाबा की चर्चा फैलने लगी । राजनेता लोग बाबा के सम्पर्क में आने लगे । इनमें से कुछ नाम इस प्रकार हैंः श्री मोरारजी देशाई, श्री जगजीवन राम, श्री के. हनुमंथैया, श्रीमति इंदिरा गाँधी, आदि। बाद में तो यह संख्या बढ़ती ही गई ।
सन् १९६१ ई० में अघोरेश्वर ने श्री सर्वेश्वरी समूह नामक एक संस्था की स्थापना की, जिसके अध्यक्ष स्वयं अघोरेश्वर थे एवं प्रथम उपाध्यक्ष बने हि. हा. महाराज जशपुर, विजय भूषण सिंह देव एवं दूसरे उपाध्यक्ष बनीं ह. हा. महारानी जशपुर, जयकुमारी देवी ।
इसी प्रकार एक लम्बा समय बीत गया । सन् १९८२ ई० के अगस्त माह में अघटित घट गया । महाराजा जशपुर श्री विजय भूषण सिह जू देव ने अपना शरीर त्याग दिया और उनका शव १९ अगस्त १९८२ ई० को कुष्ट सेवा आश्रम लाया गया । इस घटना के प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार अघोरेश्वर को इतना शोकाकुल कभी किसी ने नहीं देखा था । सर्वेश्वरी मंदिर में, अघोरेश्वर की उपस्थिति में प्रार्थना हुई और आपकी ही देखरेख में दिवंगत महाराजा का अँतिम संस्कार सम्पन्न हुआ ।
महाराजा विजय भूषण सिंह जू देव अघोरेश्वर के सखा थे, मित्र थे और प्रिय भक्त भी थे । कहा जाता है कि महाराजा के निधन का अघोरेश्वर के स्वाश्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था ।
क्रमशः

रविवार, जनवरी 10, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः गँगातट भ्रमण


अवधूत भगवान राम जी क्रींकुण्ड आश्रम से बाहर आकर सीधे पुण्यसलिला जाह्नवी की ओर बढ़े । गँगा जी को हम आपके जीवन के केन्द्र में पाते हैं । आपकी अधिकाँश साधनाएँ या तो गँगा जी के तट पर सम्पन्न हुई हैं या फिर बिन्ध्याचल पर्वत की कन्दराओं में । आप सोते , जागते, खाते, पीते,घूमते, फिरते, निरन्तर साधना में होते थे । सामान्यतः आपके साथ का व्यक्ति उन्हें पूजा पाठ करते नहीं देखता था । जब कभी आप कोई बड़ा अनुष्ठान करते तभी लोग जान पाते कि आप साधना कर रहे हैं ।
गँगा तट पर आकर आप उस शाश्वत के संकेत के अनुसार एक ओर बढ़ चले । आपके पास एक छोटे से मलमल के टुकड़े के अलावा एक नारियल का खप्पर भर था । आप इस खप्पर में ही सब कार्य निपटाते था । इसी खप्पर में भिक्षा ग्रहण करते, पीने के लिये जल भी इसी में लाते, पर पैखाना में भी इसी का उपयोग करते थे । दिन भर चलते रहते । किसी ने कुछ भोजन दे दिया तो ठीक, अन्यथा निराहार । एकाकी जहाँ साँझ होती रात्री विश्राम के लिये ठहर जाते ।
उस समय की घटनाओं का तिथिवार विवरण पाना तो संभव नहीं है, हाँ अघोरेश्वर जी ने स्वयं तथा अन्य श्रद्धालुओं, भक्तों, और शिष्यों ने अपने अनुभव को बाँटा है, वही जानकारी का श्रोत बना है । हम इन घटनाओं को १९५२ ई० से १९५५ ई० के बीच का मानकर चलते हैं । घटनाओं का क्रम आगे पीछे हो सकता है ।
अघोररुप
