रविवार, अप्रैल 25, 2010

अघोर परम्परा के प्रसिद्ध स्थल



हिंगलाज धाम

अघोरपथ के अनेक पुन्य स्थलों में से एक हिंगलाज वर्तमान पाकिस्तान देश के बलुचिस्तान राज्य में अवस्थित है । यह स्थान सिंधु नदी के मुहाने से १२० किलोमीटर और समुद्र से २० किलोमीटर तथा कराची नगर के उत्तर पश्चिम में १२५ किलोमीटर की दूरी पर हिंगोल नदी के किनारे स्थित है । यह अँचल मरुस्थल होने के कारण इस स्थल को मरुतीर्थ भी कहा जाता है । इस स्थल के श्रद्धालु पूरे भारतवर्ष में पाये जाते हैं ।

भारतवर्ष के ५२ शक्तिपीठों में इस पीठ को भी गिना जाता है । कथा है कि एक बार महाराज दक्ष प्रजापति यज्ञ करा रहे थे । उन्होने समस्त देवताओं को निमंत्रित किया था । उस यज्ञ में उनके अपने जामाता शिव जी को आमंत्रित नहीं किया गया था । दक्ष पुत्री, शिव भार्या दाक्षायनी, सती शिव जी के मना करने पर भी अनिमन्त्रित ही  पिता के घर यज्ञस्थल पहुँच गईं । महाराज दक्ष के द्वारा शिव जी को सादर आमन्त्रित कर पूजन करने के सती के प्रस्ताव को अमान्य कर देने पर इसे अपना और अपने पति का अपमान माना और सती क्रुद्ध हो गईं । उन्होने अपमान की पीड़ा में योगाग्नि उत्पन्न कर अपना शरीर दग्ध कर त्याग दिया । सती  के इस प्रकार से शरीर त्याग देने से शिव जी को मोह हो गया । शिव जी ने सती के अधजले शव को कन्धे पर उठाये उन्मत्त होकर इधर उधर घूमने लगे । शिव जी की मोहाभाविष्ट दशा से चिन्तित देवताओं ने भगवान विष्णु से उपाय करने की प्रार्थना की । भगवान विष्णु अपने आयुध सुदर्शन चक्र से शिव जी के कन्धे पर के सती के शव को खण्ड खण्ड काटकर गिराने लगे  । हिंगलाज स्थल पर सती का सिरोभाग कटकर गिरा । अन्य इक्यावन शक्तिपीठों में सती के विभिन्न अँग कटकर गिरे थे ।  इस प्रकार ५२ शक्तिपीठों की स्थापना हुई ।

जनश्रुति है कि रघुकुलभूषण मर्यादा पुरुषोत्तम राम चन्द्र जी शक्ति स्वरुपा सीता जी के साथ रावण बध के पश्चात ब्रह्म हत्या दोष के निवारण के लिये हिंगलाज गये और देवी की आराधना किये थे । यह भी कहा जाता है कि पुरातन काल में इस  क्षेत्र के शासक भावसार क्षत्रीयों की कुल देवी हिंगलाज थीं । बाद में यह क्षेत्र  मुसलमानों के अधिकार में चला गया । यहाँ के स्थानीय मुसलमान हिंगलाज पीठ को "बीबी नानी का मंदर"  कहते हैं । अप्रेल के महीने मे स्थानीय मुसलमान समूह बनाकर हिंगलाज की यात्रा करते हैं और इस स्थान पर आकर लाल कपड़ा चढ़ाते हैं, अगरबत्ती जलाते है, और शिरीनी का भोग लगाते हैं । वे इस यात्रा को "नानी का हज" कहते हैं । आसपास के निवासी जहर से सम्बिधित विमारीयों के निवारण के लिये इस स्थल की यात्रा करते हैं, माता का पूजन , प्रार्थना करते हैं । उनकी मान्यता है कि हिंगुल में जहर को मारने की शक्ति होती है अतः हिंगलाज देवी भी जहर से सम्बंधित रोगों से त्राण दिलाने में सक्षम हैं ।

हिंगलाज देवी की गुफा रंगीन पत्थरों से निर्मित है । गुफा में प्रयुक्त विभिन्न रंगों की आभा देखते ही बनती है । माना जाता है कि इस गुफा का निर्माण यक्षों के द्वारा किया गया था,  इसीलिये रंगों का संयोजन इतना भव्य बन पड़ा है । पास ही एक भैरव जी का भी स्थान है । भैरव जी को यहाँ पर "भीमालोचन" कहा जाता है ।

अघोरेश्वर बाबा कीनाराम जी की हिंगलाज यात्रा की कथा हमें प्राप्त होती है । कथा कुछ इस प्रकार हैः

"उन दिनों बाबा कीनाराम जी गिरनार में तप कर रहे थे । भ्रमण के क्रम में एकबार बाबा कच्छ की खाड़ियों, दलदलों को, जिनको पार करना असम्भव है, अपने खड़ाऊँ से पार कर हिंगलाज जा पहुँचे । हिंगलाज पहुँचकर बाबा कीनाराम मंदिर से कुछ दूरी पर घूनी लगाये तपस्या करने लगे ।  बाबा कीनाराम जी को हिंगलाज देवी एक कुलीन घर की महिला के रुप में प्रतिदिन स्वयं भोजन पहुँचाती रहीं । बाबा की धूनी की सफाई, व्यवस्था १०,११ वर्ष के बटुक के रुप में, भैरव स्वयं किया करते थे । एक दिन महाराज श्री कीनाराम जी ने पूछ दियाः " आप किसके घर की महिला हैं ?  आप बहुत दिनों से मेरी सेवा में लगी हुई हैं । आप अपना परिचय दीजिये नहीं तो मैं आप का भोजन ग्रहण नहीं करुँगा ।"  मुस्कुराकर हिंगलाज देवी ने बाबा कीनाराम जी को दर्शन दिया और कहाः " जिसके लिये आप इतने दिनों से तप कर रहे हैं, मैं वही हूँ । मेरा अब समय हो गया है । मैं अपने नगर काशी में जाना चाहती हूँ। अब आप जाइये और जब कभी स्मरण कीजियेगा मैं आप को मिल जाया करूँगी "।  महाराज श्री कीनाराम ने पूछाः माता, काशी में कहाँ निवास करियेगा ? हिंगलाज देवी ने उत्तर दियाः मैं काशी में केदारखण्ड में क्रीं कुण्ड पर निवास करूँगी" ।  उसीदिन से ॠद्धियाँ महाराज श्री कीनाराम के साथ साथ चलने लगीं और बटुक भैरव की उस धूनी से महाराज श्री का सम्पर्क टूट गया । महाराज ने धूनी ठंडी की और चल दिये ।"

