सोमवार, सितंबर 28, 2009
क्रींकुण्ड गद्दी के चौथे महन्थ बाबा धौतार राम
अघोर परम्परा में जात पाँत के भेदभाव के लिये किंचित मात्र भी स्थान नहीं है । अघोराचार्यों ने जाति, धर्म, लिंग का भेदभाव न करते हुए शिष्य बनाया तथा ब्रम्हज्ञान का उपदेश दिया । आज भी यह धारा अविच्छिन्न गति से चलती चली आ रही है । बाबा बीजाराम जी के बाद क्रींकुण्ड की गद्दी पर चौथे महंथ के रुप में बाबा धौतार राम जी बैठे । आप ब्राह्मण कुमार थे । एक कलवार आचार्य के बाद इस अघोरपीठ पर एक ब्राह्मण कुमार का महंथ अभिषिक्त होना अपने आप में एक बड़ी बात है । बाबा धौतारराम के विषय में कोइ भी जानकारी उपलब्ध नहीं है । बाबा के प्रकरण में "आत्म चरितं न प्रकाशयेत " यह उक्ति शब्दशः चरितार्थ होती है ।
क्रमशः
शुक्रवार, सितंबर 25, 2009
क्रींकुण्ड के तीसरे महंथ बाबा बीजाराम
बाबा कीनाराम जी के प्रथम शिष्य एवं क्रीकुण्ड स्थल के तीसरे महंथ बाबा बीजाराम का पूर्व नाम , कुल, गोत्र आदि की जानकारी उपलब्ध नहीं है । उनका गाँव, जहाँ वे बाबा कीनाराम जी से भेंट के समय रहते थे, का नाम "नईडीह " है । बाबा का जन्म एक अत्यंत ही गरीब परिवार में हुआ था । बाबा बालक ही थे, जब उनके पिता का स्वर्गवास हो गया था ।
बाबा कीनाराम जी जब ग्राम नई डीह पहुँचे, उन्होने देखा, एक घासफूस की झोपड़ी है । झोपड़ी के द्वार पर एक बुढ़िया बैठी कलप कलप कर रो रही है । बुढ़िया के रोने का दृश्य कारुणिक था । बाबा कीनाराम जी करुणानिधान तो थे ही, उनका हृदय पसीज गया । उन्होने रोती हुई बुढ़िया को उसके दुख का कारण पूछा । पहले तो बाबा कीनाराम जी को कोई साधारण साधु समझकर बुढ़िया ने कहाः " जाओ बाबा तुम माँगो खाओ, हमारा दुखड़ा जानकर क्या करोगे " । परन्तु जब बाबा ने बहुत आग्रह किया तो न जाने क्या सोचकर बुढ़िया ने बतलाया " बाबा हमारे बेटे पर जमींदार का पोत चढ़ गया है, इसलिये वह उसे पकड़ ले गया है" । यह सुनकर बाबा कीनाराम जी ने बुढिया से जमींदार के घर ले चलने को कहा, जिसे उक्त बुढिया ने कुछ न समझते हुए भी मान लिया और उसने बाबा कीनाराम जी को जमींदार के यहाँ ले गई । बुढिया का पुत्र जमींदार के घर के बाहर धूप में पड़ा था । जमींदार उसे नानाप्रकार से प्रताड़ित कर रहा था । बुढिया ने अपने बेटे की ओर संकेत कर बाबा को बतला दिया कि धूप में प्रताड़ित किया जा रहा वही बालक उसका पुत्र है और पुनः रोने लगी । बाबा कीनाराम जी ने बालक को एकबार भरपूर दृष्टि से निहारकर जमींदार से कहा कि" मानवता के नाम पर, आपको क्रूर भावना त्यागकर इस बालक को छोड़ देना चाहिये "। बाबा कीनाराम जी के कथन पर विशेष ध्यान दिये बिना ही जमींदार बोला " अरे बाबा! तुम साधु हो भिक्षा लो और अपना काम देखो " । बाबा कीनाराम जी ने तो जैसे हठ पकड़ लिया । बाबा का हठ देखकर जमींदार की नाराजगी बढ़ रही थी, परन्तु वह साधु का अपमान भी नहीं करना चाहता था । अतः उन्हें निरुत्तर कर दूर हटाने की नियत से जमींदार ने कहा कि यदि इस लड़के से आपका ऐसा ही मोह है तो इसके उपर जितना