शनिवार, मार्च 13, 2010

अघोर साधना के मूल तत्वः होम व हवन

पुरातन काल में होम व हवन भिन्नार्थक हुआ करते थे । किसी पूजा अनुष्ठान, किसी सामाजिक कर्मकाण्ड, किसी जन बहुल उत्सव की समाप्ति की घोषणा के समय होम अनुष्ठित करने की प्रथा थी । होम में मुख्यतः समिधा की आहूति दी जाती थी । हवन होम से अलग दूसरे प्रकार की क्रिया होती थी । वैदिक देवी देवताओं को तृप्त करने तथा उनकी कृपा प्राप्ति के निमित्त यह कार्य किया जाता था । विभिन्न देवताओं के लिये हवन में समिधा के अलावा अलग अलग वस्तुओं की आहुति दी जाती थी । इसमें समिधा के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ, तण्डुल, गोधूम, पकवान, चन्दन  काष्ठ, धूप, धूनी, पशु मुण्ड, रक्त, माँस, विजित शत्रु का सिर, रक्त, माँस आदि की आहुति दी जाती थी ।

होम तो आज भी किया जाता है । सत्यनारायण कथा के अंत में, गणेशपूजा , दूर्गा पूजा, गृहारंभ के समय वास्तु पूजा, गृह प्रवेश के समय की पूजा आदि सब समय अंत में होम होता है । लोग मानते हैं कि होम के सुगन्ध भरे धुआँ मर्त्यलोक से उर्घ्वलोक में उत्थित होगा और वायु और आकाश विभिन्न गंधों से परिपूर्ण  हो जायेंगे जिससे पूजित देवता तृप्त होकर कृपा करेंगे ।

तन्त्र ग्रंथों में हवन का वर्णन विशद रुप से आता है । किसी भी मन्त्र का , देवता का अनुष्ठान की पूर्णता तभी होती है जब निश्चित मात्रा में जप किया जाय, जप का दशाँश हवन हो तथा हवन का दशाँश ब्राह्मण भोजन, जिसे आजकल भंडारा के रुप में किया जाता है , करना होता है । मन्त्र , देवता के अनुसार हवन में आहुति की मात्रा एवं सामग्री निश्चित होती है ।

अघोरपथ में भी हवन किया जाता है । अघोरपथ में हवन के बारे में निर्दिष्ठ बिधि की लिखित जानकारी तो अप्राप्य है, हाँ अघोरेश्वर भगवान राम जी के प्रवचनों में और साधकों ने अवधूत, अघोरेश्वर को जैसा हवन करते देखकर विवरण छिटपुट रूप से दिया है, उतनी ही जानकारी प्राप्त होती है । यह विवरण हवन के सर्वज्ञात स्वरुप के जैसा ही है अतः उसकी चर्चा करना पुनरुक्ति ही होगी ।
क्रमश:

शुक्रवार, मार्च 05, 2010

अघोर साधना के मूल तत्वः प्राणायाम

आज के समय में प्राणायाम कोई नया विषय नहीं है । भारत वर्ष में सभी किसी न किसी प्रकार से प्राणायाम से जुड़े हैं , वह चाहे स्वाश्थ्य रक्षा के निमित्त हो या आध्यात्मिक उन्नति के लिये साधना हो । प्राणायाम के विषय में बाजार में अनेक पुस्तकें , अनेक प्रशिक्षक , तथा अनेक संस्थाएँ  उपलब्ध हैं । हम यहाँ संक्षेप में प्राणायाम के विज्ञान की चर्चा करेंगे ।

प्राण श्वाँस प्रश्वाँस के समग्र को कहते हैं ।  श्वाँस प्रश्वाँस के सम्पूर्ण आयाम को नियंत्रित करने के विज्ञान का नाम है प्राणायाम । प्राण जीवन का आधार है । जब तक शरीर में प्राण का प्रवाह चल रहा है, मनुष्य जीवित है । प्राण की क्रियाशीलता समाप्त होते ही मनुष्य का शरीर मृत हो जाता है । जीवन के रहते तक ही संसार है, सारा प्रपञ्च है । अतः यह सिद्ध है कि मनुष्य के लिये प्राण की अहमियत और सबसे अधिक है ।

योग परम्परानुसार प्राण को पाँच विभागों में बाँटा गया है ।

१, प्राणः  शरीर के उपरी हिस्से में कण्ठनली, श्वासपटल और अन्न नलिका में यह क्रियाशील रहता है । यह श्वसन अँगों को क्रियाशील बनानेवाली माँसपेशियों को श्वास नीचे खींचने की क्रिया में सहयोग करता है । मनुष्य के जीवन का मुख्य हेतु यही प्राण है ।

२, अपानः  यह नाभि प्रदेश के नीचे क्रियाशील रहता है । वृक्क, मुत्रेंद्रिय, बड़ी आँत, गुदाद्वार के संचालन का आधार यही है । शरीर के दूषित वायू का निष्कासन यही करता है । कुण्डलिनी जागरण की क्रिया में भी इसका महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है ।
 
३,  समानः  छाती और नाभि के बीच प्रसरण करने वाला यह प्राण पाचन संस्थान, यकृत, क्लोम एवं जठर, आदि को नियंत्रित करता है । यह हृदय एव् रक्त अभिसरण को भी क्रियाशील रखने का हेतु है ।

४, उदानः नेत्र , नासिका, कान आदि इन्द्रियाँ तथा मस्तिष्क को क्रियाशील बनाये रखने का जिम्मा इसी प्राण का है । सोच विचार की शक्ति या चेतना का कारण यही पंराण है ।

५,  व्यानः  समस्त शरीर में व्याप्त रहकर यह अन्य प्राणों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य इसके द्वारा सम्पन्न होता है । माँसपेशियों , तन्तुओं, नाड़ियों तथा संधियों को क्रियाशील रखता है ।

इसके अलावा पाँच उपप्राण भी बताये गये है ।
१, नाग
२, कूर्म
३, क्रिकल
४, देवदत्त
५, धनंजय