क्रीं कुण्ड स्थल वाराणसी में एक गुफा है । उक्त गुफा में बाबा कीनाराम जी ने हिंगलाज माता को स्थापित किया है । सामान्यतः यह एक गोपनीय स्थान है ।
इन दो स्थलों के अलावा हिंगलाज देवी एक और स्थान पर विराजती हैं, वह स्थान उड़ीसा प्रदेश के तालचेर नामक नगर से १४ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । जनश्रुति है कि विदर्भ क्षेत्र के राजा नल माता हिंगलाज के परम भक्त हो गये हैं । उनपर हिंगलाज देवी की महती कृपा थी । एकबार पूरी के महाराजा गजपति जी ने विदर्भ नरेश नल से सम्पर्क साधा और निवेदन किया कि जगन्नाथ मंदिर में भोग पकाने में बड़ी असुविधा हो रही है, अतः माता हिंगलाज अग्नि रुप में जगन्न्थ मंदिर के रंधनशाला में विराजमान होने की कृपा करें । माता ने राजा नल द्वारा किया गया निवेदन स्वीकार कर लिया और जगन्नाथ मंदिर परिसर में अग्नि के रुप में स्थापित हो गईं । उन्हीं अग्निरुपा माता हिंगलाज का मंदिर तालचेर के पास स्थापित है ।

छत्तिसगढ़ में हिंगलाज देवी का शाक्त सम्प्रदाय में प्रचूर प्रचार रहा है । यहाँ शक्ति साधकों, मांत्रिकों को बैगा कहा जाता रहा है । इस अँचल में अनेक शक्ति साधकों के अलावा समर्थ आचार्य भी हुये हैं । उनमें से कुछ का नाम इस प्रकार हैः १, देगुन गुरु, २, धनित्तर गुरु, ३ बेंदरवा गुरु |इससे रुद्र के अँशभूत हनुमान इँगित होते हैं |   ४, धरमदास गुरु | धरमदासजी कबीरपँथ के आचार्य थे |  ५, धेनु भगत, ६, अकबर गुरु |आप मुसलमान थे | आदि । इन सब गुरुओं ने हिंगलाज देवी को सर्वोपरी माना है और बोल मंत्रों में देवी को गढ़हिंगलाज में स्थिर हो जाने का निवेदन करते हैं । हिंगलाज के सन्दर्भ का एक बोल मन्त्र दृष्टव्य हैः

" सवा हाथ के धजा विराजे, अलग चुरे खीर सोहारी,
ले माता देव परवाना, नहिं धरती, नहिं अक्कासा,
जे दिन माता भेख तुम्हारा, चाँद सुरुज के सुध बुध नाहीं,
 चल चल देवी गढ़हेंगुलाज, बइठे है धेनु भगत,
 देही बिरी बंगला के पान,  इक्काइस बोल,  इक्काइस परवाना,
 इक्काइस हूम, धेनु भगत देही, शीतल होके सान्ति हो ।"

क्रमशः













 

मंगलवार, अप्रैल 20, 2010

अघोर परम्परा के प्रसिद्ध स्थल

अघोर परम्परा के प्रसिद्ध स्थल

अघोरपथ के पथिक, सिद्ध, महात्मा, संत,अवधूत,अघोरेश्वर जिन स्थलों में रहकर साधना किये हैं , तप किये हैं, वे स्थल जाग्रत अवस्था में आज भी साधकों को साधना में नई उँचाइयाँ प्राप्त करने में सहयोगी हो रहे हैं ।  इन स्थलों में उच्च स्तर के साधकों को सिद्ध, अवधूत, अघोरेश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन , मार्गदर्शन भी प्राप्त हो जाया करता  है । हम यहाँ कतिपय ऐसे ही स्थलों की चर्चा करेंगे ।

१, गिरनार

 गुजरात राज्य में अहमदाबाद से लगभग ३२७ किलोमीटर की दूरी पर अपने सफेद सिंहों के लिये गीर के जगत प्रसिद्ध अभयारण्य के पार्श्व में  एक नगर बसा है,  नाम है जूनागढ़ । इस शहर के आसपास से शुरु होकर पहाड़ों की एक श्रृँखला दूर तक चली गई है । इसी पर्वत श्रृखला का नाम ही गिरनार पर्वत है । इस पर्वत श्रृँखला का सबसे उँचा पर्वत जूनागढ़ शहर से मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है । इस पर्वत की तीन चोटियाँ हैं । इन तीनों में से सबसे उँची चोटी पर भगवान दत्तात्रेय जी का एक छोटा सा मन्दिर है, जिसके अंदर भगवान दत्तात्रेय जी की चरणपादुका एवं कमण्डलु तीर्थ स्थापित हैं । दूसरे शिखर का नाम बाबा गोरखनाथ के नाम है । कहा जाता है यहाँ बाबा गोरखनाथ जी ने बहुत काल तक तप किया था । इन दोनो शिखर के बीच में एक तीसरा शिखर है जो अघोरी टेकड़ी कहलाता है । इसकी चोटी में एक धूनि हमेशा प्रज्वलित रहती है, और यहाँ अनेक औघड़ साधु गुप्त रुप से तपस्या रत रहते हैं ।