पोत है वह आप चुका दो । इतना सुनना था कि बाबा ने उस लड़के से कहा " खड़ा तो हो जा बेटा " । बालक खड़ा हो गया । बाबा कीनाराम जी ने जमींदार से कहा कि " ले जहाँ वह बालक खड़ा है, वहाँ की जमीन खुदवा ले और जितना तेरा रुपया हो निकाल ले " । जमींदार बाबा के कहने पर जमीन खुदवाने के लिये एकाएक तो तैयार नहीं हुआ, परन्तु बाबा कीनाराम जी की दृढता के सामने उसे झुकना पड़ा । जमीन खोदी गई । हाथ दो हाथ खोदते न खोदते, वहाँ उपस्थित सभी आश्चर्य चकित हो देखते क्या हैं कि धरती से कलदार ही कलदार निकल रहे हैं । यह दृश्य देखते ही जमींदार समझ गया कि ये कोई सिद्ध महात्मा हैं । वह दौड़कर बाबा का पाँव पकड़ लिया और क्षमा याचना करने लगा । बाबा कीनाराम जी के क्षमा प्रदान करने पर ही उसने बाबा का पाँव छोड़ा । उसने तत्काल उस बालक को पोत मुक्त घोषित कर दिया ।
इस प्रकार लड़के को पोत मुक्त कराकर बाबा ने उसकी माँ को सौंप दिया और अपनी राह चलने लगे । बुढिया ने , जो इतनी देर तक संज्ञाशून्य अवस्था में खड़ी थी, बाबा के चरणों में गिर गई । उसने विनती भरे शब्दों में याचना की " महाराज! यह लड़का आपका है। आपको सौंपती हूँ । आप इसे अपने साथ ले जाँय ।" बाबा ने बुढिया को बहुत प्रकार से समझाया, पर वह नहीं मानी । विवश होकर बाबा कीनाराम जी ने उस बालक को स्वीकार कर लिया और उसे लेकर गिरनार की ओर चल पड़े । वही बालक बाद में बाबा बीजाराम कहलाये और क्रींकुण्ड की जगत प्रसिद्ध गद्दी के तीसरे महंथ हुए ।
महंथ बाबा बीजाराम ने अपने गुरु अघोराचार्य बाबा कीनाराम जी के दिब्य क्रियाकलापों, चमत्कार भरी घटनाओं, को संकलित कर औघड़ रामकीना कथा के नाम से लिपिबद्ध किया है ।
इसके अलावा बाबा बीजाराम के विषय में छिटपुट , जहाँतहाँ उल्लेख भर मिलता है ।
बाबा कीनाराम जी जब ग्राम नई डीह पहुँचे, उन्होने देखा, एक घासफूस की झोपड़ी है । झोपड़ी के द्वार पर एक बुढ़िया बैठी कलप कलप कर रो रही है । बुढ़िया के रोने का दृश्य कारुणिक था । बाबा कीनाराम जी करुणानिधान तो थे ही, उनका हृदय पसीज गया । उन्होने रोती हुई बुढ़िया को उसके दुख का कारण पूछा । पहले तो बाबा कीनाराम जी को कोई साधारण साधु समझकर बुढ़िया ने कहाः " जाओ बाबा तुम माँगो खाओ, हमारा दुखड़ा जानकर क्या करोगे " । परन्तु जब बाबा ने बहुत आग्रह किया तो न जाने क्या सोचकर बुढ़िया ने बतलाया " बाबा हमारे बेटे पर जमींदार का पोत चढ़ गया है, इसलिये वह उसे पकड़ ले गया है" । यह सुनकर बाबा कीनाराम जी ने बुढिया से जमींदार के घर ले चलने को कहा, जिसे उक्त बुढिया ने कुछ न समझते हुए भी मान लिया और उसने बाबा कीनाराम जी को जमींदार के यहाँ ले गई । बुढिया का पुत्र जमींदार के घर के बाहर धूप में पड़ा था । जमींदार उसे नानाप्रकार से प्रताड़ित कर रहा था । बुढिया ने अपने बेटे की ओर संकेत कर बाबा को बतला दिया कि धूप में प्रताड़ित किया जा रहा वही बालक उसका पुत्र है और पुनः रोने लगी । बाबा कीनाराम जी ने बालक को एकबार भरपूर दृष्टि से निहारकर जमींदार से कहा कि" मानवता