उपप्राण शरीर की छोटी छोटी क्रियाओं जैसे छींकना, जमुहाई लेना, पलक झपकाना, हिचकी लेना आदि को सम्पादित करते हैं । अघोरपथ में धनंजय उपप्राण, जिसकी उपस्थिति कपाल में मानी गई है, के विषय में उल्लेख मिलता है । शवदाह के समय धनंजय प्राण को कपाल से मुक्त करने के लिये ही कपालक्रिया की जाती है । औघड़ या कापालिक इसी धनंजय प्राण का संधारण कपाल साधना के द्वारा करता है ।

साधारण योग प्रणाली में प्राण को नियंत्रित करना होता है । प्राण को नियंत्रित करना ही प्राणायाम है । प्राण के नियंत्रण से मन नियंत्रित होता है । ये दोनो ही निरंतर क्रियाशील रहने वाले हैं । प्राण के चंचल होने से मन चंचल होता है और मन के चंचल होने से प्राण चंचल हो जाता है । दोनो एक दूसरे के पूरक हैं । देह के तल पर प्राणायाम के लिये आसन सिद्धि नितान्त आवश्यक है । आसन सिद्ध होने पर वह एक आसन में लम्बे समय तक स्थिर बैठ सकता है । इससे शरीर में कम्पन नहीं होता, प्राण की क्रिया शाँत होती जाती है, शरीर हल्का हो जाता है और शरीर का भान मिटने लगता है । इस स्थिति का प्रभाव इन्द्रियों  और मन पर पड़ता है और योगी का सम्पर्क बाह्य जगत से बिच्छिन्न हो जाता है । यही प्रत्याहार अवस्था कहलाती है । इसके बाद योगी अन्तर जगत नें प्रवेश कर जाता है । आगे धारणा, ध्यान, और समाधि की क्रिया होती है ।

अघोरपथ में प्राण का महत्व अत्यधिक माना गया है । अघोरेश्वर भगवान राम जी ने कहा हैः " प्राणवायु ही हमारा उपास्य है ।"  एक अन्य मौके पर उन्होने कहा था किः " प्राणमय गुरु सदैव, सर्वत्र, सहज में , अभ्यास से जाने जाते है, देखे जाते हैं और उनसे शक्रगामी फल प्राप्त किये जा सकते हैं । गुरु देह नहीं हैं, प्राण हैं ।"

संत, महात्मा, अघोरेश्वर आदि ने कहीं कहीं प्राण की त्रिविध गति की अत्यंत संक्षेप में चर्चा की है । एक बाह्य और आभ्यन्तरिक गति, या सामान्य श्वास प्रश्वास । दूसरी अधः ऊर्ध्व गति या शरीर के नीचे से हृदय की ओर गति । तीसरी हृदय से ब्रह्मरंध्र गति । यह तीसरी गति अत्यंत रहस्यमय है ।इस गति का परिमाण ३६ अंगुल बताया गया है । योगी के लिये इस गति का अधिकारी होना श्रेष्ठ है ।

प्राणायाम स्वयमेव नहीं करना चाहिये । किञ्चित व्यतिक्रम होने से रोग होने की सम्भावना होती है ।

क्रमशः



सोमवार, मार्च 01, 2010

अघोर साधना के मूल तत्वः ब्रह्मचर्य

संसार के सभी धर्मों में अध्यात्म के क्षेत्र में ब्रह्मचर्य को अत्यंत आवश्यक माना गया है । सन्यासी को , विरक्त को इसीलिये शुरुआत में ब्रह्मचारी भी कहा जाता है । पन्चभूतों में सामन्जस्य स्थापित करने और चित्त की वृत्तियों के निरोध के लिये इसे आवश्यक माना गया है । भारत में पुरातन काल से ही शरीर विज्ञानी वीर्य संचय तथा वीर्य से ओज निर्माण की प्रक्रिया से परिचित रहे हैं । वीर्य संचय से ओज बढ़ता है और ओज ही मानव को प्राणवान बनाता है ।

आध्यात्मिक इतिहास में कुछ गिने चुने महाबीर ऐसे हुए हैं, जो गृहस्थ होते हुए भी योग की उच्चावस्था को प्राप्त किये । उनमें से हम दो महापुरुषों की चर्चा करेंगे । एक थे पूज्य श्री रामकृष्ण देव और दूसरे थे लाहिड़ी महाशय । दोनों महायोगी थे इसमें कुछ भी संशय नहीं है । श्री रामकृष्ण देव विवाहित होते हुए भी सन्यस्त का जीवन जीते थे । उनमें ब्रह्मचर्य ने अपने शिखर में उदघोषित हुआ है । श्री लाहिड़ी महाशय गृहस्थ तो थे ही , गृहस्थ धर्म का पालन भी करते थे । उन्होंने जन सामान्य के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया कि गृहस्थ भी अपने तप के बल से सिद्धावस्था प्राप्त कर सकता है । उन्होंने अपनी डायरी में एक बार स्त्रीप्रसंग के विषय में लिखा है कि साधक के लिये १५ दिनों में स्त्रीप्रसंग करना अनुकूल होता है ।

अघोरपथ में वीर्य संचय को परमावश्यक माना गया है । अघोरेश्वर बाबा कीनाराम जी कहते थेः

" भग बीच लिंग, लिंग बीच पारा, जो राखे सोई गुरु हमारा ।"

अघोरपथ में ब्रह्मचर्य की स्थिति को स्पष्ठ करने के लिये अघोराचार्य बाबा कीनाराम जी के समय की कथा है । कथा कहती है किः

" एक बार बाबा कीनाराम जी के एक शिष्य बाबा दिगम्बर राम जी को लोगों ने फैजाबाद में वेश्याओं के साथ बैठे देखा । बाबा जी से शिकायत हुई । बाबा ने दिगम्बर राम को बुलवाया और कहाः " तुम रमणियों के साथ रहते हो जिससे बदनामी होती है । तुम कहीं ब्रह्मचर्य से च्युत तो नहीं हो गये हो ? यह बड़ा ही निन्दनीय और अशोभनीय कार्य है , और साधु के लिये उपयुक्त नहीं है । इस असराहनीय कार्य से विरत नहीं हुए और ब्रह्मचर्य से च्युत हो गये हो तो मैं तुझे देखना पसन्द नहीं करुँगा ।

