शनिवार, मई 23, 2015

अघोर वचन- 29

"जब किसी काम को होना होता है तो उसका पहला एक लक्षण, दो लक्षण अपने सामने से गुजर जाता है । हम मार्क करें तो हम यह समझ सकते हैं कि अब उसका आगमन होने वाला है, और सचेत हो जाँय, और सचेत हो जाँय । और नहीं यदि हम ऐसे ही गुमराह में पड़े हैं तो गुमराह में पड़े रहेंगे ।"
                                                             ०००

मनुष्य विशेष करके गृहस्थ के जीवन में अनेक काम बड़े महत्व के होते हैं जैसे बच्चों की शिक्षा, शादी, मकान बनाना, आदि आदि । व्यक्ति पहले किसी काम के होने की कामना करता है, फिर प्रयत्न । कभी काम सध जाता है कभी नहीं सधता । वचन में कहा गया है कि हम थोड़ा स्थिर चित्त होकर घट रही घटनाओं पर ध्यान दें, संयोगों को पहचानने के लिये सचेष्ट हों तो जब काम को होना होता है तब उसके आसार दिखने लगते हैं । ऐसा संयोग बनता चला जाता है कि काम यथासमय पूर्ण हो जाता है । हम साधारणतः इन लक्षणों को, संयोगों को कभी पहचान पाते हैं और कभी नहीं पहचान पाते । स्थिर चित्त होंगे तो पहचानने लगेंगे ।

भगवत भक्त, साधक के जीवन में साधना के कई पड़ाव होते हैं । वही उसका काम है । जब गुरू कृपा या भगवत कृपा साधक पर होने वाली होती है तो उसके लक्षण पहले ही प्रकट होने लगते हैं । साधक का हृदय उल्लास से भरने लगता है । बिघ्न बाधायें दूर भाग जाती हैं । उपासना में मन रमने लगता है, आदि । साधक इन लक्षणों को देख समझ कर सचेत हो जाता है । वह जान जाता है कि उस अज्ञात की कृपा उस पर होने ही वाली है । वह धन्य हो उठेगा ।

काम के सधने में इस प्रकार की जानकारी का बड़ा महत्व है । कभी कभी जब काम होने वाला ही होता है हम अनजाने में वापस हो लेते हैं, काम को छोड़ देते हैं, प्रयत्न में शिथिलता आ जाती है और होने वाला काम भी नहीं होता । जब मनुष्य लक्षण पहचान लेता है, वह प्रयत्न में और भी अधिक गँभीरता से जुट जाता है । उसे छोड़ता
नहीं ।
                                                              ०००

गुरुवार, मई 21, 2015

अघोर वचन - 28

" वह पूर्ण विश्वास दे कि तुम्हें मैं अपनाया, और तुम अपना ही हमें भी मानो, और हम, जो तुम में है, उसे ही समझो । वही मेरी आत्मा, वह है । जो इस तरह करने के लिये मुझे बाध्य कर के इस विशेष अवस्था तक पहँचाया, जब इतना हो जाता है तब उसका दुलार, प्यार, लाड़ और वह आनन्द और वह सुख विभोर होता है । उसे कहा जाता है अवधूत, सन्त, महात्मा, महापुरूष ।"
                                                       ०००

यह वचन आध्यात्मिक साधना की सम्पूर्ण क्रिया विधि का विवरण समेटे हुये है । गुरू के समक्ष शिष्य के समर्पण करने से लेकर संत में रूपान्तरित होने तक की त्रुटिहीन प्रक्रिया का आलेखन अघोरेश्वर जैसे अधिकारी पुरूष द्वारा ही संभव है । जो जिस राह चला हो वही उस रास्ते का हाल बता सकता है । उसके अवरोधों, कठिनाईयों, आलोक या अँधकार का विवरण देकर मार्गदर्शन कर सकता है । ऐसा ही मार्गदर्शन साधक को सिद्ध और फिर महापुरूष बनने में सहायक होता है । अघोरियों में एक कहावत प्रचलित है कि गुरू शिष्य नहीं बनाता, वह तो गुरू बनाता है ।

