मंगलवार, अगस्त 24, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम कुष्ट सेवा आश्रम , वाराणसीः कुछ चित्र





गुरुदेव निवास, पड़ाव वाराणसी 
एको व्यापक अव्यय सर्वज्ञ परम रम्य, हर कारण सृष्टि स्थिति, नित्य व्यापक आद्या ।
अघोर घोर महाकपालेश्वर, भुक्ति मुक्ति दातार, तिनके पद बन्दन करौं, कोटी कोटी प्रणाम ।

श्री सर्वेश्वरी मँदिर, पड़ाव वाराणसी
 

गणेश पीठ , पड़ाव , वाराणसी
अघोर चक्र
अघोरेश्वर भगवान राम कुष्ट चिकित्सालय
अघोरेश्वर भगवान राम महा विभूति स्थल, गँगातट, पड़ाव वाराणसी
अघोरेश्वर भगवान राम महा विभूति स्थल, गँगातट, पड़ाव वाराणसी

रविवार, जुलाई 25, 2010

गुरु पूर्णिमा २०१० दि. २५.०७.२०१०

गुरुमूर्ति अघोरेश्वर भगवान राम जी

                                                                                                                                     

।  वन्दे गुरुपद द्वंद्वँ, वाङ् मनश्चित्तगोचरम् ।
।।  श्वेत रक्तप्रभाभिन्नं,  शिवशक्त्यात्मकं परम् ।।

मैं शक्ति से युक्त शिव, वाणी, मन, चित्त आदि इन्द्रियों में व्याप्त, श्वेत रक्त प्रभा से अभिन्न श्रेष्ठ गुरुपदकमलयुगल की वन्दना करता हूँ ।

अघोरेश्वर भगवान राम जी के चरण कमल की वन्दना कर उनके मुखारबिन्द से निनादित वाणी में से गुरुतत्व का सूत्र सँकलित है । अघोरेश्वर कहते हैंः


" गुरु कोई खास हाड़, चाम के नहीं होते या कोई खास जाति, कास्ट के व्यक्ति नहीं होते हैं । गुरु तो वही होता है जिसे देखने पर हमें ईश्वर याद आये,  जिसे देखने पर माँ जगदम्बा के चिँतन की तरफ उत्सुकता हो ।

आप तो अपने कहीं , किसी भी पीठ में चाहे जड़ हो या चेतन हो, उसमें गुरुपीठ स्थापित करके, उस गुरुत्व आकर्षण की तरफ खिंचा सकते हैं । पर कभी स्थापित ही नहीं किये हों तो उस गुरुत्व के आकर्षण की तरफ आप जा भी नहीं सकते । भले आप ब्रह्मा, विष्णु, शिव या बहुत बड़े व्यक्ति भी हो सकते हैं । मगर अपनी निजी जो प्राणमयी भगवती हैं, उनके साथ आपकी तन्मयता नहीं हो सकती ।"

रविवार, जुलाई 18, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः शिष्य समुदाय

अघोरेश्वर को पहचानकर उनकी शरण में आने वाले योगियों में से कुछ लोगों की विचित्रता ने जन मानस को गहरे तक प्रभावित किया था । उन्हीं बीर साधकों, सिद्धों, अवधूत पद पर प्रतिष्ठित औघड़ों के विषय में हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं । अघोरेश्वर का आशीष इन साधकों को कितनी ऊँचाई प्रदान किया  जानने लायक है ।

तपसी बाबा जी

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में उँचे उँचे पर्वतों की उपत्यका में बगीचा नामक एक कस्बा बसा है । यहाँ की जलवायू पूरे छत्तीसगढ़ से अलग है । सभी दिशाओं में स्थित उँचे उँचे पर्वतों के कारण यहाँ सूर्योदय देर से तथा सूर्यास्त जल्दी हो जाता है । यहाँ की भूमि पर्वतों से उतरने वाली प्राकृतिक खाद से उपजाऊ तथा झरनों के जल से सिंचित है । पर्वतों से छनकर आती शीतल एवँ मन्द बयार इस क्षेत्र को निवास हेतु सुखकर एवँ स्वाश्थ्यप्रद बनाती है । इस क्षेत्र में ही एक आश्रम और है, जिसे कैलाशगुफा कहा जाता है । इस आश्रम की स्थापना सँत गहिरा गुरु जी महाराज ने किया था । आश्रम के अलावा देव वाणी संस्कृत के पठन पाठन हेतु एक रेसिडेंन्सियल स्कूल की  स्थापना  भी गहिरा गुरु जी ने किया है ।