अघोरेश्वर भगवान राम जी ने एक बार अपने शिष्यों को सम्बोधित करते हुए कहा था किः
" प्रिय शिष्यो ! नितम्बना के चक्कर में दुनियाँ के सारे मनुष्य प्राणी चिंतन में लग जाते हैं । और इसी नितम्बना के चलते, उनके अधिक मोह में लगे रहने के कारण साधु पुरुष को भी या महापुरुष को भी भय लगता है कि मार्ग कहीं बदल न जाय । हम उस देवी का आदर करते हैं । हम उनको  दूसरे रुप में आदर करते हैं । जिस रुप में गृहस्थ करते हैं, उस रुप में नहीं । अघोरेश्वर जनों को उनकी याद में ही विश्वास है, न कि उनके सम्पर्क में । कुत्ता ही है, गाय बैल भी हैं, मगर वे नितम्बना का सेवन समय, काल और साल में एक बार पूजन करते हैं । मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो नितम्बना के चिंतन में सदा लगा रहता है । उस मनुष्य से क्या आशा की जा सकती है, जिसका मस्तिष्क नितम्बना के चरणों में बन्धक रह जाता है । कुत्ता भी है तो वह कुतिया के पास साल में रजस्वला होने पर जाता है । स्वजाति में जाता है, परजाति में नहीं । अगर्भवती में जाता है, गर्भवती में नहीं । मनुष्य स्वजाति में भी, परजाति में भी जाता है और समय काल को भी तिलाञ्जलि दिये रहता है ।"

अघोरपथ में चारों अंगों से ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है । ये चार अंग हैं‍ , १, मन २, कर्म ३, वचन या जिव्हा और ४, चक्षु । साधक को हर समय सावधान रहने की आवश्यकता होती है, अन्यथा काम को अपना पाँव पसारने में समय नहीं लगता ।

क्रमशः



बुधवार, फ़रवरी 24, 2010

अघोर साधना के मूल तत्व - चक्रपूजा

चक्रपूजा साधारण अर्थ में चक्राकार या गोलाकार बैठकर पूजन करना है । इसका प्रचलन शाक्त साधकों में बहुतायत से प्राप्त होता है । तन्त्र ग्रंथों में इसका उल्लेख बार बार आया है । कतिपय तन्त्र ग्रंथों में इसे महापूजा के नाम से भी अभिहित किया गया है । चक्र पूजा में आनन्द भैरव और आनन्द भैरवी का आवाहन एवं पूजन किया जाता है । कहीं कहीं अपने इष्ट देव का पूजन भी प्रचलित है । चक्रपूजा के कई प्रकार प्राप्त होते हैं । जैसेः भैरवी चक्र,  राज चक्र,  महा चक्र,  देव चक्र,  बीर चक्र,  पशु चक्र आदि । साधारण जनों में भैरवी चक्र के प्रति अनेक भ्रान्तियाँ फैली हुई हैं । वे इसमें कामक्रिया की प्रत्यासा करते हैं तथा इस चक्रपूजा के नाम पर निराधार, ऊलजलूल प्रक्रियाओं को अपना कर अपना और समाज दोनो की हानि करते हैं ।
शाक्त मत में कौल साधकों में भी चक्रपूजा करने का चलन है । वे घट तथा नव चरुओं की स्थापना करते हैं । घट में इष्ट देवी की पूजा होती है । नौ प्रकार के चरुओं को हेतू , कारण या मदिरा |  द्राक्षा, गौडी,  पैष्टी, धान्या, माध्वी, खार्जुरी,  वाल्कली,  पौष्पी,  आदि मदिरा के प्रकार हैं । | से पूर्ण किया  जाता है । बीर अपनी शक्ति सहित पूजन करते हैं । आज के समय में शाक्तों में भैरवी चक्र का अनुष्ठान "पुरी" नामधारी सन्यासियों के एक सुव्यवस्थित मण्डल द्वारा किया जाता है । वे ही इस विधान के अधिकारी साधक बतलाये जाते  हैं ।

भारत के अलावा तिब्बत में भी चक्रपूजा अनुष्ठित होता रहा है । बौधों के एक सम्प्रदाय वज्रयानियों ने वहाँ इसे गणपूजा या गणचक्रपूजा का नाम दिया है । इसका स्वरुप स्थान , काल, और पात्र के अनुसार भिन्नता लिये हुए है .

अघोरपथ में भी चक्रार्चन किया जाता है । अघोरेश्वर, अघोराचार्य, अवधूत, गुरू के सानिध्य में यह चक्रार्चन सम्पन्न होता है । अघोरपथ में यह गोप्य पूजन माना जाता है । कभी कभी किसी अधिकारी शिष्य के दीक्षा संस्कार के लिये भी चक्रार्चन आयोजित होता है । चक्रार्चन सामान्यतः नवरात्री की अष्टमी तिथि को रात्री बेला में आयोजित होता है । अघोरेश्वर भगवान राम जी के एक शिष्य ने उसके दीक्षा संस्कार के समय आयोजित चक्रार्चन का विवरण कुछ इस प्रकार बतलाया हैः