श्रद्धालु जब अवधूत, संत, महात्मा के समक्ष ज्ञान के लिये निवेदन करता है तब दीक्षा देकर गुरू रूप में वे विश्वास देते हैं कि वे शिष्य के अपने हैं । यहाँ गुरू शिष्य की आत्म स्थिति एकीकरण की ओर बढ़ती है । गुरू आगे स्पष्ठ करते हैं कि हे ! शिष्य हम ही तुममें हैं । तुम कोई और नहीं हो । यह अद्वैत की स्थिति है । आगे है कि तुममें जो मैं, आत्मा के रूप में हूँ, उसी को तुम्हें समझना है । जानना है । मानना है ।

गुरू, शिष्य के हृदय में स्थापित हो जाता है । यह स्थापना शिष्य को हर समय सचेत करती रहती है । शिष्य कभी भी अपने को अपने ईष्ट से, अपने देवता से दूर नहीं पाता । उसके लिये सब कुछ आसान हो जाता है । धीरे धीरे उसके संचित संस्कारों का क्षय होता जाता है और वह परमानन्द में डूबकर सुखविभोर हो जाता है । इसी स्थिति को कहते हैं अवधूत, सन्त, महात्मा और महापुरूष ।
                                                                ०००

मंगलवार, मई 19, 2015

अघोर वचन - 27

"पाप के हटने ना हटने से, पुन्य के उदय होने न होने से जीव का उद्धार हो जाय सो समझ में नहीं आता । पूर्णतः मान्य नहीं होता । पूर्णतः मान तो तभी होता है कि उस अज्ञात के साथ वार्तालाप हो, पहुँचें, मिलें, मिलने के बाद देखा देखी हो, देखा देखी के बाद वह के पास हम बैठें और वह मुझे बैठावे, और इसको क्या कहते हैं... उपासना । उप्य आसन ।"
                                           ०००

तीन बातें हैं । पाप, पुन्य और उद्धार । संसार के सभी धर्मों में किसी ना किसी नाम, रूप से ये तीनों बातें पाई जाती हैं । कहा जाता है कि पापी का उद्धार नहीं होता, उद्धार के लिये पुन्यात्मा होना जरूरी है । अब यह कौन बताये कि मनुष्य का उद्धार कैसे होगा, क्या करना होगा, पाप कैसे हटे, पुन्य कैसे उदय हो, आदि आदि । इसका उत्तर तो उद्धारकर्ता ही दे सकता है और उद्धारकर्ता है वह अज्ञात, परमेश्वर ।

अघोरेश्वर साफ साफ कहते हैं कि पाप और पुन्य का मनुष्य के उद्धार में कोई सरोकार नहीं है । पाप न करने भर से किसी का उद्धार होने से रहा । पुन्य एकत्र करके कोई उद्धार हो लेगा सही नहीं लगता क्योंकि दोनों ही स्थितियों में उद्धारकर्ता वह ईश्वर अनुपस्थित है । उद्धार करना नहीं करना उसी का निर्णय है ।

वचन कहता है कि मनुष्य का उद्धार तभी होता है जब वह उस अज्ञात, जो उद्धारकर्ता है, से मिले । अज्ञात से कैसे मिलें ? उपासना से । हमारी उपासना ऐसी हो कि उनके आसन के समीप हमारा भी आसन लगे और उन्हें हम साकार देखें, बात करें, उनके पास बैठें आदि आदि । परन्तु मनुष्य के लिये उस अज्ञात से ऐसा होना सम्भव नहीं दिखता । फिर क्या हो?