बगीचा कस्बे के बीच में एक छोटा परन्तु सुन्दर सा आश्रम है । इसी आश्रम में तपसी बाबा निवास करते थे । क्षेत्र की जनता में बाबा का बड़ा सम्मान था । 

कहते हैं बाबा अपनी युवावस्था में ही गृह त्याग कर सन्यास ग्रहण कर लिये थे । साधना के क्रम में उन्होने सँकल्प लेकर चित्रकूट में भगवान काँतानाथ जी की परिक्रमा करने लगे । आपने सँकल्प बारह वर्ष की परिक्रमा का लिया था और परिक्रमा लगातार बारह वर्षोँ तक चलती भी रही थी । अभी परिक्रमा को  बारह वर्ष पूर्ण होने में तीन दिन शेष रह गये थे कि इस कठोर तपश्चर्या के सुफल के रुप में आपको अघोरेश्वर भगवान राम जी का दर्शन प्राप्त हुआ । आपने अघोरेश्वर को पहचान लिया । आपने इतने वर्षों की कठोर तपश्चर्या , जिसे पूर्ण होने में मात्र तीन दिन ही शेष थे, छोड़ दिया और अघोरेश्वर का अनुगमन करने लगे । अघोरेश्वर की कृपा पाकर आपने कुछ ही समय में अपना इष्ट प्राप्त कर लिया । 

बाबा अब समाधि ले चुके हैं ।

क्रमशः



शनिवार, जुलाई 03, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः शिष्य समुदाय


सन् १९६७ ई० के नेपाल भ्रमण के पश्चात बाबा जशपुरनगर के आश्रमों की व्यवस्था तथा अनुष्ठान आदि के लिये सोगड़ा चले गये । बाबा के पास विभिन्न मन्तव्य लेकर अनेकानेक लोग आने लगे थे । उनका ध्येय ज्यादातर लौकिक समृद्धि, आल औलाद, नौकरी चाकरी, शादी ब्याह आदि के लिये याचना करना और अघोरेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करना होता था । अघोरेश्वर इस बात से दुखी हो उठते थे । उनके पास अध्यात्म की विशाल सम्पदा थी और वे उस सम्पत्ति को मुक्त हस्त से बाँटना भी चाहते थे, पर उनके पास आने वालों में से ज्यादातर लोगों की रुचि अध्यात्म की ओर नहीं थी। उन्ही के बीच कुछ दिब्य आत्माओं ने भी बाबा से सम्पर्क साधा और उनका आशीर्वाद पाकर कृतकृत्य भी हुए । कतिपय ऐसी ही आत्माओं का संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है ।

आदरणीय पारस नाथ जी सहाय

सहाय जी का जन्म पटना में हुआ था । पिता दीवान थे अतः आपका लालन पालन राजपरिवार में हुआ । गौर वर्ण, लम्बा, दुबला पर स्वस्थ काया, अजान बाहू, भेदक दृष्टी, आप दिब्य दर्शन पुरुष हैं । आप दो भाई हैं । आपकी बहनें भी दो थीं । सबसे बड़ी बहन आरा बिहार में ब्याही थी । दूसरी बहन पूर्व रायगढ़ जिला में जशपुरनगर में व्याही थी । दूसरी बहन के पास रहने के उद्देश्य से आप जशपुरनगर आ बसे तथा क्लर्क की सरकारी नौकरी करने लगे थे । सभी लोग इसीलिये आपको सहाय बाबू के नाम से ही जानते हैं ।
एकबार आपने बतलाया था कि "वे अभी किशोर ही थे । अपनी दीदी के यहाँ आरा गये हुए थे । वहीं अघोरेश्वर से उनकी भेंट किसी एकाँत जगह पर हो गई थी और गुरू का आशीर्वाद अनायास ही प्राप्त हो गया था । "