" रात्रि के ग्यारह बजे के आसपास का समय रहा होगा । बाबा का बुलावा आया । बाबा के पास जाने पर आदेश हुआ कि बगल में बैठो । सकुचाते हुए बाबा के बगल में बैठ गया । और भी बहुत सारे लोग थे । एक गोल बनाकर सब बैठ गये । क्या होने वाला है मैं कुछ नही् जानता था । सबके सामने पत्तल रखा गया । बाबा से शुरु करके सबके पत्तलों में नाना प्रकार की खाद्य सामग्री परोसी गई । उसमे रोटी भी थी, चावल भी था,  दाल भी थी,  सब्जियाँ थीं, भुना माँस भी था । परोसने का क्रम बाबा से शुरू होता तथा बाबा के बाएँ से गोल घूमकर फिर बाबा के पास लोग पहुँच जाते थे । परोसने का क्रम समाप्त होने के बाद बाबा जी ने अपना खप्पर बाएँ हाथ में लेकर उपर उठाया । एक भक्त ने बाबा के खप्पर को दो तीन बोतल मदिरा डालकर भर दिया । बाबा ने कुछ मन्त्र बुदबुदाया तथा घोष किया " ॐ शिवोहं, भैरवोहं, गुरुपदरतोहं ।"  तत्पश्चात बाबा ने उस खप्पर से पान किया और पात्र बाएँ बैठे शिष्य की तरफ बढ़ा दिया । उस शिष्य ने भी खप्पर से एक घूँट पान कर आगे बढ़ा दिया । खप्पर इसी प्रकार आगे बढ़ते बढ़ते पुनः बाबा के हाथ मे आ गया । बाबा ने पुनः मन्त्रोच्चार किया और खप्पर में से पान कर पात्र बाईं ओर बढ़ा दिया । यह प्रक्रिया तीन बार चली । इसके बाद सामने रखे पत्तल में से एक एक ग्रास बाबा को सब लोग खिलाये, बाबा ने भी सबको अपने पत्तल में से खिलाया । उसके बाद भोजन हुआ । भोजन के पश्चात बाबा जी ने फिर कुछ मन्त्रोच्चार किया । फिर कुछ और तरह के मन्त्रोच्चारण हुए, जिसमे हम सब लोग बाबा जी के साथ उच्चारण किये । इसके बाद बाबा जी के श्री चरणों में हम सब प्रणाम निवेदन करने लगे । बाबा सबको आलिंगन करते थे । और चक्रपूजन समाप्त हुआ ।"
क्रमशः

शनिवार, फ़रवरी 20, 2010

अघोर साधना के मूल तत्व

" भग बिच लिंग, लिंग बिच पारा \
जो राखे सो गुरु हमारा \\ "

इस पूरी धरती में आदिकाल से ही मानव जीवन के प्रति मुख्यतः दो दृष्टिकोण प्राप्त होते हैं । एक तो वे लोग हैं जो जीवन को भोग का अवसर मानकर तद् अनुरुप आचरण करते हैं । वे किसी परमसत्ता के अस्तित्व को, जो धरती पर के समस्त क्रियाकलापों का संचालन करता हो, स्वीकार नहीं करते । उनका तर्क है कि परमसत्ता के अस्तित्व का ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जो सार्वकालिक होने के साथ ही निर्विवाद भी हो । यह लोगों के मन की कल्पना मात्र है । कुछ प्रबुद्धजनों ने अपना हित साधन के उद्देश्य से परमसत्ता के प्रति भय का वातावरण बनाया और अपने मन की कल्पना को जन सामान्य के हृदय में बड़े ही चतुराई से प्रतिस्थापित कर दिया है । दूसरे प्रकार के लोग परमात्म तत्व की सत्ता को न केवल स्वीकार करते हैं वरन् स्वयं को परमात्मा का अंश आत्मन् के रुप में मानकर आत्मा के परमात्मा में मिलन के लिये चेष्टा करते है, जिसे साधना कहते हैं । इसी भित्ती पर संसार के समस्त धर्म, सम्प्रदाय, आदि खड़े हैं ।

भारत में आदिकाल से ही निष्ठा के आधार पर साधकों, श्रद्धालुओं, भक्तों, संतों, महात्माओं को पाँच प्रकार में बाँटा गया है ।

१, शैव, जिनके आराध्य देव शिव जी हैं ।

२, शाक्त, जिनके आराध्य देव शक्ति हैं ।

३, वैष्णव, आराध्य देव श्री विष्णु हैं ।

४, गाणपत्य, जिनके आराध्य देव गणेश हैं ।

५, सौर, जिनके आराध्य देव सूर्य देव हैं ।

जो एकनिष्ठ देव आराधक नहीं हैं उनमें या विशेष प्रयोजनवस पँच देवोपासना भी प्रचलित है ।

अघोरपथ इनमें शामिल नहीं हैं, क्योंकि अघोरियों का कोई एक देवता आराध्य नहीं है । अघोर आश्रमों में सामान्यतः देवी मंदिर के अलावा शिव लिंग, गणेश पीठ, पाये जाते हैं । अघोरेश्वर भगवान राम जी ने विष्णु यज्ञ भी कराया था । सूर्य देव तो प्रत्यक्ष देवता हैं ही ।

इस विषय में अघोरेश्वर भगवान राम जी ने अपने आशीर्वचनों में कहा हैः

" हम लोग शैव और शाक्त दोनों के मत में रहने वाले हैं । हम लोगों का अनुष्ठान शैव और शाक्त के मध्य से चलता है । औघड़ न शाक्त होते हें न शैव होते हैं । इनका मध्यम मार्ग है । शक्ति की भी उपासना करते हैं और रुद्र की भी उपासना करते है । हमारी भगवती जिसकी हम आराधना करते हैं, श्री सर्वेश्वरी, काली, या दुर्गा, इनकी मूर्तियाँ वैदिक युग की नहीं हैं क्योंकि वैदिक युग में शिव के यंत्रों की आकृति है और उसे ही माना गया है । उस युग से पहले की हो सकती है या उस युग में भी हो सकती है । यह ब्राह्मणों के ध्यान की मूर्ति नहीं है । यह योगियों के ध्यान की मूर्ती है । "

अघोरी जाति, वर्ण, धर्म, लिंग, आदि किसी में भेद नहीं करते । अघोर दीक्षा के पश्चात क्रीं कुण्ड स्थल के महंथ बाबा राजेश्वर राम जी ने किशोर अवधूत भगवान राम जी को समझाया था ।

" हमारी कोई जाति नहीं, हम सभी धर्मों के प्रति आदर रखते हैं । हम छूआछूत में विश्वास नहीं करते । हम प्रत्येक मनुष्य को अपना भाई और प्रत्येक स्त्री को माता समझते हैं । मानव मानव में कैसा भेद, कैसा दुराव ? "