गिरनार की प्रसिद्धि के तीन कारक गिनाए जाते हैं ।

पहला, भगवान दत्तात्रेय जी का कमण्डलु तीर्थ । भगवान दत्तात्रेय भगवान सदाशिव के पश्चात अघोरपथ के अन्यतम आचार्य हो गये हैं । उन्होने अपने तपोबल से गिरनार को उर्जावान बना दिया है । इस स्थल पर साधकों को सरलता से सिद्धि हस्तगत होती है । कहा तो यह भी जाता है कि जो योग्य साधक होते हैं, उन्हें भगवान दत्तात्रेय यहाँ पर प्रत्यक्ष दर्शन देकर कृतार्थ भी करते हैं ।

दूसरा, गिरनार पर्वत के मध्य में स्थित जैन मन्दिर । लगभग ५५०० सिढ़ियाँ चढ़ने पर यह स्थान आता है । यहाँ पर कई जैन मन्दिर है । इन मन्दिरों का निर्माण बारहवीं, तेरहवीं शताब्दी में हुआ था । इसी स्थान पर जैन धर्म के बाइसवें तीर्थंकर बाबा नेमीनाथ जी परमसत्य को उपलब्ध हुए थे । इस स्थल से जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लीनाथ जी का नाम भी जोड़ा जाता है । कोई कोई विद्वतजन मल्लीनाथ जी को स्त्री भी मानते हैं । सत्य चाहे जो हो मल्लीनाथ जी तिर्थंकर थे इसमें कोई संदेह नहीं है । इस प्रकार गिरनार जैन धर्मावलम्बियों के लिये भी तीर्थ है, और बड़ी संख्या में जैन तीर्थयात्री यहाँ आते भी रहते हैं ।

तीसरा, जैन मन्दिर से और ऊपर अम्बा माता का मन्दिर अवस्थित है । यह मन्दिर भी पावन गिरनार पर्वत की प्रसिद्धि का एक कारण है । यह एक जाग्रत स्थान है । वर्षभर तीर्थयात्री यहाँ माता के दर्शन के लिये आते रहते हैं ।

श्री सर्वेश्वरी समूह वाराणसी द्वारा प्रकाशित "औघड़ राम कीना कथा " ग्रँथ में अघोरेश्वर बाबा कीनाराम जी का जूनागढ़ , गिरनार प्रवास उल्लिखित है । कथा कुछ इस प्रकार आगे बढ़ती हैः

"महाराज श्री कीनाराम जी जब जूनागढ़ राज्य में पदार्पण किये, उन्होने कमण्डलु कुण्ड, अघोरी शिला पर बैठे हुए सिद्धेश्वर दत्तात्रेय जी को बड़े वीभत्स रुप में माँस का एक बड़ा सा टुकड़ा लिये हुए देखा । कीनाराम जी को इससे थोड़ी घृणा हुई । उसी माँस का एक टुकड़ा दाँतों से काटकर सिद्धेश्वर दत्तात्रेय जी ने महाराज श्री कीनाराम जी को दिया । उसे खाते ही महाराज श्री कीनाराम जी की रही सही शंका और घृणा भी जाती रही ।
एक बार अघोरी का रुप धारण किए हूए सिद्धेश्वर दत्तात्रेय और महाराज श्री कीनाराम जी एक ही साथ गिरनार पर्वत पर बैठे हुए थे । वहाँ से उन्होने दिल्ली में घोड़े पर जाते हुए बादशाह का दुशाला गिरते हुए देखा । सिद्धेस्वर दत्तात्रेय जी ने बाबा कीनाराम जी से कहाः " देखते नहीं हो ? दुशाला घोड़े से गिर गया है । " महाराज श्री कीनाराम जी ने कहाः " वजीर लोग दुशाला दे रहे हैं । घोड़ा काला है । बादशाह अपने महल को जा रहे हैं ।" इस पर वीभत्स रुप धारण किये हुये सिद्धेश्वर दत्तात्रेय जी ने कहा, अब क्या देखते हो? अब क्या गिरनार में बैठे हो?  जाओ।  प्राणियों का कल्याण करो । उनमें जो क्षोभ, मोह, ईर्ष्या और घृणा है उसे तुम दूर करो । तुम एक अँश से इसी मध्य शिखर पर विराजोगे ।" तभी से गिरनार पर्वत का मध्य शिखर " अघोरी टेकड़ी के नाम से विख्यात है । यह भी विख्यात है कि दत्तात्रेय जब गोरखनाथ की ओर चीलम बढ़ाते हैं तो औघड़ बीच में रोककर पी लेते हैं ।

" दत्त गोरख की एक ही माया, बीच में औघड़ आन समाया ।"
क्रमशः

गुरुवार, अप्रैल 08, 2010

अष्टाँग साधना


अघोरपथ में यह एक अत्यंत ही गोपनीय साधना है । अवधूत, अघोरेश्वर समय काल पाकर इस साधना को करते हैं । संभव है प्रकृति विजय के क्रम में इस साधन प्रणाली का सहारा लिया जाता हो । इसके विषय में गुरु और अधिकारी शिष्य के अलावा अन्य व्यक्ति को कुछ भी ज्ञान होना संभव नहीं है, क्योंकि साधना काल में अन्य व्यक्ति की उपस्थिति वाँछनीय नहीं होती, वरन् व्यवधान ही माना जाता है । श्री सर्वेश्वरी समूह द्वारा प्रकाशित साहित्य में एक स्थान पर अति सामान्य ढ़ंग से इस साधना का विवरण दिया गया है । विवरण भी इतना अल्प है कि हम इसे साधना की ओर इँगित करना ही कह सकते हैं । वैसे तो जैसा कि हम पूर्व में कह आये हैं अघोर साधना गुरुमुखी साधना है, परन्तु सामान्य जानकारी के लिये उक्त विवरण यहाँ प्रस्तुत है ।