बाद में आपकी शादी हो गई और आप जशपुरनगर आ गये थे । एक बार आपने लेखक को बतलाया था कि सोगड़ा आश्रम में आपका दीक्षा संस्कार हुआ था । आप उस समय के साधक हैं जब अघोरेश्वर मुक्तहस्त से साधनाएँ बाँटा करते थे । जिसने जो माँगा वह मिला । जिसने जो जानना चाहा बता दिया । बाद में तो बाबा भी ठोक बजाकर शिष्य बनाते थे और उसके पात्र के अनुसार ही साधना बतलाते थे ।
इस लेखक की भेंट सहाय बाबू से सन् १९७२ ई० में हुई थी तथा आज भी सम्पर्क बना हुआ है । आदरणीय सहाय बाबू ने ही लेखक को अघोरेश्वर के चरणों में शरण लेने के लिये प्रेरित किया था ।
सहाय बाबू मुड़िया साधू तो नहीं हैं । गृहस्थ हैं , परन्तु योगी दीक्षा प्राप्त सम्पूर्ण योगी हैं । अघोरेश्वर के जशपुर आगमन के पश्चात प्रारंभिक शिष्यों में से एक सहाय जी गृहस्थ होते हुए भी साधू का जीवन जीते हैं । लेखक को सहाय बाबू को पास से देखने का अनेक बार अवसर मिला है । वे अत्यंत ही सादा जीवन जीते हैं । उनकी आवश्यकताएँ अत्यंत ही अल्प मात्रा में होती हैं । उनकी साधना बड़े ही गोपनीय ढ़ँग से चलती रहती है । यदि आप साथ हैं तो वे आपको कभी सोते हुए नहीं मिलेंगे । आज लगभग ७५ वर्ष की आयु में भी आप अधेड़ दिखते है तथा शरीर में वही चुस्तीफुर्ती विद्यमान है । चेहरे का तेज तो बस देखते ही बनता है ।
आदरणीय सहाय बाबू सिद्ध महात्मा हैं । उनके अनेक अलौकिक कृत्य लेखक ने देखा सुना है । आप " आत्म चरितम् न प्रकाशयेत " में विश्वास रखते हैं । आजकल आप साधारण गृहस्थ का जीवन जीते हुए रायगढ़, छत्तिसगढ़ में निवास कर रहे हैं ।

अवधूत श्याम राम जी

आपका पूर्व नाम श्री विरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव था । आपका जन्म छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में धर्मजयगढ़ में हुआ था । आपका परिवार धर्मजयगढ़ का उच्च और सम्मानित कायस्थ परिवार है । आपका परिवार पढ़ा लिखा बुद्धिजीवीयों के परिवार के रुप में जाना जाता है । आप पूर्व धर्मजयगढ़ स्टेट में थानेदार के पद पर कार्यरत थे । स्टेट बिलय के पश्चात आप मलेरिया इन्स्पेक्टर के पद पर कार्य करने लगे । आप शुरू से ही नैतिकवान तथा सच्चरित्र अधिकारी के रुप में विख्यात थे ।
एक बार अपनी नौकरी के सिलसिले में दौरा करते समय आपको जँगल में अघोरेश्वर भगवान राम जी का दर्शन लाभ हो गया । दर्शन लाभ होते ही आपका मन सँसार से उचाट हो गया । आप नौकरी छोड़कर अघोरेश्वर की शरण में सोगड़ा आश्रम पहुँच गये । आपके साधु बनने के समय पत्नि, सन्तान, भाईयों सहित भरा पूरा परिवार था । परिवार ने भी प्रसन्नतापूर्वक आपको अपने पारिवारिक दायित्वों से मुक्त कर साधु जीवन स्वीकारने में सहयोग प्रदान किया था ।
दीक्षा के उपराँत आपका नाम श्याम बाबा अघोरी हो गया । आप यौगिक क्रियाओं में अत्यँत ही प्रवीण थे । आपकी गुरु निष्ठा अद्वितीय थी । क्षेत्रीय जनता के लिये आप बड़े विचित्र अघोरी थे । आपने ज्यादातर समय जशपुरनगर के पास स्थित " गम्हरिया आश्रम " में ही बिताया था ।

इस लेखक को धर्मजयगढ़ निवास काल में यदाकदा श्याम बाबा के आतिथ्य का सुयोग मिलता था । चर्चा भी होती थी । आप सदैव लेखक को अघोरेश्वर के और निकट जाने तथा साधना हेतु मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिये अभिप्रेरित किया करते थे । आप कहा करते थे " दौड़िये पण्डा जी दौड़िये, बाद में मौका नहीं मिलेगा । " आपकी बात सच हो गई ।

श्याम बाबा देश के विभिन्न राज्यों में बहुत घूमे हैं । आपको भूतपूर्व राज परिवारों से सम्मान और सहयोग मिलता रहता था ।

एक बार साधना विषयक चर्चा में आपने लेखक को बतलाया थाः

" वे हमारी साधना के प्रारंभिक दिन थे । गुरु का आदेश हुआ कि जाइये भ्रमण कीजिये । यह भी आदेश था कि भ्रमण में पैसा को नहीं छूना है । हम भ्रमण पर निकल पड़े । पास में कुछ था नहीं । कपड़ा लत्ता हमने लिया नहीं । जशपुर बस स्टैण्ड पर राँची जाने वाली बस खड़ी थी । कण्डक्टर पहचानता था । पूछाः "बाबा कहाँ जाइयेगा ? ।" हम कहेः " चलते हैं ! जहाँ मन करेगा उतर जायेंगे ।" हम बस में सवार हो गये । बस चली । रास्ते में मन विरक्त होने लगा । एक बस स्टाप पर हम उतर गये ।