अघोरी, औघड़, अवधूत विधि निषेध से परे होते हैं ।

१, शिष्य का अधिकार

अघोर पथ में गुरु का स्थान सर्वोपरी हैं । अध्यात्म के अन्य क्षेत्रों में सामान्यतः शिष्य गुरु बनाता है , लेकिन अघोर पथ में ऐसा नहीं है । श्रद्धालु का , भक्त का, औघड़, अवधूत से निवेदन करने से दीक्षा, संस्कार हो जावे यह अवश्यक नहीं है । यहाँ गुरु शिष्य को चुनता है । हमें यह प्रक्रिया अन्य सिद्धों के मामले में भी दिखाई देती है । पूर्व में लाहिड़ी महाशय का चुनाव उनके गुरु बाबा जी ने किया था और अपने पास बुलाकर उन्हें दीक्षा देकर साधना पथ पर अग्रसर कराया था । स्वामी विवेकानन्द जी का चुनाव रामकृष्ण देव ने किया था । और भी अनेक उदाहरण हैं । स्पष्ठ है कि यह शिष्य के अधिकार की बात है । अनेक जन्मों के संचित सत् संस्कार जब फलीभूत होते हैं तो शिष्य का क्षेत्र , अधिकार, पात्र तैयार हो जाता है और दीक्षादान हेतु गुरु के हृदय में करुणा का संचार हो जाता है । इस प्रकार दीक्षा घटित होती है ।

शिष्य के अधिकार के अनुसार गुरू उसका संस्कार करते हैं ।

२, दीक्षा

पूर्व में दीक्षा संस्कार की चर्चा हो चुकी है । अघोरपथ में गृहस्थों को तथा अधिकार के अनुसार विरक्तों को भी साधक दीक्षा प्रदान होती है । योगी दीक्षा सम्पन्न साधु मुड़िया कहलाते हैं । हम यहाँ दीक्षा के प्रकार की चर्चा एक बार पुनः कर लेते हैं ताकि विषय स्पष्ठ रहे ।

अघोर पथ में दीक्षा दो प्रकार की होती है ।

"अ, योगी दीक्षाः

योगी दीक्षा की प्रक्रिया थोड़ी अलग होती है । योगी की कुण्डलिनी को गुरुदेव दीक्षा के समय ही जगा देते हैं । योगी को कुण्डलिनी शक्ति साकार इष्टदेवता के रुप में प्राप्त हो जाती है, बाद में अपने कर्मों के द्वारा उसकी आराधना शुरु करता है । योगी अधिक सामर्थवान होता है । उसे वासना का त्याग नहीं करना पड़ता । योगी वासनादि को निर्मल बनाकर अपनी निज स्वरुप में नियोजित कर लेता है । वह शरीर से भी इष्टदेवता का दर्शन करने में समर्थ हो जाता है । योगी जब पूर्ण सिद्ध हो जाता है तब उन्हें निर्मल ज्ञान मिलता है या सत्य का साक्षात्कार हो जाता है । वह अलौकिक शक्ति का अधिकारी बन जाता है । इसमें तीन प्रधान शक्तियाँ हैं इच्छा, ज्ञान और क्रिया । ज्ञान शक्ति से वह सर्वज्ञ तथा क्रिया के प्रभाव से सर्वकर्ता बन जाता है । इच्छा शक्ति के प्रभाव से योगी कोई भी कार्य कर सकता है । इस शक्ति के उदय होने से ज्ञान तथा क्रिया की आवश्यकता नही् होती पर योगी के इच्छानुसार कार्य होता है । अघोर पथ में दीक्षा संस्कार के समय गुरु अधिकारी शिष्य की कुण्डलिनी जगाकर तीन चक्र ! मूलाधार, स्वाधिष्टान और मणिपुर तक उठा देते हैं । इसके बाद उस योगी का ईष्ट साकार हो जाता है और फिर शुरु हो जाती है उनकी बिलक्षण आराधना ।"

ब, साधक दीक्षाः

दीक्षादान होने पर गुरुपदिष्ठ बीजमन्त्र साधक के हृदयदेश में स्थापित होता है तथा साधक के द्वारा गोपनीय विधियों के द्वारा शोधित और रक्षित होकर पुष्ट होता रहता है । समयकाल पाकर बीज आकार धारण करता है और बाद में यही सत्ता साकार इष्टदेवता के रुप में प्रकट होता है । योगी दीक्षा और साधक दीक्षा दोनो में ही कुण्डलिनी जागरण होता है । साधक दीक्षा में शक्ति का इतना संचार हो जाता है कि जैसे ही पुरुषाकार का योग होता है कुण्डलिनी जाग जाती है । बाद में गुरु प्रदत्त कर्म के समुचित सम्पादन से उक्त जाग्रत शुद्ध तेज प्रज्वलित होकर साधक के वासना, संस्कार आदि के आवरण को भस्म कर देता है । साधक का विकास होते होते अन्त में सिद्धावस्था आती है जब वासनादि समस्त कल्मशों का सम्पूर्ण रुप से क्षय हो जाता है और कुण्डलिनी शक्ति इष्टदेवता के रुप में प्रकट होती है, पर उस समय साधक का देह नहीं रहता । साधक में सिद्धि के आविर्भाव के साथ साथ देहान्त हो जाता है ।

अघोरपथ में साधना विषयक समस्त बातें गोपनीय होती हैं । दीक्षा की प्रणाली, मन्त्र, बिधि, क्रिया, ओषधि समस्त बातें व्यक्तिनिष्ठ होने के कारण उन तक किसी की भी पहुँच असंभव है । अधिकारी सन्त, महापुरुष जितना अपने प्रवचनों में बतला देते हैं वही ज्ञात हो पाता है । दीक्षा का मूल मन्त्र कहा गया है, अतः कुछ चर्चा मन्त्र की भी आवश्यक हो जाती है ।

३, मन्त्र

भारत में मन्त्र का एक अलग शास्त्र है । मन्त्र विज्ञान इतना उन्नत है कि जीवन के प्रत्येक क्रियाकलाप हेतु अलग अलग मन्त्र हैं । हम मन्त्र के विषय में विशद चर्चा पूर्व में कर चुके हैं अतः उसे दुहराना आवश्यक नहीं है ।