के नाम पर, आपको क्रूर भावना त्यागकर इस बालक को छोड़ देना चाहिये "। बाबा कीनाराम जी के कथन पर विशेष ध्यान दिये बिना ही जमींदार बोला " अरे बाबा! तुम साधु हो भिक्षा लो और अपना काम देखो " । बाबा कीनाराम जी ने तो जैसे हठ पकड़ लिया । बाबा का हठ देखकर जमींदार की नाराजगी बढ़ रही थी, परन्तु वह साधु का अपमान भी नहीं करना चाहता था । अतः उन्हें निरुत्तर कर दूर हटाने की नियत से जमींदार ने कहा कि यदि इस लड़के से आपका ऐसा ही मोह है तो इसके उपर जितना पोत है वह आप चुका दो । इतना सुनना था कि बाबा ने उस लड़के से कहा " खड़ा तो हो जा बेटा " । बालक खड़ा हो गया । बाबा कीनाराम जी ने जमींदार से कहा कि " ले जहाँ वह बालक खड़ा है, वहाँ की जमीन खुदवा ले और जितना तेरा रुपया हो निकाल ले " । जमींदार बाबा के कहने पर जमीन खुदवाने के लिये एकाएक तो तैयार नहीं हुआ, परन्तु बाबा कीनाराम जी की दृढता के सामने उसे झुकना पड़ा । जमीन खोदी गई । हाथ दो हाथ खोदते न खोदते, वहाँ उपस्थित सभी आश्चर्य चकित हो देखते क्या हैं कि धरती से कलदार ही कलदार निकल रहे हैं । यह दृश्य देखते ही जमींदार समझ गया कि ये कोई सिद्ध महात्मा हैं । वह दौड़कर बाबा का पाँव पकड़ लिया और क्षमा याचना करने लगा । बाबा कीनाराम जी के क्षमा प्रदान करने पर ही उसने बाबा का पाँव छोड़ा । उसने तत्काल उस बालक को पोत मुक्त घोषित कर दिया ।
इस प्रकार लड़के को पोत मुक्त कराकर बाबा ने उसकी माँ को सौंप दिया और अपनी राह चलने लगे । बुढिया ने , जो इतनी देर तक संज्ञाशून्य अवस्था में खड़ी थी, बाबा के चरणों में गिर गई । उसने विनती भरे शब्दों में याचना की " महाराज! यह लड़का आपका है। आपको सौंपती हूँ । आप इसे अपने साथ ले जाँय ।" बाबा ने बुढिया को बहुत प्रकार से समझाया, पर वह नहीं मानी । विवश होकर बाबा कीनाराम जी ने उस बालक को स्वीकार कर लिया और उसे लेकर गिरनार की ओर चल पड़े । वही बालक बाद में बाबा बीजाराम कहलाये और क्रींकुण्ड की जगत प्रसिद्ध गद्दी के तीसरे महंथ हुए ।
महंथ बाबा बीजाराम ने अपने गुरु अघोराचार्य बाबा कीनाराम जी के दिब्य क्रियाकलापों, चमत्कार भरी घटनाओं, को संकलित कर औघड़ रामकीना कथा के नाम से लिपिबद्ध किया है ।
इसके अलावा बाबा बीजाराम के विषय में छिटपुट , जहाँतहाँ उल्लेख भर मिलता है ।
क्रमशः
सोमवार, सितंबर 14, 2009
अघोराचार्य बाबा कालूराम
अघोराचार्य बाबा कालूराम
क्रींकुण्ड गद्दी की महंथ परम्परा
१,बाबा कालूराम
२,महाराज कीनाराम
३, बाबा बीजाराम
४, बाबा धौतारराम
५, बाबा गइबीराम
६, बाबा भवानीराम
७,बाबा जयनारायणराम
८, बाबा मथुराराम
९,बाबा सरयूराम
१० बाबा दलसिंगारराम
११, बाबा राजेश्वररा
म
कीना कीना सब कहै, कालू कहै न कोय ।
कालू कीना एक भये, राम करें सो होय ।। "पोथी विवेकसार"
सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के आख्यान से सभी परिचित हैं । उन्होने स्वयं को बेचकर डोम के दास के रुप में काशी के श्मशान में मुर्दा जलाने के शुल्क वसूली का काम करते थे । वे पतित पावनी गंगा के जिस घाट पर यह कार्य किया करते थे उस घाट का नाम बाद में उनके नाम पर हरिश्चन्द्र घाट पड़ गया था । यहीं पर उनके पुत्र रोहितास के शव को दाह संस्कार के लिये लाया गया था । जिस डोम ने राजा हरिश्चन्द्र को खरीदा था, उसका नाम कालू था । उसी कालू ने क्रींकुण्ड के आसपास की सारी भूमि अघोराचार्य को दान दिया था । इसलिये पुरातन काल से ही इस गद्दी पर बैठनेवाले आचार्यों को यहाँ की जनता कालूराम कहकर सम्बोधित करने लगी ।
बाबा कालूराम के विषय में नामोल्लेख के अलावा कोई अधिक विवरण प्राप्त नहीं होता । बाबा कालूराम और बाबा कीनाराम जी के प्रथम भेंट का विवरण बड़ा ही रोचक है । कथा कहती है कि बाबा कीनाराम जी हिमालय में बहुत दिनों तक तपस्या करने के बाद काशी लौटकर हरिश्चन्द्र घाट स्थित श्मशान पहुँचे । उन दिनों वहाँ बाबा कालूराम का डेरा जमा हुआ था । वे श्मशान में दाह के लिये आने वाले मृतकों की पड़ी हुई खोपड़ियों को अपने सिद्धिबल से पास बुलाते थे और उन्हें चना खिलाया करते थे । यह चमत्कार देखकर बाबा कीनाराम जी चकित रह गये । उन्होंने भी अपनी शक्ति का परिचय दिया । बाबा कीनाराम जी ने ऐसा स्तंभन किया कि जब बाबा कालूराम ने खोपड़ियाँ बुलाईं तो वे आईं ही नहीं । बाबा कालूराम ने ध्यान लगाकर सब माजरा जान लिया । वे बाबा कीनाराम जी को भी पहचान गये । बाबा कीनाराम जी ने आगे बढ़कर कहाः " महाराज ! यह क्या खेल कर रहे हैं, चलिये अपने स्थान पर चलिये । " बाबा कालूराम ने कहा कि "मुझे बड़ी भूख लगी है, मछली खिलाओगे ।" बाबा कीनाराम जी ने तत्काल गंगाजी से कहा, "गंगिया ला एक मछली तो दे जा ।" बाबा का इतना कहना भर था कि एक बड़ी सी मछली पानी से बाहर रेत पर आकर पड़ रही । बाबा कीनाराम जी ने उसे भूना और सबने उसे भोग लगाया । यह घटना संवत् १७५४ विक्रमी के आस पास की है ।
बाबा कीनाराम जी का इतना परिचय प्राप्त करने के उपरांत बाबा कालूराम ने बाबा कीनाराम जी को अपना वास्तविक स्वरुप का दर्शन कराया । उन्हें क्रीं कुण्ड ले गये । वहीं बाबा कीनाराम जी को अघोर मंत्र देकर अपना शिष्य बना लिया । इसके पश्चात बाबा कीनाराम जी क्रींकुण्ड गद्दी के महंथ हो गये ।
बाबा कालूराम का कहीं कहीं छिटपुट उल्लेख मिलता है, जिसका यथास्थान उल्लेख किया जायेगा ।
===============================
क्रमशः
क्रींकुण्ड गद्दी की महंथ परम्परा
१,बाबा कालूराम
२,महाराज कीनाराम
३, बाबा बीजाराम
४, बाबा धौतारराम
५, बाबा गइबीराम
६, बाबा भवानीराम
७,बाबा जयनारायणराम
८, बाबा मथुराराम
९,बाबा सरयूराम
१० बाबा दलसिंगारराम
११, बाबा राजेश्वररा

कीना कीना सब कहै, कालू कहै न कोय ।
कालू कीना एक भये, राम करें सो होय ।। "पोथी विवेकसार"
सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के आख्यान से सभी परिचित हैं । उन्होने स्वयं को बेचकर डोम के दास के रुप में काशी के श्मशान में मुर्दा जलाने के शुल्क वसूली का काम करते थे । वे पतित पावनी गंगा के जिस घाट पर यह कार्य किया करते थे उस घाट का नाम बाद में उनके नाम पर हरिश्चन्द्र घाट पड़ गया था । यहीं पर उनके पुत्र रोहितास के शव को दाह संस्कार के लिये लाया गया था । जिस डोम ने राजा हरिश्चन्द्र को खरीदा था, उसका नाम कालू था । उसी कालू ने क्रींकुण्ड के आसपास की सारी भूमि अघोराचार्य को दान दिया था । इसलिये पुरातन काल से ही इस गद्दी पर बैठनेवाले आचार्यों को यहाँ की जनता कालूराम कहकर सम्बोधित करने लगी ।
बाबा कालूराम के विषय में नामोल्लेख के अलावा कोई अधिक विवरण प्राप्त नहीं होता । बाबा कालूराम और बाबा कीनाराम जी के प्रथम भेंट का विवरण बड़ा ही रोचक है । कथा कहती है कि बाबा कीनाराम जी हिमालय में बहुत दिनों तक तपस्या करने के बाद काशी लौटकर हरिश्चन्द्र घाट स्थित श्मशान पहुँचे । उन दिनों वहाँ बाबा कालूराम का डेरा जमा हुआ था । वे श्मशान में दाह के लिये आने वाले मृतकों की पड़ी हुई खोपड़ियों को अपने सिद्धिबल से पास बुलाते थे और उन्हें चना खिलाया करते थे । यह चमत्कार देखकर बाबा कीनाराम जी चकित रह गये । उन्होंने भी अपनी शक्ति का परिचय दिया । बाबा कीनाराम जी ने ऐसा स्तंभन किया कि जब बाबा कालूराम ने खोपड़ियाँ बुलाईं तो वे आईं ही नहीं । बाबा कालूराम ने ध्यान लगाकर सब माजरा जान लिया । वे बाबा कीनाराम जी को भी पहचान गये । बाबा कीनाराम जी ने आगे बढ़कर कहाः " महाराज ! यह क्या खेल कर रहे हैं, चलिये अपने स्थान पर चलिये । " बाबा कालूराम ने कहा कि "मुझे बड़ी भूख लगी है, मछली खिलाओगे ।" बाबा कीनाराम जी ने तत्काल गंगाजी से कहा, "गंगिया ला एक मछली तो दे जा ।" बाबा का इतना कहना भर था कि एक बड़ी सी मछली पानी से बाहर रेत पर आकर पड़ रही । बाबा कीनाराम जी ने उसे भूना और सबने उसे भोग लगाया । यह घटना संवत् १७५४ विक्रमी के आस पास की है ।
बाबा कीनाराम जी का इतना परिचय प्राप्त करने के उपरांत बाबा कालूराम ने बाबा कीनाराम जी को अपना वास्तविक स्वरुप का दर्शन कराया । उन्हें क्रीं कुण्ड ले गये । वहीं बाबा कीनाराम जी को अघोर मंत्र देकर अपना शिष्य बना लिया । इसके पश्चात बाबा कीनाराम जी क्रींकुण्ड गद्दी के महंथ हो गये ।
बाबा कालूराम का कहीं कहीं छिटपुट उल्लेख मिलता है, जिसका यथास्थान उल्लेख किया जायेगा ।
===============================
क्रमशः
शुक्रवार, सितंबर 11, 2009
क्रीं कुण्ड

*क्रीं कुण्ड , शिवाला, भेलूपुर , वाराणसी
बाबा कीनाराम ने न तो स्वयं कोई आत्मचरित लिखा है और न उनके भक्तों तथा अनुयायियों ने ही कोई विशेष सामग्री छोड़ी है, जिससे उनकी जीवनी की प्रामाणिक जानकारी हो सके । जो जानकारी आज उपलब्ध है वह मुख्य रुप से विभिन्न आश्रमों में लगे शिलालेख , जनश्रुतियाँ, और बाबा कीनाराम जी द्वारा रचित ग्रंथों से प्राप्त की गई है । अब तक बाबा कीनाराम द्वारा रचित अनेक पुस्तकों में से केवल पाँच पुस्तकें ही प्रकाशित हुई हैं ।( विवेकसार, रामगीता, रामरसाल, गीतवली, और उन्मुनीराम ) । बाबा कीनाराम जी की जगत प्रसिद्ध गद्दी "क्री कुण्ड" शिवाला, वाराणसी में स्थित है । इस स्थल में लगे शिलालेख से इस गद्दी की महन्त परम्परा की जानकारी मिलती है । शिलालेख इस प्रकार हैः