जहाँ हम उतरे थे वह छोटा सा गाँव था । हमें कोई पहचानता नहीं था । हम किधर जावें सोचते सड़क पर खड़े थे । हमने देखा कि एक ओर हरियाली दिख रही है । हम उधर ही पैदल चलने लगे । साँझ को किसी श्मशान में रात बिताने के लिये ठहर जाते । भोर में फिर चल पड़ते । कोई खाना दे देता तो खा लेते नहीं तो दो, दो तीन दिन तक जल पीकर गुजारा करना पड़ जाता था । उस समय हम तिथि, वार, दिशा , समय से मुक्त हो गये थे । पता नहीं कितने दिनों के बाद बाबा का आदेश मिला और हम गम्हरिया आश्रम लौट आये ।"


श्याम बाबा की अँतिम यात्रा भी विचित्र ढ़ँग से हुई थी ।

"उन दिनों अघोरेश्वर गम्हरिया आश्रम में ही थे । एक दिन प्रातःकाल में श्याम बाबा अघोरेश्वर के निकट उपस्थित हुए । उन्होने दोनो हाथ जोड़कर अघोरेश्वर के चरणों में प्रणिपात करने के बाद निवेदन किया कि वे भ्रमण में जाना चाहते हैं । अघोरेश्वर कुछ काल तक श्याम बाबा को अपलक देखते रहे, फिर पास खड़े एक सेवादार से कहा कि वे जाकर उनका बड़ा वाला टार्च ले आवें । टार्च आ जाने के बाद अघोरेश्वर ने श्याम बाबा को पास बुलाया और टार्च देते हुए कहा कि लीजिये रास्ता देखने में काम आयेगा ।

श्याम बाबा गुरू की आज्ञा पाकर भ्रमण में निकल पड़े । कुछ दिनों के पश्चात आप बगीचा नामक कस्बे में अपने भक्त के यहाँ पहुँचे । भक्त बड़ा आनन्दित हुआ । दुसरे दिन प्रातः पद्मासन में बैठकर आपने यौगिक क्रिया द्वारा शरीर से प्राण को मुक्त कर दिया ।"

श्याम बाबा की समाधि का समाचार सुनकर अघोरेश्वर भी उदास हो गये थे ।

क्रमशः


रविवार, जून 13, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः भ्रमण


प्रकृति के अवयव गुणों के भीतर रचित हैं । गुण तीन हैं । १, सत्वगुण  २, रजोगुण  ३, तमोगुण  । गुण विभाग से यह सृष्टि है अतः सर्वत्र तीनों गुण विद्यमान हैं । जिस गुण की विद्यमानता जहाँ अधिक परिमाण में होती है वहाँ उसका प्रभाव सहज दृष्टिगोचर होता है, बाकी दो गुण रहते तो हैं परन्तु गौण रूप से । प्रभावहीन या अल्प प्रभाववान । सत्वगुण प्रभावान्वित स्थलों पर गुण प्रभाव के चलते  व्यक्ति का हृदय, देह, मन आदि शुद्ध हो जाता है । ऐसे स्थलों को तीर्थ कहते हैं ।

कुछ स्थान स्वाभाविक सत्व गुण प्रधान हैं, जैसे कि " वाराणसी, तीर्थ राज प्रयाग, पुरी, आदि" । जिन स्थलों पर ॠषि लोग तपस्या कर चुके हैं, जहाँ साधकों ने उच्चतर शक्ति आहरित किया है, जहाँ पर सन्त, महापुरुष, अघोरेश्वर उपदेश देते रहे हैं, ज्ञान संचार या दीक्षा संस्कार करते रहे हैं , सिद्ध अवस्था या परमतत्व को प्राप्त कर लिया है, किसी महापुरुष का जन्म या निर्वाण हुआ है, ऐसे सभी स्थल उक्त  निमित्त के कारण सत्वगुण प्रधान हो गये हैं । जिन लोगों में शक्ति अनुभव की क्षमता है, उन स्थलों में जाकर उन्मुक्त भाव से बैठते हैं तो स्पन्दन होता है, क्रियाएँ होती हैं, मन उर्घ्वगतिमान होता है । ये सभी स्थल भी तीर्थ हैं ।