अघोरमन्त्र को समस्त मन्त्रों में सर्वोपरि बतलाया गया है और कहा गया है किः

" ॥ अघोरान्ना परो मन्त्रः नास्ति तत्वं गुरो परम् ॥"

शिष्य को गुरु, उसकी प्रकृति, अधिकार, शक्ति तथा इष्ट के अनुरुप मन्त्र दान करते हैं । इसीलिये गुरु प्रदत्त इस मन्त्र को इष्टमन्त्र या गुरुमन्त्र भी कहते हैं । यह मन्त्र शिष्य के हृदय देश में स्थापित होकर उसकी सिद्धी तथा मुक्ति का वाहक बनता है । इष्ट मन्त्र के अलावा प्रयोजन के अनुसार साधक अन्य अनेक मन्त्रों का भी प्रयोग करता है ।

अघोरेश्वर भगवान राम जी ने मन्त्र के विषय में बतलाया हैः

" मन्त्रों में किसी का नाम नहीं दिया गया है । ॠषियों ने उन मन्त्रों का दर्शन किया है, और उस दर्शन में उन शब्दों का, जिससे उसमें आकर्षण होता है । वह द्रवित होता है, और वह उस महान आत्मा की तरफ झुकता है । और उस महान आत्मा की तरफ झुक कर इतना तेज, इतना काँति, बल, पौरुष पा जाता है । उसके शरीर की रश्मियाँ, उसके शरीर की वह दिव्य, तेजोमय कान्तियाँ, जिसके शरीर में वह छोड़ता है, यह सब कुछ देता है । "

४, क्रिया

इस शरीर से विधिपूर्वक निश्चित उद्देश्य से किये गये काम को क्रिया कहते हैं । जप, हवन, तर्पण आदि कार्य इसके अन्तर्गत शुमार होते हैं । यह एक विशद विषय है । अघोरपथ में क्रियाएँ गुरु प्रदान करते हैं ।

५, औषधि

फूल, फल, दूब, पत्र, दुधुवा आदि औषधि के भीतर गिनी जाती हैं । हर एक वस्तु का अपना प्रयोजन है । मदिरा या दुधुवा का प्रयोग साधना की उच्चावस्था में कतिपय मानसिक दुर्बलताओं पर विजय पाने के लिये किया जाता रहा है, परन्तु अघोरेश्वर भगवान राम जी ने मदिरा का सेवन निषिद्ध कर दिया है ।

क्रमशः

शुक्रवार, फ़रवरी 12, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः किशोरवय के सहचर

अघोरेश्वर की लीला यत्र तत्र सर्वत्र शिष्यों, श्रद्धालुओं, भक्तों के हृदय में बिखरी पड़ी हैं । कुछ एक को शब्दों की माला में पिरोकर ज्ञानीजनों ने जन सामान्य के लिये सुलभ करा दिया है, परन्तु बहुत कुछ अभी बाकी है । अनेक लोग बाबा के सम्पर्क में आकर नाना प्रकार की अनुभूति से दो चार हुए हैं । बहुत कुछ देखा है, सुना है और उनकी प्रेरणा से किया भी है । बाबा प्रत्यक्ष में कुछ करते कभी नहीं दिखते थे । सब कुछ सामान्य ढ़ंग से होता रहता था, जिसे आप चमत्कार कहें या और कुछ और । बाबा की किशोरावस्था में जो लोग सम्पर्क में आये, उनमें से कुछ से यहाँ पर हम परिचय पाने का प्रयास करेंगे ।

बाबा कृष्णाराम अघोरी

अघोरेश्वर के प्रथम सहचर के रुप में आपकी चर्चा बहुत ही सीमित रुप में आती है । आप बहुत ही थोड़े समय तक ही बाबा के साथ देखे गये थे । आप उड़िया भाषी थे । उत्कल प्रदेश से दूर बनारस में किशोर अवधूत के साधनाकाल में उनकी सेवा में होना, साबित करता है कि कृष्णा राम जी सिद्धावस्था प्राप्त अघोरी थे । बाबा कृष्णा राम जी के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है क्योंकि आप हिन्दी नहीं बोलते थे, या शायद हिन्दी नहीं जानते थे, अतः अन्य श्रद्धालु, भक्तों से आपका सम्पर्क नहीं हो पाया । आपके नाम के साथ राम लगा है अतः निश्चित रुप से आप किनारामी परम्परा के औघड़ थे । किशोर अवधूत की गुण्डी तथा बगवाँ यात्रा के समय वहाँ के लोगों ने आपको देखा था । उनकी स्मृति में आप भाषा के कारण ही जगह पा गये । बनारस के भक्तों ने आपकी कभी चर्चा नहीं की है । उक्त एक यात्रा के बाद आपको कभी, कहीं, किसी ने नहीं देखा ।

