रविवार, जनवरी 24, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः श्री सर्वेश्वरी समूह










बाबा जी क्रींकुण्ड स्थल से निकलने के बाद से ही बनारस में अनेक स्थानों पर घूमते रहते थे । उनकी यात्रा कहीं ठहरती नहीं थी । आज इस जगह तो कल दूसरी जगह । मौज के दिन थे । जिधर मन किया निकल लिये । बन्धन कुछ था नहीं । बन्धन उन्हें स्वीकार भी नहीं था । इसी बीच आदि आश्रम हरिहरपुर का निर्माण भी हो गया था । वहाँ भी जाना होता था । जशपुर के आश्रमों के निर्माण के पश्चात कभी कभी वहाँ भी चले जाते थे । नवरात्री का अनुष्ठान प्रायः सोगड़ा आश्रम में होता था । बाबा बनारस में रहते थे तो १९५५, ५६ तक कोई एक ठिकाना नहीं था । पहले तो काशी के उत्तरी छोर पर ईश्वरगंगी के अखाड़े में कई साल तक छेदी बाबा के साथ अघोर साधना में रत रहे । औघड़ छेदी बाबा के निधन हो जाने के बाद पूना स्टेट के बाग में चले गये । उसके बाद राय पनारु दास के नाटी इमली वाली शीशे की बारादरी में ४ , ५ साल तक स्वच्छन्द रुप से अनुष्ठान और साधना करते रहे । यहाँ पर सत्संग और साधना में विश्वनाथ मंदिर के महँत लक्ष्मीशँकर तथा राय साहब का साथ बना रहा । यहीं पर काशी के एक मुसलमान भक्त हाजी इमामीसुलेमान मियाँ आपके सम्पर्क में आये । महँत लक्ष्मीशँकर जी के स्वर्गवास के उपराँत भक्त सुलेमान मियाँ के अनुरोध पर आपका आसन मंडुआडीह स्थित उनके बाग में लगा । यहाँ पर आप लम्बे समय तक रहे । बीच बीच में आप हरिहरपुर, सोगड़ा, नारायणपुर, तथा वामदेवनगर आदि आश्रमों में जाते रहे, परन्तु काशी लौटकर आप यहीं आते थे ।
श्रद्धालुओं और भक्तों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी । हर समय ५०,६० लोग आसपास रहते थे । कीर्तन भजन चलता रहता था । बातें भी होतीं रहतीं । बाबा के सम्मुख नाना प्रकार के प्रस्ताव रखे जाते । पूजा अर्चना यज्ञ आदि की चर्चा होती ही रहती थी । सन् १९६१ ई० के मध्य से ही भक्तों ने बाबा से निवेदन करना शुरु कर दिया था कि धर्म, जाति, राजनीति की कलुशता से मुक्त स्वच्छ और सार्वभौम मानव हितकारी भावनाओं एवं व्यवहारों से प्रेरित एक सँस्था होनी चाहिये । इस सँस्था निर्माण हेतु हाजी इमामीसुलेमान मियाँ भी भक्तों के साथ थे और अनुरोध करते रहते थे ।
अघोरेश्वर भगवान राम जी को भक्त लोग अब बाबा के अलावा सरकार भी कहने लगे थे । कोई कोई मालिक कहकर भी सम्बोधित करता था ।
सरकार मान गये । प्रत्यक्ष में तो भक्तों को यही लगा कि उनका प्रस्ताव सरकार ने स्वीकार कर लिया, परन्तु सत्य कुछ दूसरा ही था । बाबा बहुत पहले से ही परिस्थितियों को सँस्था निर्माण के लिये अनुकूल बनाते जा रहे थे । इसी क्रम में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तदनुसार जून १९६१ ई० को सरकार के आदेश से मड़ुवाडीह स्थित हाजी सुलेमान के बगीचे में ही , जहाँ आप निवास करते थे, सभी शाखाओं के लगभग तीस वैदिकों ने एकत्र होकर बसन्त पूजा की थी । बाद में निर्णय हुआ कि २१ सितम्बर सन् १९६१ ई० को सँस्था की स्थापना की जायेगी । सँस्था का नाम रखा गया "श्री सर्वेश्वरी समूह"