आपके परिजन अब भी आपको खोज लेते और वापस घर चलने के लिये जोर देते । आप स्वयं को भी ममतामयी माँ की याद बराबर विह्वल कर देती । आपकी आँखों से घंटों प्रेमाश्रु की धारा अविरल बहती रहती । आप अधीर हो उठते । आपने निश्चय कर लिया कि अब अष्टपाशों को तोड़ना ही होगा । इसी के साथ आपकी गुण्डी तथा बगवाँ की यात्रा का कार्यक्रम बन गया ।
गुण्डी में परिजनों, ग्रामवासियों ने अचानक एक दिन सुबह सुबह देखा कि उनके बीच के बालक भगवान सिंह केवल लंगोटी लगाये, पूरे शरीर में राख पोते, शराब के नशे में धुत्त, एक हाथ में मदिरा की बोतल तथा दूसरे हाथ में श्वान शव खींचते हुए गलियों में से जा रहे हैं । कुत्तों और बच्चों का दल शोर मचाते हुए पीछे पीछे चल रहा है ।
साधारण जन के लिये यह दृश्य बड़ा ही विभत्स तथा असहनीय था । आपके परिवार वालों को इसी दिन अनुभव हो गया कि अब भगवान सिंह परिवार में पुनः सम्मिलित करने लायक नहीं रहे । उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाय । इस यात्रा में आपने अपनी जननी से भी भेंट नहीं की । आप गुण्डी में बिना रुके आगे बगवाँ, अपनी ननिहाल गाँव के लिये चल दिये ।
बगवाँ में आप जब ननिहाल पहुँचे आपके नाना नानी अश्वस्थ थे । चलना फिरना नहीं कर पाते थे । वे दालान में खटिया पर लेटे हुए थे । आप जाकर पास में लगे चौकी में बैठ गये । आप पूरा अघोरी वेश में थे । वहाँ आपका पहुँचना था कि दरबार लग गया । उस समय तक दुधुवा या मदिरा खूब चलने लगा था । तम्बाखू भी चलता था । चिलम पर चिलम चढ़ता था । आप एक फूँक मारकर किसी को भी पकड़ा देते, सब प्रसादी पाते थे । भजन कीर्तन चलने लगा तो आधी रात हो गई । रात में बारह , एक बजे के लगभग आप उठ गये और टहलने लगे । बगल में मशान था, वहाँ चले गये और राख वाख लपेट लिये । लोगों ने सवेरे आपको फिर उसी दालान में पाया । बगवाँ में आप तीन चार दिन रहे ।
लगभग छह, सात माह के बाद आप फिर बगवाँ गये । शीत ॠतु थी । आपका आसन इस बार पंचायत भवन के बाहर में लगा । इस यात्रा में आपके साथ कृष्णाराम अघोरी उर्फ उड़िया बाबा छाया की भाँति लगे रहते थे । पंचायत भवन में आपने आठ दिन के लिये समाधि लगा लिया । जिस कमरे में आप थे, उसका दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया । खाना, पीना, नित्यकर्म आदि सब टहर गये । लोगों ने दरवाजा पीटा, आवाज दिया , जब किवाड़ी नहीं खुली तो बारी बारी से रखवारी करने लगे । आठ दिन के बाद दरवाजा खुला । आप बाहर आकर अपने आसन पर विराजमान हुए । कमरे से टोकरी भर ताजे ताजे सेवफल निकाल कर सबको प्रसाद बाँटा । लोग अचम्बित हो गये कि यहाँ ताजा सेव फल एक दूर्लभ वस्तु है, फिर बाबा जी आठ दिन से कमरे में बन्द थे । कोई आया न गया । फिर ये सेव कहाँ से आया ।
यज्ञ आयोजन