श्री केदार सिंह उर्फ फोकाबीर

श्री केदार सिंह जी, जिन्हें अघोरेश्वर प्यार से फोंकाबीर कहते थे, बाबा के समर्पित भक्तों में अन्यतम थे । आपका निवास ईश्वरगंगी, बनारस में था । अधिक वय वाले फोकाबीर को बाबा ने अपनी किशोरावस्था में, जब वे कठिन साधना में लगे थे, सखा के रुप में स्वीकार किया था । श्री केदार सिंह जी और अघोरेश्वर बहुत काल तक साथ साथ रहे हैं । उन दिनों आप दोनों की सवारी सायकिल हुआ करती थी । फोकाबीर की सायकिल की पिछली सीट पर बैठकर बाबा बहुत घूमें हैं । केदार सिंह युवावस्था तक प्रकृति से उदण्ड माने जाते थे । स्कूल में उनका जी नहीं लगता था । ठाकुर होने का दम्भ तो उनमें जीवनपर्यन्त रहा । अघोरेश्वर के सानिध्य में आने के पश्चात श्री केदार सिंह में जो परिवर्तन उनके परिचितों, जानकारों ने देखा वह आश्चर्यजनक था । लोहा जैसे पारस का स्पर्ष पाकर सोना बन चुका था । श्री दयानारायण पाण्डेय जी ने श्री केदार सिंह का साक्षात्कार के आधार पर " औघड़ की गठरी" नामक एक पुस्तक का प्रणयन किया है, जिसमें हम अघोरेश्वर के इस कृपापात्र के भीतर के भावों के विशाल भंडार से साक्षात्कार कर सकते हैं । इस पुस्तक में फोकाबीर जी ने उन्मुक्त भाव से अपने गुरु अघोरेश्वर के विषय में विस्तार से बतलाया है ।
श्री केदार सिंह जी की धर्मपत्नि का नाम श्रीमति लक्ष्मी देवी है । अघोरेश्वर लक्ष्मी देवी जी को अपना पुत्री मानते थे । कई अवसरों पर लक्ष्मी देवी के मानसिक संकल्पों को अघोरेश्वर ने परोक्ष से जानकर भी पूर्ण किया है । लक्ष्मी देवी पति के प्रति पूर्णतया समर्पित नारी थीं । इस दम्पत्ति की करुणा की मिशाल नहीं मिलती । एक भक्त की सन्तान विव्हलता देखकर अपने गर्भ का भ्रूण दान कर उसकी बंध्या पत्नि को पुत्रवती बनाकर स्वयं निःसंत्तान की स्थिति का वरन करना त्याग की पराकाष्ठा है ।

श्री केदार सिंह जी का देहावसान ६ जनवरी १९९१ को हुआ था । अघोरेश्वर उस समय अमेरिका में अपना इलाज करवा रहे थे । अपने सखा, शिष्य श्री केदार सिंह जी की अंतिम यात्रा हेतु अघोरेश्वर बिना किसी को सूचना दिये अमेरिका से आ जाते हैं । यह गुरु अघोरेश्वर भगवान राम जी की प्रत्यक्ष सर्वज्ञता है, जो उन्हें ६ जनवरी १९९१ को बनारस ले आती है ।

क्रमशः

शनिवार, जनवरी 30, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः आश्रम योजना