२१ सितम्बर सन् १९६१ ई० को श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना बड़े ही धूमधाम से की गई । हाजी सुलेमान के बगीचे में जहाँ सरकार का निवास था, सुबह से ही चहल पहल शुरु हो गयी थी । दोपहर बाद पँडित रामधारी शास्त्री जी ने स्थापना पूजन हेतु तैयारी शुरु कर दिया । श्री लल्लू सिंह जी एडवोकेट यजमान बने । उनके यजमान बनने की भी दिलचस्प कथा है । श्री लल्लूसिंह जी के शब्दों में हुआ कुछ इस प्रकार थाः
" शाम को साढ़े सात बजे हाजी सुलेमान के बगीचे में पहुँचा । देखा कि बगीचे में तमाम गाना बजाना , जलसा हो रहा है ।
बाबा को प्रणाम किया तो उन्होने कहा , " जा मामाजी से भेंट कई ल, ताहरा लायक कउनो काम होई त ऊ बता दिहें ।"
मैने जाकर मामाजी को प्रणाम किया और कहा कि मेरे लायक कोई काम हो तो बता दीजिये । उन्होने कहा कि सब कुछ है । बस पूजा का कलश नहीं है । मैंने कहा फिर सोच लीजिये । लाइन पार करके रात को नौ बजे हम जायेंगे । फिर ऐसा न हो कि कोई चीज छूट जाय । देखकर उनने कहा, बस, पूजा का कलश ले आइये । मैं गया । रात को साढ़े नौ बजे पूजा का कलश लाकर रख दिया । हमारे पंडित अंजनीनंदन मिश्र के मित्र रामधारी शास्त्री जी पूजा का संचालन कर रहे थे । साढ़े बारह बजे रात को उन्होंने बाबा से जाकर कहा, " बाबा कोई ऐसा व्यक्ति दीजिये जिसके हाथों से सँस्था को प्राण दिया जावे ।"
बाबा बोले, " हमरा ओकील के बुलाव ।"
गये तो बाबा बोले, " ई पंडित जी जौन कहें, तौन कुल कर दिह ।"
पंडित जी ले गये । उन्होंने हवन, पूजन, संकल्प सब कराया । उनकी आज्ञा से हमने अपने जीवन की प्रथम और आखिरी बलि भी वहाँ दी । श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना हो गई । उसके बाद पूज्य अघोरेश्वर अध्यक्ष, महाराजा जशपुर और महारानी जशपुर उपाध्यक्ष, लल्लूसिंह मंत्री, श्यामनारायण पाण्डेय संयुक्त मंत्री, भैयालाल सर्राफ कोषाध्यक्ष बने । सँस्था का लखनऊ में रजिस्ट्रेशन करवाकर, सन् १९६१ में ही ले आये । सँस्था रजिस्टर हो गई और हाजी सुलेमान के बगीचे में संस्था का प्रथम कार्यालय स्थापित हुआ । बाबा की आज्ञा से २१६४ नंबर का टेलीफोन उसी स्थान पर लगवाया गया । "










सँस्था रजिस्टर हो जाने के बाद बाबा ने समूह के पदाधिकारियों से बोले कि संस्था बन गई है तो उसका कार्यक्रम भी होना चाहिये । उन्होंने आगे कहा कि देखो, परिवार के लोग भी कुष्टी बन्धु को घृणा की दृष्टि से देखते हैं , समाज के हर वर्ग के लोग तो उनसे घृणा करते ही हैं । तुम लोग कुष्टी बन्धुओं की सेवा करो । उनका उपचार करो । उन्हें आरोग्य करो ।
इस प्रकार श्री सर्वेश्वरी समूह का संगठन हो गया ।
क्रमशः