इसी समय , थोड़े थोड़े अन्तराल में आपने कई यज्ञ का आयोजन किया । यज्ञ तो देश में और भी बहुत लोग करते कराते हैं, परन्तु जो विचित्रता , अलौकिकता का दर्शन, अनुभव यज्ञ के यजमान तथा अन्य श्रद्धालुओं ने किया वह आश्चर्यजनक है । ऐसे ही एक यज्ञ की कथा का , अघोरेश्वर के प्रिय भक्त " अकिंचन राम जी द्वारा लिखित और अघोर गुरुपीठ ट्रस्ट, बनोरा जिला रायगढ़, छत्तिसगढ़ द्वारा प्रकाशित ग्रँथ " भगवान राम लीलामृत" में बड़े ही रोचक ढ़ँग से वर्णन किया गया है ।
कथा कुछ इस प्रकार हैः
"बारादरी में एक बार बाबा ने तीन दिन का महाविष्णु यज्ञ किया था । उसमें एक दिन सियार लोगों का भोजन करवाया था शाम को । उन सबको आमन्त्रित करने के लिये बाबा ने कागज के छोटे छोटे पुर्जों पर दिन तारीख और समय लिखवाकर , यह भी लिखवा दिया था कि आप लोग सादर आमन्त्रित हैं । उन कागज के पुर्जों को जितनी भी बाँसबाड़ियाँ थीं आसपास, वहाँ डलवा दिया गया था । निर्धारित दिन पर शाम के समय बाबा भोज का पत्तल और पुरवा में पानी लाइन से लगवा दिये और सबको वहाँ से हटा दिये । एक विश्वनाथ साव थे, जो उस यज्ञ के यजमान थे और एक ठाकुर साहब थे , ये दि व्यक्ति ही वहाँ रहे । बाबा की यही हिदायत थी कि बोलना मत एक भी शब्द चाहे कुछ भी हो जाय । नियत समय पर सियार लोग आकर भोजन करने लगे । भोजन करने के बाद सियार लोग सब वहाँ से बिदा हो गये ।"
राय पनारुदास के बगीचे में चन्द्र ग्रहण के अवसर पर बाबा एक और यज्ञ का आयोजन किये थे । इस यज्ञ में घटी एक घटना कुछ इस प्रकार हैः
" उस यज्ञ की व्यवस्था बड़े पैमाने पर की गई थी । आठ छोलदारियाँ लगाई गईं थीं । लगभग सत्तरह अठारह हजार साधु आये थे । साधुओं का जैसे जैसे आना होता गया, व्यवस्थापक लोग चिन्तित हो गये । बाबा के पास जाकर बोले कि देखिये, इतने सारे लोग आ रहे हैं और हमारे पास गल्ला है महज पाँच पाँच किलो । अब क्या किया जाय ।
बाबा बोले, "घबड़ाव मत । अइसन कर कि गल्ला वाला गोदाम के ताला लगा द । एकदम्म केहू के भीतर मत जाय द । अउर तू अपन काम करत रह ।"
तो यज्ञ हुआ, और बड़ा ही अच्छा यज्ञ हुआ । उसके बाद साधु लोगों को भोजन पानी दिया जाने लगा । लोगों ने खाया और खूब छककर खाया । उसी थोड़े से गल्ले में से सबको परोसा गया, लेकिन किसी को कुछ भी कम नहीं हुआ । जब आखिरी पाँत बैठी तो उसमे एक बूढ़े से साधु भी थे । वे जिद करने लगे कि हम गोदाम के अन्दर जायेंगे । व्यवस्थापक के मना करने पर वह साधु गाली गलौज करने लगे । बात बढ़ गई । आखिर अत्यन्त क्रोध में उन्होंने अपना हाथ श्राप देने को उठाया और कहा, " भस्म कर दूँगा ।"
अब देखिये । जहाँ पर यह घटना घट रही थी बाबा वहाँ से काफी दूरी पर थे । जहाँ बैठे हुए थे राय पनारुदास के बगीचे के चबूतरे पर, वहाँ से इस पाँत का दृश्य दिखता भी नहीं था , आवाज उन तक पहुँचने का प्रश्न ही नहीं था । लेकिन जैसे ही उस साधु ने अपना हाथ श्राप देने के लिये ऊपर उठाया बाबा दौड़ते हुए उन दोनो के बीच आ गये । दोनों हाथ उठाकर उन्होंने उस साधु को रोका , और बड़ी जोर से डाँटते हुए कहाः " कुल साधना हियईं दिखलावे के बा तो के अपन ? मत कर ई सब ।" मतलब यह कि उस साधु में जरुर भस्म कर देने की शक्ति रही होगी ।"