उपरोक्त तीर्थ स्थावर तीर्थ कहलाते हैं । इनके अलावा दो प्रकार के तीर्थ और होते हैं । वे हैं, १, मानस तीर्थ २, जँगम तीर्थ ।

मानस तीर्थ के लिये कहीं जाना आना नहीं पड़ता । ये मनुष्य के मानसिक गुण हैं । ये हैं, सत्य, दया, परोपकार, अहिंसा,  क्षमा आदि । इनमें से एक तीर्थ में स्नान कर लेने वाला व्यक्ति भी सिद्ध हो जाता है । महाराज हरिश्चन्द्र ने सत्य की,  महाराज शिवि ने त्याग की साधना करके ही परमपद प्राप्त कर लिया था ।  राजकुमार सिद्धार्थ ने अपने पूर्व जन्मों में बोधिसत्व रुप में इन्ही मानस तीर्थों की परमिति साधकर दश पारमिताएँ प्राप्त करके बुद्धत्व प्राप्त किया था ।

 मनुष्य रुप में जन्म लेकर जिन्होंने त्याग, तपस्या, ज्ञान, विज्ञान, योग, उपासना, भक्ति तथा मानस तीर्थों में अवगाहन कर सिद्ध हो चुके हैं ऐसे समस्त संतों को जँगम तीर्थ कहते हैं । सदगुरु जँगम तीर्थ हैं । ऐसे जँगम तीर्थों से सम्पर्क करने से, सानिध्य में रहने से, मेधा शुद्ध होती है, आत्मा का उन्नयन होता है,  मन निर्मल एवं निश्छल होता है । वृत्तियाँ भी सुकोमल होकर सात्विक हो जाती हैं ।

भारतवर्ष में तीर्थ यात्रा और परिभ्रमण का बड़ा महत्व माना गया है ।

अघोरेश्वर भगवान राम जी ने मानस तीर्थों का अवगाहन अब तक कर चुके थे, उनकी पारमिता भी सिद्ध कर लिया था । अब उन्होंने देश की प्राचीन सन्त परिपाटी का अनुगमन करते हुए समग्र पृथ्वी के स्थावर और जँगम तीर्थों का साक्षात्कार करने का निश्चय किया । वैसे तो साधना काल में ही  आप मुख्य मुख्य तीर्थों की यात्रा कर चुके थे । कभी भी वे एक जगह स्थायी निवास नहीं करते थे । आगे बढ़ते जाना उनके स्वभाव में था ।

२१ सितम्बर सन् १९६१ ई० को श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना हो चुकी थी । बाबा का तीर्थाटन चित्रकूट यात्रा से शुरु हो चुका था । सन् १९६२ ई० के मध्य तक औघड़ भगवान राम कुष्ठ सेवा आश्रम, पड़ाव वाराणसी में कुष्ठ अस्पताल बाबा का निवास बन गया । बाबा ने पड़ाव में निवास करना शुरु भी कर दिया । आनेवाले भक्तों श्रद्धालुओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी ।