इसके लिये दो वाक्य की एक कविता कही गई है । " भजन तजन के मध्य में हम करें विश्राम । हमारी भजन राम करें, हम करें आराम ।" अर्थात उपासना के मध्य में ऐसी स्थिति बने कि अपने में ना कुछ उदय हो ना अस्त । स्वयँ को खो दें यानि विश्राँति में चले जाँय और हमारी जो उपासना है, भजन है वह करे हमारा आत्माराम । अब बात स्पष्ठ हो गई कि जब मनुष्य का आत्माराम भजन करेंगे तो वह अज्ञात अज्ञात नहीं रह जायेगा । और उस मनुष्य का उद्धार निसंदेह होना है ।
                                                                  ०००
  

रविवार, मई 17, 2015

अघोर वचन - 26

" शुद्ध मन जिन कार्यों की अनुमति नहीं देता, उन्हें ऐसे कार्यों के लिये मत मनाओ, मत उकसाओ, अन्यथा वह बोझिल एवँ दुस्सह हो उठेगा । अनुचित कार्यों के लिये मन पर दबाव डालने से मस्तिष्क पर कुप्रभाव पड़ेगा और कंठ कुण्ठित हो जायेगा ।"
                                                               ०००

विकार रहित मन शुद्ध मन कहा जायेगा । मन के मुख्यतः चार विकार कहे गये हैं । १, काम २, क्रोध ३, लोभ ४, मोह । मनुष्य का मन इन जैसे अनेक वृत्तियों से मिलकर बना है अतः मन अपनी वृत्तियों से रहित नहीं हो सकता । जब तक मन की ये वृत्तियाँ अपनी स्वाभाविक अवस्था में होती हैं तब तक ये विकार नहीं कहलाती । लेकिन जब मनुष्य काम, क्रोध, लोभ और मोह का दास हो जाता है । मन हर हमेशा इनकी चिन्ता में लगा रहता है, ये अस्वाभाविक रूप से उग्र हो जाते हैं और मनुष्य का सम्पूर्ण अस्तित्व उस वृत्तिमय हो जाता है तब मन शुद्ध नहीं रह जाता अशुद्ध कहा जाता है । ऐसा अशुद्ध हुआ मन मनुष्य को गलत रास्तों की ओर ले जाता है ।

मन की शुद्धि के लिये उससे लड़ने की जरूरत नहीं है । महापुरूषों, संतों ने इसके लिये दो उपाय बताये हैं ।

पहला यह कि हम जागरूक हों । मन के क्रियाकलापों पर दृष्टि रखें । ये वृत्तियाँ जब भी विकार का रूप ग्रहण करने लगें हम इन्हें पहचानें, देखें और विचार करें । इतना ही विकार के शमन के लिये पर्याप्त है ।  

दूसरा है मन को किसी लक्ष्य पर टिकाये रखना । इसके लिये अजपा जाप की विधि सर्वोत्तम है, हालाँकि सबके लिये यह सँभव नहीं होता । कई लोग स्वाँस पर मन को टिकाने, गुरू मँत्र का निरँतर जाप करते रहने और सद् वृत्तयों जैसे मैत्री, करूणा, मुदिता और उपेक्षा आदि को बढ़ावा देने की विधि भी बतलाते हैं ।

कोई भी कार्य, चाहे वह गलत हो या सही, को करने का कारण हमारा मन है । यही मन गलत सही का निर्णय भी करता है । हमें रोकता भी है । हमें टोकता भी है । वचन में यही कहा गया है कि जब भी मन रोके, टोके हम उस पर ध्यान दें । सही गलत को परखें । ना कि मन को ही मनाने लग गये । इससे मन जो सूक्ष्म है स्थूल होने लगेगा । बोझिल हो जायेगा । हम भ्रमित हो जायेंगे । हमारा मस्तिष्क इस अवस्था में अस्वाभाविक व्यवहार करने लगेगा जो निश्चय ही हमारे लिये शुभ नहीं हो सकता ।
                                                                 ०००




शुक्रवार, मई 15, 2015

अघोर वचन - 25

" हम अभ्यन्तर से अपने इस त्रिगुणात्मक स्थिति से अवगत हो जायें और इस पीठ में हम अपने आप को स्थापित कर लेते हैं तो इसी में वह गुरूपीठ है, इसी में वह शक्तिपीठ है और यही हमारी ही आत्मा, हम ही वह सर्वगुण और रूपों में और अच्छे कर्मो की तरफ प्रेरित करती है ।"
                                                       ०००