" एक बार अघोरेश्वर भगवान राम जी छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में स्थित सोगडा आश्रम में निवास कर रहे थे । उनका शिष्य मुड़िया साधु वहीं अपनी कुटी में रहकर बाबा की सेवा में लीन था । बाबा की शिष्या योगिनी मेघमाला अपने गुरु के दर्शन के लिये आई हुई थीं ।
एक दिन अघोरेश्वर चाँदनी रात के शून्यायतन में वहाँ की पर्वताट्टालिका में चट्टान पर ध्यानस्थ बैठे थे । योगिनी मेघमाला तथा मुड़िया साधु उनके समक्ष उपस्थित होकर साष्टाँग प्रणाम, अभिवादन किये और सत्संग के लिये चरणों में बैठ गये ।

बाबा की आज्ञा पाकर योगिनी ने मुड़िया साधु की ओर इशारा करते हुए निवेदन कियाः " गुरुदेव, कल रात्रि में जब मैं टहलने के क्रम में  इनकी कुटी के पास से गुजरी तो देखी कुटी के भीतर  इनके शरीर के सब अंग अलग अलग पड़े हैं । कटि भाग अलग है, वक्षस्थल अलग है, बाहें अलग हैं, पाँव अलग हैं । मुझे शंका हुई कि किसी क्रूरकर्मी ने हमारे इन गुरुभाई मुड़िया साधु के शरीर को काटकर , उनके अंगों को अलग अलग कर दिया है ।

इनकी कुटी झंझरीदार है, उसमें से भीतर का दृश्य थोड़ा बहुत दिख जाता है ।

 मैं बहुत भयभीत हो गई और तीव्रगति से आपके कुटी के पास गई तो देखा कि कुटी का द्वार बन्द है । कुछ उपाय न सूझ रहा था । मैं पुनः इनकी कुटी की परिधि में लौट आई । मेरी घबराहट इतनी बढ़ गई थी कि मैं एकाएक जोर से चिल्ला उठी, परम्मा ! परम्मा! यह क्या हुआ ? मेरी आवाज को सुनते ही मैंने देखा कि हमारे ये मुड़िया गुरुभाई स्वस्थ शरीर आसनस्थ बैठे हुये हैं । मेरे बार बार पूछने पर भी इन्होंने कुछ नहीं बतलाया । गुरुदेव क्या ये मेरा भ्रम था या सत्य था ?

बाबा ने पूछाः " मेघमाले ! तुमने वहाँ रक्त भी देखा था ?

जब मेघमाला ने कहा कि उसने रक्त नहीं देखा था, तब बाबा जी ने कहा किः " उस स्थिति में आश्चर्य की क्या बात है ? औघड़, अघोरेश्वर लोग, जब अनुकूल स्थिति पाते हैं तो दिब्य संकल्पों के द्वारा भाव भावनाओं से रहित अपनी कुटी में आसनस्थ हो इस क्रिया को भी करते हैं । जो कुछ इसने किया है, वह क्रिया और कला दोनों है । यह कोई बिद्या नहीं है, अष्टांग अभ्यास है ।"

हमने इस साधना, क्रिया, अभ्यास, जैसा कि अघोरेश्वर जी ने बतलाया है, का संकेत शिरडी वाले सांई राम जी के लीला चरित में भी पाया है । वे भी अष्टाँग साधना किया करते थे । उन्हें ऐसा करते साधुओं की एक टोली ने देखा था, जो रात्री के अंधकार में उन्हें नुकसान पहुँचाने की नियत से द्वारका माई में प्रवेश किया था । निश्चय ही वे भी इस साधना, अभ्यास में पारंगत थे । उनके विषय में इस लेखक को ज्यादा जानकारी तो नहीं है, लेकिन उनके नाम में राम लगना तथा औघड़ों के गोप्य साधना पद्धतियों का अनुशरण करना, पारंगत होना  इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि शिरडी वाले सांई राम जी कीनारामी परम्परा के साधु थे ।

औघडों में और भी अनेकों गोपनीय साधनाओं, क्रियाओं का प्रचलन है, जिनसे वे शक्तिमान बनते हैं तथा समाज और देश का कल्याण करते हैं ।

क्रमशः

शुक्रवार, मार्च 26, 2010

अघोर साधना के मूल तत्वः गोप्य पूजाः श्मशान क्रिया

श्मशान शब्द से ही जलते हुए शव से चतुर्दिग फैलती चिराँध, श्रृगालों के द्वारा खोदकर निकाली गई मानव अँगों को चिचोड़ते गिद्धों की टोलियाँ, यहाँ वहाँ
हवा के हाथों बिखरे जले हुए मानव तन की भष्मी के अँश, यत्र तत्र पड़े हड्डियों और माँस के छिन्न खंड, रह रहकर आती ऊलूकों के धूत्कार, आदि दृष्य अनायास ही आँखों के सामने आकर जुगुप्सा जगाने लगते हैं । श्मशान मानव मनोविकार द्वय "भय" और  "घृणा" के चरमोत्कर्ष की स्थली है । लोग अपने प्रियजनों की शव यात्रा में अन्य अनेक सम्बन्धियों के साथ श्मशान में कम समय के लिये आते हैं और प्राण रहित देह को अग्नि या धरती के सिपुर्द कर लौट जाते हैं । जन सामान्य का श्मशान से इतना ही सम्बन्ध है । यही श्मशान अघोर पथ के साधकों, सिद्धों, अघोराचार्यों, साधुओं की साधना स्थली, निवास स्थली रहती रही है । बहुत काल तक जंगल के भीतर निर्मित किसी मंदिर के गर्भगृह के शून्यायतन में या किसी महाश्मशान के भीतरी भाग में किसी समाधी को शय्या बनाकर औघड़ साधक साधना में निमग्न रहते आये हैं ।