चित्रकूट यात्रा  

इस यात्रा में कालिंजर की भैरवी के आग्रह पर घोरा देवी के मन्दिर में एक  अनुष्ठान सम्पन्न हुआ था । इस अनुष्ठान में अघोरेश्वर भगवान राम जी के साथ अघोराचार्य श्री सोमेश्वर राम जी, भरतमिलाप के महन्थ तथा भैरवी ने सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया था । चक्रार्चन के समय आकाशगामिनी भैरवियाँ भी शामिल हुईं थीं ।
बाबा की यह यात्रा एक सप्ताह तक चली ।
नेपाल यात्रा
सन् १९६८ ई० के फागुन मास मे शिवरात्री के समय यह यात्रा हुई थी । बाबा की यह यात्रा इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि आज जो श्री परमेश्वरी सेवा केन्द्र, काठमान्डु, श्री माँ गुरु नारी समूह, काठमान्डु आदि देखते हैं उसका बीजारोपण इसी यात्रा के द्वारा हुआ था ।
अवधूत सिंह शावक राम
कहा जाता है कि अघोरेश्वर भगवान राम जी के प्रथम सन्यासी शिष्य होने का गौरव औघड़ सिंह शावक राम जी को ही है । आपका जन्म बिहार राज्य में भोजपुर जनपद के पाथर नामक गाँव में जगत प्रसिद्ध महाराज बिक्रमादित्य के कुल में सन् १९२१ ई० को हुआ था । आप कोलकाता विश्वविद्यालय के स्नातक थे । आप गुरु अघोरेश्वर भगवान राम जी से भेंट के पहले विभिन्न जागतिक प्रश्नों के समाधान के लिये हिमालय की उपत्यकाओं में स्थित विभिन्न प्रदेशों की अनेक बार यात्रा कर चुके थे । इन यात्राओं में अनेक साधु, सन्त महात्मा से हुई भेंट आपको आपके प्रश्नो का उत्तर नहीं दिला सकी । आप थक हारकर घर बैठ गये ।
सन् १९६६ ई० में आपको सदप्रेरणा हुई और आप अघोरेश्वर भगवान राम कुष्ठ सेवा आश्रम , पड़ाव , वाराणसी पहुँच गये । आश्रम के मन्दिर में भगवती की आराधना करते हुए आपको आश्चर्यजनक अनुभूति हुई । आपने निश्चय कर लिया कि अपने पिछले जीवन को विराम देकर गुरु चरणों में शरण पायेंगे । बाबा की कृपा हुई और कुछ ही समय के पश्चात आपका दीक्षा संस्कार हो गया ।
कुछ काल तक आप गुरु चरणों में विधिवत अघोर साधना बिषयक शिक्षा ग्रहण करते रहे, फिर गुरु ने आपको आदि आश्रम हरिहरपुर  भेज दिया । आप हरिहर आश्रम में दस वर्षों तक रहे । आपने अपनी समस्त साधना, अनुष्ठान यहीं रहकर पूर्ण किया । साधना की अवधि बीत जाने के पश्चात आपको गुरु ने मुक्त कर दिया । आप यात्रा पर निकल पड़े ।
आपने सन् १९७७ ई० में दिलदारनगर , गाजीपुर में गिरनार आश्रम की स्थापना कर " अघोर सेवा मण्डल " नामक एक संस्था बनाया । इसके पश्चात आपने अनेक जगहों पर आश्रम, कुटिया का निर्माण कराया । अघोर सेवा मण्डल प्राकृतिक विपदा के समय सेवा का उत्कृष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता रहा है ।

शावक बाबा को सदैव नेपाल आकर्षित करता रहा है । उन्होने अनेक बार नेपाल की यात्रा की थी । नेपाल के आश्रमों का निर्माण की प्रेरणा आपने ही दी ।
अवधूत सिंह शावक राम जी ने अपना अँतिम समय मसूरी , हिमाचल प्रदेश में निर्मित " हिमालय की गोद" आश्रम में बिताया । ११ सितम्बर सन् २००२ ई० को आपने शिवलोक गमन किया ।

क्रमशः          

बुधवार, मई 19, 2010

अघोरपथ के प्रसिद्ध स्थल

चित्रकूट
अघोर पथ के अन्यतम आचार्य, भगवत स्वरुप दत्तात्रेय जी की जन्मस्थली चित्रकूट सभी के लिये तीर्थस्थल है । औघड़ों की कीनारामी परम्परा का उत्स यहीं से हुआ माना जाता है । माता अनुसूया जी का आश्रम तथा शरभंग ॠषि जो एक सिद्ध अघोराचार्य थे, का आश्रम, अघोर साधकों के लिये साधना की भूमि प्रदान करते हैं । यहाँ का स्फटिक शिला नामक महा श्मशान तथा पार्श्व में स्थित घोरा देवी का मन्दिर हमेशा से अघोर साधकों को आकर्षित करता रहा है । कहा जाता है कि स्फटिक शिला श्मशान में भगवान राम चन्द्र जी ने माता सीता का भगवती रुप में पूजन किया था और उसी उपलब्धि से वे असुरों का विनाश कर भारत में रामराज्य स्थापित करने में सफलमनोरथ हो सके थे ।

कवि रहीम खानखाना ने शासक का कोप भाजन बनने पर अपना अज्ञातवास काल यहीं पर बिताया था और कहा थाः

"चित्रकूट में रमि रहै रहिमन अवध नरेस ।
जापै विपदा पड़त है सो आवत यहि देस ।।"


अघोरेश्वर भगवान राम जी ने कई बार चित्रकूट की यात्रा की थी ।

प्रभासपत्तन

कलियुग के प्रारम्भ में यादवों ने आपस में लड़कर इसी स्थान पर अपने कुल का नाश कर लिया था । बाद में बाहरी आक्रान्ताओं ने यहाँ पर स्थित सोमनाथ मन्दिर की सम्पत्ति लूटने की गरज से अनेक बार आक्रमण कर व्यापक नर संहार किया । भयंकर नरसंहार होने के कारण यह एक महा श्मशान है । इस श्मशान में एक औघड़ आश्रम प्रतिष्ठित है जहाँ रहकर अनेक साधक तप करते रहते हैं । यहाँ भगवान सोमनाथ विराजते हैं ।