गुण तीन बतलाये गये हैं, सत्, रज और तम । सत् गुण में सात्विकता, नैतिकता और पवित्रता होती है । रज गुण की राजस प्रकृति होती है । तम गुण में तामसिक प्रकृति यानि नष्ट भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति होती है । यह संसार त्रिगुणात्मक कहा गया है । कोई भी गुण बन्धन से अछूता नहीं है । मनुष्य में तीनों ही गुण होते हैं, परन्तु मात्रा की भिन्नता होती है । जिस गुण की प्रधानता होती है शरीर के अवयव भी उसी गुण के अनुरूप ढ़ले होते हैं । जो स्वच्छ मन और निर्मल दृष्टि सम्पन्न हैं उन्हें गुणों की यह मात्रात्मक भिन्नता दिखती है ।

वचन में कहा गया है कि मनुष्य अपने भीतर इन तीन गुणों की मात्रात्मक भिन्नता और उसके प्रभाव को पहचाने । यह नैसर्गिक स्थिति है । ईश्वर प्रदत्त है । पहचान होने पर हम जान सकेंगे कि हममें कौन सा गुण प्रबल है । किस गुण की मात्रा कम है । इससे हम अपने जीवन की वास्तविक दशा और दिशा भी जान सकेंगे । यह वैसा ही है जैसा कि खुद को जानना । पहचानना । यह है अपने भीतर झाँकना । अभ्यँतर में प्रवेश ।

मनुष्य के भीतर के इन गुणों की पहचान हो जाने पर वह एक स्थिति पर पहुँच जाता है । वह स्थिति ही पीठ कहा गया है और स्थापित कर लेने का अर्थ है स्थिति को यथावत रखना । इतनी यात्रा पूर्ण कर लेने के बाद मनुष्य स्वभावतः गुरू तत्व, शक्ति तत्व एवँ आत्म तत्व से परिचित हो जाता है । गुरू तत्व से ज्ञान, शक्ति तत्व से शक्ति तथा आत्म तत्व से निर्मलता, पवित्रता आती है । ऐसे व्यक्ति के कर्म बन्धन धीरे धीरे शिथिल होते जाते हैं और वह साधारण मनुष्य की श्रेणी से उपर उठ जाता है ।
                                                          ०००


बुधवार, मई 13, 2015

अघोर वचन - 24

" यदि आप विवाहित हैं तो उस एक नारी ब्रह्मचारी के नियम का पालन करें । जब कोई आसक्ति नहीं, उस मातृय को आप जानने लगेंगे तो आप का मन वैसे ही सुगम हो जायेगा । आप जो भी कार्य करेंगे सफलता को प्राप्त करेंगे ।"
                                                                ०००

अविवाहित, सन्यासी के लिये क्या सभी साधकों के लिये ब्रह्मचर्य पालन करना आवश्यक है । यदि साधक विवाहित है तो उसे एक नारी ब्रह्मचारी के नियम का पालन करना चाहिये । यहाँ तक तो बात सहज लगती है । सरल लगती है । कुछ एक अपवादों को छोड़कर सभी विवाहित कहेंगे कि हाँ वे इस नियम का पालन करते हैं । ये बात कुछ अँशों में सत्य भी है ।

एक नारी ब्रह्मचारी का यह सरल सा नियम उस समय कठिन या असम्भव सा जान पड़ने लगता है जब आसक्ति का प्रश्न उपस्थित होता है । मानव मन के अनेक रँग हैं । इसी संदर्भ का एक छोटा सा वाकया है । युरोप के एक जगत प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ने लिखा है कि उसकी शादी एक चर्च में हुई । उसकी प्रेमिका जिसे वह दिलोजान से चाहता था, उसकी पत्नि बनी । दोनों विवाह के बाद एक दूसरे के हाथ में हाथ डाले चर्च से घर जाने के लिये निकले । चर्च के गेट से बाहर आते ही उस मनोवैज्ञानिक को एक अत्यँत सुन्दर सी महिला दिखी । वह ठगा सा उसे देखता रह गया । उसने स्पष्ट शब्दों में उस समय की अपनी मनःस्थिति को और अपने इस कृत्य को स्वीकार किया है । यह आसक्ति का ही एक रूप है ।