" औघड़ के नौ घर, बिगड़े तो शव घर ।"

साधना की पराकाष्ठा तभी होती है जब पूर्ण इन्द्रीय जय या मनोविकारों पर जय सिद्ध हो जाता है । इस शरीर में नौ द्वार होते हैं । २ आँखें, २ कान, २ नाक, १ मुँह, १ शिश्न या योनि तथा १ गुदा । इनको वश में कर लेने से आध्यात्मिक उन्नति की गति तीव्र हो उठती है । श्मशान क्रियाओं के द्वारा इनपर विजय पाना सरल हो जाता है ।

कमोवेश श्मशान साधना भारत में अघोरियों के अलावा अन्य कई सम्प्रदायों में भी की जाती है । इसका चलन पूर्वी भारत में ज्यादा दिखता है । आसाम, पूर्वी बिहार या मैथिल प्रदेश, बंगाल तथा उड़ीसा के पूर्वी भाग में, आमावश्या की निशारात्री में अनेक साधक महाश्मशानों में साधनारत रहते हैं । अन्य भू भाग में भी छिटपुट रुप से श्मशान साधक फैले हुए हैं ।

आसाम का कामरुप प्रदेश का तन्त्र साधना स्थली के रुप में बहुत नाम रहा है । पुरातन काल की कथा है, इस प्रदेश में मातृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था प्रचलित थी । कामरुप की स्त्रियाँ तन्त्र साधना में बड़ी ही प्रवीण होती थीं । बाबा आदिनाथ, जिन्हें कुछ विद्वान भगवान शंकर  मानते हैं, के शिष्य बाबा मत्स्येन्द्रनाथ जी भ्रमण के क्रम में कामरुप गये थे । बाबा मत्स्येन्द्रनाथ जी कामरुप की रानी के अतिथि के रुप में महल में ठहरे थे । बाबा मत्स्येन्द्रनाथ, रानी जो स्वयं भी तंत्रसिद्ध थीं, के साथ  लता साधना में इतना तल्लीन हो गये थे कि वापस लौटने की बात ही भूल बैठे थे । बाबा मत्स्येन्द्रनाथ जी को वापस लौटा ले जाने के लिये उनके शिष्य बाबा गोरखनाथ जी को कामरुप की यात्रा करनी पड़ी थी । "जाग मछेन्दर गोरख आया " उक्ति इसी सन्दर्भ में बाबा गोरखनाथ जी द्वारा कही गई थी । कामरुप में श्मशान साधना व्यापक रुप से प्रचलित रहा है । इस प्रदेश के विषय में अनेक दन्तकथाएँ प्रचलित हैं । बाहर से आये युवाओं को यहाँ की महिलाओं द्वारा भेड़ , बकरी बनाकर रख लिया जाना एक ऐसी ही दन्त कथा है ।

बंगाल में श्मशान साधना का प्रसिद्ध स्थल क्षेपा बाबा की साधना स्थली तारापीठ का महाश्मशान रहा है । आज भी अनेक साधक श्मशान साधना के लिये कुछ निश्चित तिथियों में  तारापीठ के महाश्मशान में जाया करते हैं । महर्षि वशिष्ठ से लेकर बामाक्षेपा तक अघोराचार्यों की एक अविच्छिन्न धारा यहाँ तारापीठ में प्रवहमान रही है ।

आनन्दमार्ग बिहार और बंगाल की मिलीजुली माटी की सुगन्ध है । प्रवर्तक श्री प्रभातरंजन सरकार उर्फ आनन्दमूर्ति जी थे । आनन्दमार्ग के साधु जो अवधूत कहलाते हैं श्मशान साधना करते हैं । इनकी झोली में नरकपाल रहता ही है । ये अमावश्या की रात्री में साधना हेतु श्मशान जाते है । श्मशान साधना से इन साधुओं को अनेक प्रकार की सिद्धी प्राप्त है ।

 श्मशान के बारे में अघोरेश्वर भगवान राम जी ने अपने शिष्यों को बतलाया थाः
" श्मशान से पवित्र स्थल और कोई स्थान हो ही नहीं सकता । न मालूम इस श्मशान भूमि में प्रज्वलित अग्नि सदियों से कितने जीवों के प्राणरहित देहों की आहुति लेती आ रही है । न मालूम कितने महान योद्धाओं, राजाओं, महाराजाओं, सेठ साहूकारों, साधुओं सज्जनों, चोरों मुर्खों, गर्व से फूले न समाने वाले नेताओं और विद्वतजनों की देहों की आहुतियाँ श्मशान में प्रज्वलित अग्नि के रुप में महाकाल की जिव्हा में भूतकाल में पड़ी हैं, वर्तमान काल में पड़ रही हें और भविष्य काल में पड़ती रहेंगी । कितने घरों और नगरों की अग्नि शाँत हो जाती है किन्तु महाश्मशान की अग्नि सदैव प्रज्वलित रहती है, प्राणरहित लोगों के देहों की आहुति लेती रहती है । जिस प्रकार योगियों और अघौरेश्वरों का स्वच्छ और निर्मल हृदय जीवों के प्राण का आश्रय स्थल बना रहता है, ठीक उसी प्रकार श्मशान प्राण रहित जीवों के देह को आश्रय प्रदान करता है । उससे डरकर भाग नहीं सकते । पृथ्वी में, आकाश में, पाताल में, कहीं भी कोई स्थान नहीं है जहाँ छिपकर तुम बच सकते हो ।"
 