अघोरीकिला
बिहार में चोपन शहर के पास एक बहुत पुराने किले का अवशेष आज भी विद्यमान है । यह कालिंजर का किला पंद्रहवीं सदी से ही निर्जन प्राय रहता आया है । तभी से इस निर्जन किले को अघोरियों ने अपनी साधनास्थली बना रखा है । अभी कुछ वर्ष पहले तक एक सिद्ध अघोराचार्य की कीर्ति सुनने में आती थी । आजकल कुछ एक साधक यहाँ रहकर अपनी साधना में लगे रहते हैं । कुछ भैरवियों की उपस्थिति के भी प्रमाण मिलते हैं ।

जगन्नाथ पुरी

जगत प्रसिद्ध जगन्नाथ मन्दिर और विमला देवी मन्दिर, जहाँ सती का पाद खण्ड गिरा था, के बीच में एक चक्र साधना वेदी अवस्थित है । यह वेदी वशिष्ठ वेदी के नाम से प्रसिद्ध है । इसके अलावा पुरी का स्वर्गद्वार श्मशान एक पावन अघोर स्थल है । इस श्मशान के पार्श्व में माँ तारा मन्दिर के खण्डहर में ॠषि वशिष्ठ के साथ अनेक साधकों की चक्रार्चन करती हुई प्रतिमाएँ स्थापित हैं ।

श्री जगन्नाथ मन्दिर में भी श्रीकृष्ण जी को शुभ भैरवी चक्र में साधना करते दिखलाया गया है ।

कालीमठ
हिमालय तो सदा दिन से साधकों में आकर्षण जगाता आया है । कितने, किस कोटी के,और कैसे कैसे साधक हिमालय में साधनारत हैं कुछ कहा नहीं जा सकता । नैनीताल से आगे गुप्तकाशी  से भी ऊपर कालीमठ नामक एक अघोर स्थल है । यहाँ अनेक साधक रहते हैं । कालीमठ में अघोरेश्वर भगवान राम जी ने एक बहुत बड़ा खड्ग स्थापित किया है । यहाँ से ५००० हजार फीट उपर एक पहाड़ी पर काल शिला नामक स्थल है जहाँ मनुष्य और पशु कठिनाई से पहुँच पाते हैं । कालशिला में भी अघोरियों का वास है ।

मदुरई

दक्षिण भारत में औघड़ों को ब्रह्मनिष्ठ कहा जाता है । यहाँ कपालेश्वर का मन्दिर है साथ ही ब्रह्मनिष्ठ लोगों का आश्रम भी है । आश्रम के प्राँगण में एक अघोराचार्य की मुख्य समाधि है । और भी समाधियाँ हैं । मन्दिर में कपालेश्वर की पूजा औघड़ विधि विधान से की जाती है ।

उपरोक्त स्थलों के अलावा अन्य जगहों पर भी जैसे रामेश्वरम, कन्याकुमारी, मैसूर,  हैदराबाद, बड़ौदा, बोधगया आदि अनेक औघड़, अघोरेश्वर लोगों की साधना स्थली, आश्रम, कुटिया पाई जाती है ।

कतिपय अन्य देशों में भी औघड़ , अघोरेश्वर ने भ्रमण के क्रम में जाकर मौज में आकर अपना निवास बना लिया है ।

नेपाल
नेपाल में तराई के इलाके में कई गुप्त औघड़ स्थान पुराने काल से ही अवस्थित हैं । अघोरेश्वर भगवान राम जी के शिष्य बाबा सिंह शावक राम जी ने काठमाण्डु में अघोर कुटी स्थापित किया है।  उन्होने तथा उनके बाद बाबा मंगलधन राम जी ने समाज सेवा को नया आयाम दिया है। कीनारामी परम्परा के इस आश्रम को नेपाल में बड़ी ही श्रद्धा से देखा जाता है ।

अफगानिस्थान
अफगानिस्तान के पूर्व शासक शाह जहीर शाह के पूर्वजों ने काबुल शहर के मध्य भाग में कई एकड़ में फैला जमीन का एक टुकड़ा कीनारामी परम्परा के संतों को दान में दिया था । इसी जमीन पर आश्रम, बाग आदि निर्मित हैं । औघड़ रतन लाल जी यहाँ पीर के रुप में आदर पाते हैं । उनकी समाधि तथा अन्य अनेक औघड़ों की समाधियाँ इस स्थल पर आज भी श्रद्धा नमन के लिये स्थित हैं ।

क्रमशः






 