अघोरेश्वर एक विष्णु यज्ञ मनिहरा गाँव में भी कराये थे । बाबा की प्रेरणा से इस याग से बची हुई धनराशि से श्री गणेश जी का एक सुन्दर मन्दिर का निर्माण कराया गया ।
सकलडीहा बाजार के निकट, श्री विश्वनाथ साव जी के अनुरोध पर बाबा ने एक रूद्र याग भी करवाया था ।
वाराणसी के बाबू रघुनाथ प्रसाद जी ने इन्ही दिनों बाबा भगवान राम जी से आग्रह किया कि मुझे "माँ" का दर्शन करा दीजिये । बाबा ने उन्हें देवी याग करने का आदेश दिया । बाबू रघुनाथ प्रसाद यजमान होकर देवी याग करने लगे । बाबा भी वहाँ जाते थे । आपने बाबू रघुनाथ जी से कहा कि जो भूखा आए उसको सादर भोजन कराना । यज्ञानुष्ठान के बीच ही एक रात्रि को फटे वस्त्र पहनकर एक बूढ़ी स्त्री आई । आदेशानुसार यजमान ने उसका यथोचित स्वागत किया और स्वयं भोजन लाकर उसके आगे रखा । कुछ ही क्षणों में भोजन करके वह स्त्री न जाने किधर चली गई । उसके इस प्रकार चले जाने से यजमान को संदेह हुआ । दूसरे दिन बाबा ने उनसे पूछा कि कल रात को माँ के दर्शन मिले ? बाबू रघुनाथ जी को आश्चर्य मिश्रित हर्ष हुआ, क्योंकि उक्त घटना को उन्होने किसी को भी नहीं बतलाया था । जिस उद्देश्य से यज्ञ हो रहा था , उसकी सफलता से वे परम प्रसन्न हुए ।
इसके अलावा संवत २०१८ की ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को मड़ुवाडीह स्थित बगीचे में अघोरेश्वर के आदेश से सभी शाखाओं के लगभग तीस वैदिकों ने एकत्र होकर वसन्त पूजा की थी ।
क्रमशः

रविवार, दिसंबर 27, 2009

अघोरेश्वर भगवान राम जीः अनन्य दिवस

आश्रम से निकलने के बाद किशोर अवधूत कुछ दिन तो छेदीबाबा के साथ ईश्वरगँगी में रहकर साधना करते रहे , फिर सकलडीहा, हरिहरपुर में रहने लगे । सकलडीहा में निवास के दौरान आपको क्रीँकुण्ड आश्रम के महँथ तथा आपके गुरु बाबा राजेश्वर राम जी ने बुला भेजा । बाबा का संदेशा थाः " जाओ, भगवान राम से कह दो, मैं उससे मिलना चाहता हूँ । उसे देखने की इच्छा हो रही है ।" शिष्य को जाना ही था । गये । गुरु शिष्य की भेंट हुई । इस भेंट का विवरण बड़ा ही रोचक है ।
"जब आप आश्रम में पहुँचे तब बाबा राजेश्वर राम जी अपनी चौकी पर लेटे हुए थे । उनकी आँखें बन्द थीं । कहा नहीं जा सकता कि वे निद्रा में थे या गहरे ध्यान की स्थिति थी । किशोर अवधूत ने हल्के से चरण कमल छूकर अपनी श्रद्धा, भक्ति निवेदित किया । बाबा की पलकें उठीँ और हृदय का सारा स्नेह बिगलित होकर आँखों से छलकने लगा । कुछ काल बाद गुरु के मुख से उलाहने के शब्द झरेः " मैंने तुम्हें चेला मूँड़ा था गाँजा पिलाने के लिये और तुम मेरे हाथ से बाहर उस पार स्वच्छन्द बिचरने लगे ।"
अवधूत मौन रहे ।
गुरु ने आगे कहाः " सोचता हूँ, तुम्हारी शादी कर दूँ । करोगे न ?"