अघोराचार्य बाबा कीनाराम जी की एक कथा में जो , उनके प्रथम शिष्य बाबा बीजाराम द्वारा लिखी गई तथा श्री सर्वेश्वरी समूह द्वारा प्रकाशित ग्रँथ " औघड़ रामकीना कथा" में संगृहित है श्मशान साधना का विवरण दिया गया है । कथा कुछ इस प्रकार हैः

" मुँगेर जनपद में गंगा के किनारे श्मशान के पास एक कुटी में बाबा कीनाराम वर्षावास कर रहे थे । मध्यरात्रि की बेला थी । पीले रंग के माँगलिक वस्त्र और खड़ाऊँ पहने, सुन्दर केशवाली  एक योगिनी ने आकाश की ओर से उतरती हुई अघोराचार्य महाराज कीनाराम जी के निकट उपस्थित होकर प्रणाम निवेदन किया । महाराज श्री के परिचय पूछने पर योगिनी ने बतलाया कि वह गिरनार की काली गुफा की निवासिनी है । प्रेरणा हई, आकर्षण हुआ और वह आकाशगमन करते हुए महाराज जी की कुटी  पर आ पहुँची । योगिनी ने अघोराचार्य बाबा कीनाराम जी से निवेदन किया किः " जो साध्य है मेरा, उसे आप क्रियाओं द्वारा क्रियान्वित करें, जिससे मुझमें जो कमी है उसकी पूर्णता को प्राप्त करुँ ।"
श्मशान में एक शव के, जिसे परिजन अत्यधिक बर्षा के कारण उपेक्षित छोड़ गये थे, गंगा की कछार में मूँज की रस्सियों से, खूंटी गाड़कर, हाथ , पाँव को  बाँध दिया गया । शव को लाल वस्त्र ओढ़ाकर मुख खोल दिया गया । योगिनी और बाबा कीनाराम आसनस्थ हुए । महाराज मन्त्र उच्चारण करते रहे और योगिनी अभिमंत्रित कर धान का लावा शव के खुले मुख में छोड़ती रहीं  । थोड़े ही काल तक यह क्रिया हुई होगी कि बड़े जोर का अट्टहास करके पृथ्वी फूटी और नन्दी साँढ़ पर बैठे हुए सदाशिव, श्मशान के देवता, उपस्थित हुए । बड़े मधुर स्वर में बोलेः " सफल हो सहज साधना । दीर्घायु हो । कपालालय में, ब्रह्माण्ड में  सहज रुप से प्रविष्ठ होने का आप दोनों का मार्ग प्रशस्त है । याद रखना,  अनुकूल समय में मैं उपस्थित होता रहूँगा ।" योगिनी और महाराज श्री कीनाराम जी ने शव से उतरकर प्रणाम किया । श्मशान देवता देखते देखते आकाश में विलीन हो गये । एक कम्पन हुआ और शव पत्थर के सदृश हो गया ।

योगिनी तृप्त हुई और महाराज श्री को प्रणाम कर आकाशगमन करते हुए पश्चिम दिशा की ओर चलीं गई ।"

क्रमशः

बुधवार, मार्च 17, 2010

अघोर साधना के मूल तत्वः वेशभूषा व भिक्षाटन


हम सब ने प्रत्यक्ष या संचार माध्यमों में एकाधिक बार अघोरियों को देखा है । जटाजूट धारी, अर्धनग्न, त्रिशूल और खप्पर पकड़कर भय फैलाती छबि ही हमारे मानस पटल पर उभरती है । नागा साधु भी , जो सर्वथा नग्न अवस्था में रहते हैं, अघोरी ही हैं । उक्त विचित्र वेशभूषा में हिमाली और गिरनारी दोनों प्रकार के ही साधु दिखलाई पड़ते हैं । कुछएक ठग भी कभी कभी इस वेशभूषा को धारण किये दिखलाई पड़ते हैं ।

अघोरपथ में इस प्रकार की वेशभूषा  अँगिकार करने के पीछे साधना विषयक कारण प्रमुख रहे हैं । अघोराचार्य अपना अधिकाँश समय श्मशान में व्यतीत करते रहे हैं । श्मशान में निवास के कारण शारीरिक स्वच्छता, वस्त्र, उदर भरण आदि की न्यूनता स्वाभाविक है, तिसपर इन संतों का मन हर हमेशा उस अज्ञात की ओर ही उन्मुख रहने के कारण इनका ध्यान शरीर की ओर नहीं जाता और उक्त स्थिति सहज ही बनती जाती है ।

अघोरपथ के संत महात्मा आदिमकाल से ही कम संख्या में होते आये हैं । हिमाली घराने में बाबा गोरक्षनाथ जी और उनकी परम्परा के अन्य सिद्धों के द्वारा उत्तर भारत में आश्रम, मठ आदि स्थापित करने के बाद आश्रमवासी साधकों की संख्या अवश्य बढ़ी, जो आज तक चली आ रही है । ये साधु यदा कदा जब तिर्थाटन के लिये समूह में निकलते थे तो जगह जगह श्रद्धालुओं द्वारा दान की गई भूमि पर छोटे छोटे मठ नुमा बने हुए स्थलों पर एक दो दिन ठहरते और आगे बढ़ जाते थे । सामान्यतः उनके लिये इन्ही स्थलों पर भिक्षा की व्यवस्था हो जाया करती थी । साधुओं की टोली के आगमन पर आसपास के श्रद्धालु भक्त इन स्थलों पर जाकर अपना भेंट चढ़ाते और प्रवचन सुनते थे । इन भक्तों की समस्याओं का समाधान भी  इन स्थलों पर ऐसे मौकों पर हो जाया करता था । आजकल ऐसे स्थल या तो उजाड़ पड़े हैं या सेवादारों या अन्य लोगों के द्वारा इनपर आधिपत्य जमा लिया गया है ।