जब विवाहित साधक एक नारी ब्रह्मचारी के नियम से बँधा होगा, उसके मन में लेस मात्र भी आसक्ति नहीं होगी तब वह मातृय यानिकि मातृ तत्व से अपरिचित नहीं रह सकता । साधक में इस स्थिति के विकास होते होते इतनी निर्मलता, इतनी पवित्रता आ जाती है कि वह फलों से लदी डाली की तरह झुक जाता है । सुगम हो जाता है ।   सहज हो जाता है ।

साधना पथ के पथिकों के लिये यह किसी सिद्धि से कम महत्व की नहीं है ।
                                                                       ०००






मंगलवार, मई 12, 2015

अघोर वचन - 23

" सुधर्मा ! तुम्हें यह पूर्णतः जान लेना होगा और जान कर अपने आप में, उस अज्ञात के चरणों में, व्यवहारिक अन्वेषण करना होगा । व्यवहारिक न होने के कारण दर्शन या फिलासफी बिल्कुल अधूरे हैं । दर्शन और फिलासफी अपने को, अपनी बुद्धि को, सत्य से अपरिचित रखता है । सत्य एवँ उस अज्ञात की दया और कृपा ही व्यवहारिक है ।"
                                                         ०००

मनुष्य का मन भी बड़ा विचित्र है । वह जानता है पर अनजान सरीखे जिये चला जाता है । मृत्यु अकाट्य सत्य है सब जानते हैं पर धन, सम्पत्ति, मान, सम्मान जोड़ते हुये ऐसे जीते हैं जैसे अनजान हों । यह जानना अपूर्ण है । अघोरेश्वर सुधर्मा यानिकि धर्म के, अघोर पथ के पथिक को कहते हैं कि जो तुम जानते हो उसे पूर्णतः जानना ।  उस जानने को मानना भी । शँका, अविश्वास के रहते पूर्णतः जानना नहीं होगा । दुनियाँ से अपने आप को अलग करके मत देखना । अपने पक्ष में कोई अतिरिक्त आशा मत पालना कि जानकर भी अनजान बन जाओ ।

जानना क्या है ? यह मूल प्रश्न है । मनुष्य को उपलब्ध शरीर और मन में नित्य जो घट रहा है उसे जानना है । संसार में अपने आसपास जो घट रहा है उसे भी जानना है । स्थिति निरपेक्ष होकर जानना है । समय निरपेक्ष होकर जानना है । और पूर्णतः जानना है । इस जानने के बाद अपने आप में उस जानने वाले को भी जानना है । उस अज्ञात को भी जानने सरीखे होना होगा । यही जानना व्यवहारिक अन्वेषण होगा ।

प्राचीन काल से ही भारत में दर्शन या फिलासफी की बहुलता रही है । डा० आंबेडकर ने अपनी पुस्तक " भगवान बुद्ध और उनका धर्म " में उल्लेख किया है कि भगवान बुद्ध के समय भारत में तिरसठ दर्शन प्रचलित थे । इन सभी दर्शनों ने अलग अलग या मिलकर भी एक बुद्ध पैदा नहीं कर सके क्योंकि दर्शन अधूरे हैं । कोरे सिद्धांत हैं । व्यवहारिक नहीं हैं । जल पर बड़े बड़े सिद्धांत रचकर प्यास नहीं बुझाई जा सकती । उसके लिये तो जल पीना पड़ेगा । जल पीना सत्य है । व्यवहार में आता है ।

सत्य जब व्यवहार में आ जाता है तो कुछ भी अनजाना नहीं रहता । सब कुछ दिखने लगता है । यही उसकी दया है । परमेश्वर, अज्ञात भी सत्य व्यवहार के पक्ष में होते हैं । सत्यनिष्ठ पर उनकी कृपा होती है ।
                                                            ०००