शनिवार, मई 08, 2010

अघोर परम्परा के प्रसिद्ध स्थल

बिंध्याचल
बिंध्य की पर्वत श्रृँखला एवं उसमें अवस्थित माँ बिंध्यवासिनी का शक्तिपीठ भारत ही नहीं अपितु समग्र विश्व में प्रसिद्ध है । मिरजापुर इस स्थल का रेलवे स्टेशन है, जहाँ से इसकी दूरी मात्र आठ किलोमीटर है । सड़क मार्ग से यह स्थान बनारस, इलाहाबाद, मऊनाथभंजन, रीवा, और औरंगाबाद से जुड़ा हुआ है । बनारस से ७० किलोमीटर तथा इलाहाबाद से ८३ किलोमीटर की दूरी पर बिंध्याचल धाम स्थित है ।

कहा जाता है कि महिषासुर बध के पश्चात माता दूर्गा इसी स्थान पर निवास हेतु ठहर गईं थीं, इसीलिये यहाँ की अधिष्ठात्री देवी माता दूर्गा को बिंध्यवासिनी के रुप में पूजन किया जाता है । इस स्थल में तीन मुख्य मन्दिर हैं । विन्ध्यवासिनी, कालीखोह और अष्टभुजा । इन मन्दिरों की स्थिति त्रिकोण यन्त्रवत् है । इनकी त्रिकोण परिकरमा भी की जाती है । इस पर्वत में अनेक गुफाएँ हैं, जिनमें रहकर साधक साधना करते हैं । आज भी अनेक साधक , सिद्ध, महात्मा, अवधूत, कापालिक आदि से यहाँ भेंट हो सकती है । इनके अलावा इस स्थल में सैकड़ों मन्दिर बिखरे पड़े हैं ।
बिंध्याचल पर्वत में तीन मुख्य कुण्ड हैं । प्रथम सीताकुण्ड है । कहते हैं रावण बध के पश्चात भगवान रामचन्द्र जी की वापसी यात्रा के समय भगवती सीता जी को बड़ी प्यास लगी । रामअनुज लक्ष्मण जी के तीर चलाने से इस कुण्ड का निर्माण हुआ और भगवती सीता माई की प्यास का शमन हुआ । यहीं से मन्दिर के लिये सीढ़ियाँ जाती हैं । पहले अष्टभुजा मन्दिर है । अष्टभुजा मन्दिर में ज्ञान , विवेक की देवी माता सरस्वती बिराजती हैं । उससे उपर कालीखोह है । यह स्थान यथा नाम काली जी का है । फिर आता है बिंध्याचल का मुख्य मन्दिर माता बिंध्यवासिनी मन्दिर ।
अघोरेश्वर भगवान राम जी अपने साधना काल में कई वर्षों तक बिंध्याचल में रहे थे । बिंध्याचल में अष्टभुजा मन्दिर से कालीखोह की तरफ थोड़ी दूरी पर एक स्थान आता है, भैरव कुण्ड । यहाँ से प्रायः तीन सौ मीटर की उँचाई पर एक गुफा है । इसी गुफा में अघोरेश्वर रहते थे । आपको याद होगा इसी गुफा में जशपुर के महाराजा स्वर्गीय बिजयभूषण सिंह देव ने अघोरेश्वर का प्रथम दर्शन किया था । बाबा के इस स्थल पर निवास, तपस्या की स्मृति में एक कीर्ति स्तम्भ स्थापित किया गया है, जिसके चारों ओर बाबा के संदेश अँकित हैं । गुफा के भीतर भक्तों, श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ अघोरेश्वर की चरण पादुका एक चट्टान में जड़ दी गई है । यहाँ कई एक साधक आकर नाना प्रकार की साधनाएँ करते और अघोरेश्वर की कृपा से सिद्धी पाकर कृतकृत्य होते हैं ।
भैरवकुण्ड के स्वामी अक्षोभ्यानन्द सरस्वती , जो अघोरपथ के पथिक तो नहीं थे, परन्तु आचार, व्यवहार, शक्ति,और विद्या के मामले में अधिकारी विद्वान थे । स्बामी जी शाक्त परम्परा के कुलावधूत थे । आपको वाक् सिद्धी थी । आपकी प्रसिद्धी दूर दूर तक थी । गृहस्थ से तप के मार्ग में चलकर जिन गिनेचुने महान आत्माओं ने अध्यात्म की उच्चावस्था को प्राप्त किया है, उनमें से एक भैरवकुण्ड के स्वामी अक्षोभ्यानन्द सरस्वती जी भी हैं ।
क्रमशः