गिरनारी या किनारामी अघोरियों का निवास गुजरात में गिरनार पर्वत के आसपास और बनारस तथा बनारस के आसपास होता आया है । कभी कभी राजस्थान, महाराष्ट्र, बंगाल तथा देश के अन्य भू भाग में भी एक दो महात्माओं का सँधान मिलता है । दक्षिण भारत में अघोर पथ के पथिक ब्रह्मनिष्ठ कहलाते हैं । वे दक्षिणाँचल तक ही सीमित रहे हैं तथा दो चार महात्माओं के अलावा अन्य अघोराचार्यों की जानकारी उपलब्ध नहीं है ।

गिरनारी या कीनारामी साधु सर में बाल नहीं रखते । मुड़िया होते हैं । वस्त्र के नाम पर कफन का टुकड़ा लपेटते हैं । अघोरेश्वर भगवान राम जी  ने सफेद लुँगी और बँडी पहनना शुरू किया, तब से इस परम्परा का यही वेश हो गया है, लेकिन यह नियम नहीं है ।

बाबा कीनाराम जी ने अपने शिष्यों को इस विषय में निर्देश देते हुए कहा थाः

" यहाँ नगर और ग्राम से क्षण भर के लिये वैराग्य से प्रेरित जन श्मशान में शव को लेकर आते हैं । जाओ साधुओ, उपेक्षित वस्त्र, जो कफन है, वही साध्य है, उसे अँगिकार करना । संसार में जाग्रत होकर निवास करो । सभी जातियों, सभी धर्मों, सभी प्राणियों के पाँच घरों से उपलब्ध भिक्षाटन पर ही जीवन यापन एवँ प्राण रक्षा करो । खाद्य, अखाद्य, विधि निषेध से उपराम होकर जो रुचे सो पचे के सिद्धाँत का अवलम्बन लेकर पृथ्वी में विचरो । "

भिक्षाटन के विषय में अपने शिष्यों को शिक्षा देते हुए अघोरेश्वर भगवान राम जी ने बतलाया हैः

" मुड़िया साधु! जब दिन का मध्यान्ह बेला हो जाय तब ग्रामीण के घर भिक्षाटन के लिये जाना चाहिये । तब तक गृहस्थ मध्यान्ह का भोजन कर चुके होते हैं और जो कुछ बचा रहता है उसे देने में उन्हें हिचक नहीं होती है । तुम उन पर बोझ नहीं बनते और तुम्हें भिक्षा देकर वे अपने को वंचित नहीं समझते । ऐसा होने पर तूँ समझ जाना यही हमारा परम कर्तब्य है, साधुता है । यही औघड़ अघोरेश्वर के योग्य कृत्य है । "

क्रमशः

शनिवार, मार्च 13, 2010

अघोर साधना के मूल तत्वः होम व हवन

पुरातन काल में होम व हवन भिन्नार्थक हुआ करते थे । किसी पूजा अनुष्ठान, किसी सामाजिक कर्मकाण्ड, किसी जन बहुल उत्सव की समाप्ति की घोषणा के समय होम अनुष्ठित करने की प्रथा थी । होम में मुख्यतः समिधा की आहूति दी जाती थी । हवन होम से अलग दूसरे प्रकार की क्रिया होती थी । वैदिक देवी देवताओं को तृप्त करने तथा उनकी कृपा प्राप्ति के निमित्त यह कार्य किया जाता था । विभिन्न देवताओं के लिये हवन में समिधा के अलावा अलग अलग वस्तुओं की आहुति दी जाती थी । इसमें समिधा के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ, तण्डुल, गोधूम, पकवान, चन्दन  काष्ठ, धूप, धूनी, पशु मुण्ड, रक्त, माँस, विजित शत्रु का सिर, रक्त, माँस आदि की आहुति दी जाती थी ।

होम तो आज भी किया जाता है । सत्यनारायण कथा के अंत में, गणेशपूजा , दूर्गा पूजा, गृहारंभ के समय वास्तु पूजा, गृह प्रवेश के समय की पूजा आदि सब समय अंत में होम होता है । लोग मानते हैं कि होम के सुगन्ध भरे धुआँ मर्त्यलोक से उर्घ्वलोक में उत्थित होगा और वायु और आकाश विभिन्न गंधों से परिपूर्ण  हो जायेंगे जिससे पूजित देवता तृप्त होकर कृपा करेंगे ।

तन्त्र ग्रंथों में हवन का वर्णन विशद रुप से आता है । किसी भी मन्त्र का , देवता का अनुष्ठान की पूर्णता तभी होती है जब निश्चित मात्रा में जप किया जाय, जप का दशाँश हवन हो तथा हवन का दशाँश ब्राह्मण भोजन, जिसे आजकल भंडारा के रुप में किया जाता है , करना होता है । मन्त्र , देवता के अनुसार हवन में आहुति की मात्रा एवं सामग्री निश्चित होती है ।

अघोरपथ में भी हवन किया जाता है । अघोरपथ में हवन के बारे में निर्दिष्ठ बिधि की लिखित जानकारी तो अप्राप्य है, हाँ अघोरेश्वर भगवान राम जी के प्रवचनों में और साधकों ने अवधूत, अघोरेश्वर को जैसा हवन करते देखकर विवरण छिटपुट रूप से दिया है, उतनी ही जानकारी प्राप्त होती है । यह विवरण हवन के सर्वज्ञात स्वरुप के जैसा ही है अतः उसकी चर्चा करना पुनरुक्ति ही होगी ।
क्रमश:

शुक्रवार, मार्च 05, 2010

अघोर साधना के मूल तत्वः प्राणायाम

आज के समय में प्राणायाम कोई नया विषय नहीं है । भारत वर्ष में सभी किसी न किसी प्रकार से प्राणायाम से जुड़े हैं , वह चाहे स्वाश्थ्य रक्षा के निमित्त हो या आध्यात्मिक उन्नति के लिये साधना हो । प्राणायाम के विषय में बाजार में अनेक पुस्तकें , अनेक प्रशिक्षक , तथा अनेक संस्थाएँ  उपलब्ध हैं । हम यहाँ संक्षेप में प्राणायाम के विज्ञान की चर्चा करेंगे ।