आदि आश्रम हरिहरपुर
मुगलसराय से पूरब दिशा में जी. टी. रोड पर एक किलोमीटर की दूरी पर अलिनगर नाम का एक शहर है । अलिनगर से एक पक्की सड़क सकलडीहा तक जाती है । सकलडीहा चौमुहानी से उत्तर लगभग एक डेढ़ किलोमीटर पर हरिहरपुर आश्रम अवस्थित है ।
सन् १९५३ ई० में बाबा महड़ौरा श्मशान में साधनारत थे । मनिहरा ग्राम के ठा. देवी सिंह के आग्रह पर मनिहरा ग्राम में तालाब के तट पर फूस की झोपड़ी में कुछ दिन निवास किये थे । उनकी आयु उस समय मात्र सोलह बरस की ही थी । उनकी ख्याति की सुगन्ध निकट के गाँव ताजपुर तक पहुँची, जो मनिहरा से लगभग २ कि. मी. दक्षिण में अवस्थित है । फिर क्या था ताजपुर निवासी ठा० मुक्तेश्वर सिंह, ठा० श्यामधाता सिंह, ठा० कालिका प्रसाद सिंह , ठा० मेवा सिंह आदि कई श्रद्धालु महाप्रभु के दर्शन के लिये मनिहरा पहुँच गये । इन श्रद्धालुओं के अर्जी बिनती करने पर बाबा ताजपुर में निवास हेतु आश्रम बनाना स्वीकार कर लिये परन्तु जब वे लोग सब बाबा के साथ ताजपुर के लिये चले तो रास्ते में हरिहरपुर का वह स्थल दिखाई पड़ा, जहाँ तीन चार बेल और कुछ आम और महुआ के पेड़ खड़े थे । बेल बृक्ष के पास ही एक कुआँ भी था । लोगों ने बताया कि अंधेरा पड़ने के बाद गाँव के निवासी भूत परेत के डर से इस स्थल के समीप से भी नहीं गुजरते हैं । अघोरेश्वर ने स्थल का निरीक्षण कर वहीं रहने का निर्णय सुना दिया । स्थल की सफाई कर सर्वप्रथम फूस का एक घर बना दिया गया और कुएँ का जीर्णोद्धार कर दिया गया ।
इस प्रकार आदि आश्रम हरिहरपुर का निर्माण हो गया । अघोरेश्वर इस आश्रम में लगभग नौ वर्षों तक अनुष्ठान, साधना करते रहे हैं । वे यहाँ से बनारस बराबर जाया करते थे । उन दिनों किसी को भी आश्रम में रात में रहने की आज्ञा नहीं होती थी ।
अघोरेश्वर के हरिहरपुर आश्रम के प्रवास काल में श्रावण मास में आश्रम की छटा निराली रहती थी । भारत भर से बिशिष्ट कोटी के कलाकार आश्रम में आते और अपने नृत्य संगीत से महाप्रभु की आराधना करते थे ।
जनसेवा अभेद आश्रम, चिटक्वाइन, नारायणपुर, जिला जशपुर
जशपुर नगर से दक्षिण दिशा में रायगढ़ रोड पर लगभग ३० किलोमीटर के बाद एक तिराहा आता है । वहाँ से पक्की सड़क पश्चिम में बगीचा जनपद की ओर जाती है । आठ दस किलोमीटर पर नारायणपुर गाँव अवस्थित है । आश्रम इस गाँव के उत्तर में चिटक्वाइन गाँव की सीमा में बना है । इस आश्रम की जमीन एवं खेती योग्य भूमि महाराजा विजयभूषण सिंह जू देव, जशपुरनगर ने दान में दी थी । आश्रम में पूर्ण तान्त्रोक्त बिधि से देवी पीठ का निर्माण अघोरेश्वर ने कराया है । निवास हेतु भवन एवं अन्य साधन जुटाये गये हैं । बाबा ने इस आश्रम में अनेक अनुष्ठान कर इस पीठ को जागृत कर दिया है । यहाँ समय, काल से अनुष्ठान , पूजन करने से सिद्धी लाभ आवश्यम्भावी है ।
ब्रह्मनिष्ठालय, सोगड़ा आश्रम
जशपुर जनपद के उत्तर में लगभग तेरह किलोमीटर पर सुरम्य वादियों में यह आश्रम अवस्थित है । सदाशिव के उपर बैठी हुई भगवती की प्रतिमा पूरे संसार में अकेली है । गुरुघर यन्त्रवत बहुकोणीय है । नीचे साधना हेतु गुफा है । अघोरेश्वर की यह प्रिय साधना स्थली रही है । इस आश्रम में देश के अनेक शिर्षस्थ अधिकारी, नेता, मनस्वी, तपस्वी, सिद्ध, महात्मा एवं साधक अघोरेश्वर का सानिध्य लाभ के लिये आते रहे हैं । बाबा जी ने बहुत काल तक इस आश्रम में निवास किया है, साधना, अनुष्ठान किया है । दक्षिण दिशा के अनेक साधकों को इसी आश्रम में बाबा का अनुग्रह प्राप्त हुआ है । इस लेखक को भी बाबा के चरण में शरण इसी स्थल में प्राप्त हुआ था ।
इस आश्रम के चारों ओर सैकड़ों एकड़ की खेती है । आश्रमवासी खेती करते हैं, खुद भी खाते हैं और आगत, अभ्यागत को भी खिलाते हैं ।
आश्रम के उत्तर में देवीबिहार नामक पर्वत है । इस पर्वत पर अघोरेश्वर ने भैरव जी का स्थान बनाया है, जहाँ बैशाख शुक्ल चतुर्दशी की निशा रात्रि में पूजन होता है और बली दी जाती है ।
अघोरपीठ वामदेवनगर, जशपुर
जशपुरनगर से तीन किलोमीटर पूरब रायगढ़ जाने वाली सड़क पर "गम्हरिया" नामक एक गाँव है । पुरातन काल में इस गाँव में महाराजा विजयभूषण सिंह जू देव का भण्डार हुआ करता था, जिसे उन्होने अघोरेश्वर को दान कर दिया । उसी गम्हरिया गाँव के टीले पर बाबा का आश्रम स्थापित है । अब यह आश्रम जशपुर नगरपालिका की सीमा में आ गया है । शहर से समीप होने के कारण शहरवासी बहुतायत में इस आश्रम का लाभ लेते हैं । श्री मोरार जी देसाई, जब भारत के प्रधान मन्त्री थे, इसी आश्रम में बाबा से भेंट किये थे । आश्रम भवन चतुष्त्रिकोणाकार बना है । मंदिर के ठीक बाहर भैरव जी बिद्यमान हैं । मुख्य भवन के पीछे एक दो औघड़ों की समाधियाँ हैं । आश्रम में एक वैद्यशाला तथा एक औषधि निर्माणशाला है ।
अवधूत भगवान राम कुष्ठ सेवा आश्रम, पड़ाव, वाराणसी
श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना के पश्चात यह निश्चय हुआ कि संस्था का कुछ कार्यक्रम भी होना चाहिये । बाबा बोले कि देखो, परिवार के लोग भी कुष्ठी बन्धु को घृणा की दृष्टि से देखते हैं, समाज के हर वर्ग के लोग तो उनसे घृणा करते ही हैं । तुम लोग कुष्ठी बन्धुओं की सेवा करो। उनका उपचार करो । उन्हें आरोग्य करो ।
बाबा उस समय हाजी सुलेमान के बगीचे में रह रहे थे । कुष्ठ सेवा के लिये सेवाश्रम बनाना था अतः भूमि की आवश्यकता पड़ी । बाबा के एक भक्त ईश्वरगंगी के श्री कमाल साहू जी की नौ डिसमिल भूमि गँगा जी के उस पार पड़ाव नामक स्थान पर थी , जिसे वे अघोरेश्वर को दान करना चाहते थे । अघोरेश्वर को वह भूमि पसन्द आ गयी । श्री कमाल साहू जी के प्रयत्न से आसपास की कुछ और जमीन प्राप्त हो गयी । दो मास के भीतर कुष्ठ सेवाश्रम के लिये आउटडोर विभाग का भवन बनकर तैयार हो गया । दिनांक १० मई सन् १९६२ ई० को भवन का उदघाटन हुआ और रोगियों की चिकित्सा का कार्य भी शुरु हो गया । बाद में धीरे धीरे करके साठ बिस्तरों वाला विशाल अंतर्कक्ष बनकर तैयार हो गया, जहाँ कुष्ठ रोगियों के लिये हर आधुनिक सुविधा की व्यवस्था की गई ।
कुष्ठ सेवाश्रम का बाद में बहुत विस्तार हुआ । आश्रम परिसर में अघोरेश्वर के लिये सर्वेश्वरी निवास बना । सर्वेश्वरी मंदिर बना । श्री सर्वेश्वरी समूह का प्रधान कार्यालय लाया गया । शिशुओं के लिये " अवधूत भगवान राम नर्सरी विद्यालय " की स्थापना हुई । अतिथि कक्ष बना । अघोरी प्रेस की स्थापना हुई । औषधि निर्माण शाला बना ।
यह आश्रम अघोरेश्वर का स्थायी निवास बन गया ।
अन्य आश्रम
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, राय बरेली ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, रेणुकूट, जिला मिरजापुर ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, बलरामपुर, गोंडा ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, भुजौना, बिलथरा रोड, बलिया ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, डाल्टेनगंज, पलामू ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, नगर उँटारी, पलामू ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, धनबाद ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, लेक रोड, राँची ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, मानगो , जमशेदपुर ।श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, सिमडेगा , राँची ।
श्री सर्वेश्वरी समूह प्रार्थनागृह, गुमला, राँची ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, घाघरा, राँची ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, सोनुमूड़ा, रायगढ़, छत्तीसगढ़ ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, भाटापारा, रायपुर ।
श्री सर्वेश्वरी समूह आश्रम, जगदलपुर, बस्तर ।
इसके अलावा भारत के अन्य अनेक प्रदेशों में भी श्री सर्वेश्वरी समूह की शाखाएँ, आश्रम स्थापित हैं ।
क्रमशः