शिष्य ने सहमती दीः " कर दीं ।"
बाबा ने सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहाः "लेकिन दुल्हन बड़ी दूर, उड़ीसा के सरहद की है । संभार पइब ।"
किशोर अवधूत की स्थिति यथावत रही । उन्होने उसी गंभीरता से जबाब दियाः " काहे न सँभारब ।"
कुछ काल तक गुरु शिष्य के बीच चर्चा होती रही । अन्त में किशोर अवधूत ने गुरु का चरण स्पर्ष किया और वापस चल पड़े ।"
गुरु शिष्य की उपरोक्त चर्चा लगती तो लौकिक शादी के विषय में की गई चर्चा थी । लेकिन यह चर्चा प्रतीकात्मक सधुक्कड़ी भाषा थी ,जिसे अवधूत पद पर प्रतिष्ठित गुरु शिष्य के अलावा कोई अन्य समझ सकने में असमर्थ था ।
अवधूत भगवान राम जी के साथ इन्ही दिनों से एक साधु देखे गये । उनका नाम कृष्णाराम अघोरी था । बाबा कृष्णाराम जी उड़िया भाषा बोलते थे । शायद उन्हें हिन्दी नहीं आती थी । वे बनारस से बहुत दूर उड़ीसा प्रान्त के रहने वाले थे । बाबा कृष्णा राम जी अवधूत भगवान राम जी को उड़िया भाषा में ही अपनी बात कहते और आप हिन्दी में जबाब देते । दोनों के बीच भाषा कोई समस्या नहीं थी ।
दीक्षा ग्रहण करने के बाद के अढ़ाई बरस का साधना काल आपने तीन प्रमुख स्थानों में रहकर बिताया । एक था पूनास्टेट का बगीचा , दूसरा राय पनारु दास का बगीचा और तिसरा ढ़ेलवरिया मठ जो चौकाघाट स्थित रेल लाईन के उत्तर में वरुणा नदी के तट पर अवस्थित है ।
अनन्य दिवस
सन् १९५४ ई० में माघ का महीना था । जाड़े के दिन थे । कुम्भ पड़ रहा था । प्रयाग में कुम्भ स्नान के लिये बड़ी भीड़ एकत्रित हो रही थी । पूरे भारत से इस मौके पर संत महात्मा आ रहे थे । कुम्भ के समय सन्त समागम हुआ करता है । उस अज्ञात की प्रेरणा हुई और आप प्रयाग की ओर चल पड़े । आप पैदल थे । सामान के नाम पर शरीर पर ढ़ाई गज मलमल के टुकड़े के अलावा कुछ नहीं था । न विछाने के लिये विछावन, न ओढ़ने के लिये कंबल । रास्ते में भोजन की कोई व्यवस्था नहीं थी । किसी समय कोई धर्मप्राण भोजन उपलव्ध करा देता तो ठीक, अन्यथा कई कई साँझ गँगा जल पीकर निर्वाह करना पड़ जाता था । इसी प्रकार कष्ट की अनदेखी करते हुए आप गँगा जी का किनारा पकड़ कर आगे बढ़ते रहे ।
प्रयाग में आप मेला स्थल पहुँच गये । दिन तो जैसे तैसे गुजर जाता , सारी रात साधुओं की धूनी ताप कर गुजरती । खाने पीने की तरफ आपका ध्यान न होने के कारण भोजन की समस्या बनी हुई थी । इसी बीच माघ मेला के ठीकेदार के कारिंदे ने आपके और दो तीन अन्य साधुओं के लिये एक धूनी की व्यवस्था करा दिया जहाँ आप रात गुजारने लगे ।
एक दिन अचानक एक दिगम्बर अवधूतिन ने उसी धूनी के पास अपना आसन जमा दिया । वस्त्र के नाम पर अवधूतिन के शरीर पर कुछ नहीं होता था । वह केश में माला और योनि में अड़हुल का फूल खोंसे रहती थी । दिन के समय हाथ में झँडी लेकर मेले में घूमती रहती, साँझ पड़ते ही वह आ धमकती और ठीक आपके सामने धूनी के पास आसन जमा लेती । आप उसे माता रुप में देखते और शक्ति प्राप्त करते । २०,२५ दिन तक यही क्रम चलता रहा , फिर वह न जाने कहाँ चली गई ।
माघ मास के चतुर्दशी को मेला में ही आपकी भेंट एक बृद्धा से हो गई । वह आपको अपनी कुटिया में ले गई । उस करुणामयी ने प्रेमपूर्वक आपको भोजन कराया । नया वस्त्र दिया । आशीर्वाद देकर सजल नेत्रों से बिदा किया । आप बाद में बतलाये थे कि माँ से भिक्षा मिल जाने के पश्चात कभी भोजन आदि की असुबिधा नहीं हुई । उसके बाद हर साल माघ कृष्ण चतुर्दशी को अनन्य दिवस के रुप में मनाया जाता है । आज भी पूरे माघ मास भर श्री सर्वेश्वरी समूह द्वारा मेला स्थल पर बड़ा केम्प लगाया जाता है और समारोह पूर्वक अनन्य दिवस मनाया जाता है ।
प्रयाग में आप लगभग एक मास रहे, फिर काशी लौट आये । काशी आने पर आप क्रींकुण्ड स्थल में कुछ दिनों तक गुरु की सेवा में लगे रहे, जिनका फोते का आपरेशन हुआ था। जब गुरुदेव निरोग हो गये आप उनसे आज्ञा लेकर अज्ञात की खोज में अपनी यात्रा में गँगा जी के तट की ओर बढ़ चले ।
क्रमशः