प्राण श्वाँस प्रश्वाँस के समग्र को कहते हैं ।  श्वाँस प्रश्वाँस के सम्पूर्ण आयाम को नियंत्रित करने के विज्ञान का नाम है प्राणायाम । प्राण जीवन का आधार है । जब तक शरीर में प्राण का प्रवाह चल रहा है, मनुष्य जीवित है । प्राण की क्रियाशीलता समाप्त होते ही मनुष्य का शरीर मृत हो जाता है । जीवन के रहते तक ही संसार है, सारा प्रपञ्च है । अतः यह सिद्ध है कि मनुष्य के लिये प्राण की अहमियत और सबसे अधिक है ।

योग परम्परानुसार प्राण को पाँच विभागों में बाँटा गया है ।

१, प्राणः  शरीर के उपरी हिस्से में कण्ठनली, श्वासपटल और अन्न नलिका में यह क्रियाशील रहता है । यह श्वसन अँगों को क्रियाशील बनानेवाली माँसपेशियों को श्वास नीचे खींचने की क्रिया में सहयोग करता है । मनुष्य के जीवन का मुख्य हेतु यही प्राण है ।

२, अपानः  यह नाभि प्रदेश के नीचे क्रियाशील रहता है । वृक्क, मुत्रेंद्रिय, बड़ी आँत, गुदाद्वार के संचालन का आधार यही है । शरीर के दूषित वायू का निष्कासन यही करता है । कुण्डलिनी जागरण की क्रिया में भी इसका महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है ।
 
३,  समानः  छाती और नाभि के बीच प्रसरण करने वाला यह प्राण पाचन संस्थान, यकृत, क्लोम एवं जठर, आदि को नियंत्रित करता है । यह हृदय एव् रक्त अभिसरण को भी क्रियाशील रखने का हेतु है ।

४, उदानः नेत्र , नासिका, कान आदि इन्द्रियाँ तथा मस्तिष्क को क्रियाशील बनाये रखने का जिम्मा इसी प्राण का है । सोच विचार की शक्ति या चेतना का कारण यही पंराण है ।

५,  व्यानः  समस्त शरीर में व्याप्त रहकर यह अन्य प्राणों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य इसके द्वारा सम्पन्न होता है । माँसपेशियों , तन्तुओं, नाड़ियों तथा संधियों को क्रियाशील रखता है ।

इसके अलावा पाँच उपप्राण भी बताये गये है ।
१, नाग
२, कूर्म
३, क्रिकल
४, देवदत्त
५, धनंजय

उपप्राण शरीर की छोटी छोटी क्रियाओं जैसे छींकना, जमुहाई लेना, पलक झपकाना, हिचकी लेना आदि को सम्पादित करते हैं । अघोरपथ में धनंजय उपप्राण, जिसकी उपस्थिति कपाल में मानी गई है, के विषय में उल्लेख मिलता है । शवदाह के समय धनंजय प्राण को कपाल से मुक्त करने के लिये ही कपालक्रिया की जाती है । औघड़ या कापालिक इसी धनंजय प्राण का संधारण कपाल साधना के द्वारा करता है ।

साधारण योग प्रणाली में प्राण को नियंत्रित करना होता है । प्राण को नियंत्रित करना ही प्राणायाम है । प्राण के नियंत्रण से मन नियंत्रित होता है । ये दोनो ही निरंतर क्रियाशील रहने वाले हैं । प्राण के चंचल होने से मन चंचल होता है और मन के चंचल होने से प्राण चंचल हो जाता है । दोनो एक दूसरे के पूरक हैं । देह के तल पर प्राणायाम के लिये आसन सिद्धि नितान्त आवश्यक है । आसन सिद्ध होने पर वह एक आसन में लम्बे समय तक स्थिर बैठ सकता है । इससे शरीर में कम्पन नहीं होता, प्राण की क्रिया शाँत होती जाती है, शरीर हल्का हो जाता है और शरीर का भान मिटने लगता है । इस स्थिति का प्रभाव इन्द्रियों  और मन पर पड़ता है और योगी का सम्पर्क बाह्य जगत से बिच्छिन्न हो जाता है । यही प्रत्याहार अवस्था कहलाती है । इसके बाद योगी अन्तर जगत नें प्रवेश कर जाता है । आगे धारणा, ध्यान, और समाधि की क्रिया होती है ।

अघोरपथ में प्राण का महत्व अत्यधिक माना गया है । अघोरेश्वर भगवान राम जी ने कहा हैः " प्राणवायु ही हमारा उपास्य है ।"  एक अन्य मौके पर उन्होने कहा था किः " प्राणमय गुरु सदैव, सर्वत्र, सहज में , अभ्यास से जाने जाते है, देखे जाते हैं और उनसे शक्रगामी फल प्राप्त किये जा सकते हैं । गुरु देह नहीं हैं, प्राण हैं ।"

संत, महात्मा, अघोरेश्वर आदि ने कहीं कहीं प्राण की त्रिविध गति की अत्यंत संक्षेप में चर्चा की है । एक बाह्य और आभ्यन्तरिक गति, या सामान्य श्वास प्रश्वास । दूसरी अधः ऊर्ध्व गति या शरीर के नीचे से हृदय की ओर गति । तीसरी हृदय से ब्रह्मरंध्र गति । यह तीसरी गति अत्यंत रहस्यमय है ।इस गति का परिमाण ३६ अंगुल बताया गया है । योगी के लिये इस गति का अधिकारी होना श्रेष्ठ है ।

प्राणायाम स्वयमेव नहीं करना चाहिये । किञ्चित व्यतिक्रम होने से रोग होने की सम्भावना होती है ।

क्रमशः