"महाराज कीनाराम
गिरनार स्थान कृम कुण्ड बी. ३।३३५ भेलूपुर वाराणसी
१,बाबा कालूराम २,महाराज कीनाराम ३, बाबा बीजाराम ४, बाबा धौतारराम ५, बाबा गइबीराम ६, बाबा भवानीराम ७,बाबा जयनारायणराम ८, बाबा मथुराराम ९,बाबा सरयूराम १० बाबा दलसिंगारराम ११, बाबा राजेश्वरराम
सन् १९५८ से वार्षिकोत्सव के अवसर पर वेश्याओं का नाच गाना निषिद्ध ।"
क्रीं कुण्ड स्थल में कुण्ड के अलावा कई शताब्दियों से जलती अखण्ड धूनी, आश्रम परिसर, तथा अनेक समाधियाँ हैं ।
अखन्ड धूनी महन्त गद्दी के सामने दालान में है । इसे सदियों से श्मशान से लाई लकड़ियों से प्रज्वलित रखा जा रहा है । चिरकाल से जलती इस धूनी को कई उच्च साधकों की तपस्या व योग देने का अवसर मिला है । इस धूनी से कोई दुर्गंध नहीं आती । साधुओं द्वारा दी गई इस धूनी की विभूति से अनेक रोग शोक दूर भाग जाते हैं ।
बाबा कीनाराम ने न तो स्वयं कोई आत्मचरित लिखा है और न उनके भक्तों तथा अनुयायियों ने ही कोई विशेष सामग्री छोड़ी है, जिससे उनकी जीवनी की प्रामाणिक जानकारी हो सके । जो जानकारी आज उपलब्ध है वह मुख्य रुप से विभिन्न आश्रमों में लगे शिलालेख , जनश्रुतियाँ, और बाबा कीनाराम जी द्वारा रचित ग्रंथों से प्राप्त की गई है । अब तक बाबा कीनाराम द्वारा रचित अनेक पुस्तकों में से केवल पाँच पुस्तकें ही प्रकाशित हुई हैं ।( विवेकसार, रामगीता, रामरसाल, गीतवली, और उन्मुनीराम ) । बाबा कीनाराम जी की जगत प्रसिद्ध गद्दी "क्री कुण्ड" शिवाला, वाराणसी में स्थित है । इस स्थल में लगे शिलालेख से इस गद्दी की महन्त परम्परा की जानकारी मिलती है । शिलालेख इस प्रकार हैः
"महाराज कीनाराम
गिरनार स्थान कृम कुण्ड बी. ३।३३५ भेलूपुर वाराणसी
१,बाबा कालूराम २,महाराज कीनाराम ३, बाबा बीजाराम ४, बाबा धौतारराम ५, बाबा गइबीराम ६, बाबा भवानीराम ७,बाबा जयनारायणराम ८, बाबा मथुराराम ९,बाबा सरयूराम १० बाबा दलसिंगारराम ११, बाबा राजेश्वरराम
सन् १९५८ से वार्षिकोत्सव के अवसर पर वेश्याओं का नाच गाना निषिद्ध ।"
क्रीं कुण्ड स्थल में कुण्ड के अलावा कई शताब्दियों से जलती अखण्ड धूनी, आश्रम परिसर, तथा अनेक समाधियाँ हैं ।
अखन्ड धूनी महन्त गद्दी के सामने दालान में है । इसे सदियों से श्मशान से लाई लकड़ियों से प्रज्वलित रखा जा रहा है । चिरकाल से जलती इस धूनी को कई उच्च साधकों की तपस्या व योग देने का अवसर मिला है । इस धूनी से कोई दुर्गंध नहीं आती । साधुओं द्वारा दी गई इस धूनी की विभूति से अनेक रोग शोक दूर भाग जाते हैं ।
अखण्ड धूनी,
इस स्थल में औघड़ों का सिंहासन भी प्राँगण के मध्य में रखा है । इसे बाबा कीनाराम जी का तपासन भी कहा जाता है
इस स्थल में औघड़ों का सिंहासन भी प्राँगण के मध्य में रखा है । इसे बाबा कीनाराम जी का तपासन भी कहा जाता है
कीनाराम जी का तपासन
साधकों के लिये इस स्थल के गर्भगृह में भी पूजा करने के लिये काली मन्दिर बना है । साधकों को बाहरी आवागमन से विध्न उपस्थित नहीं होता, अतः यह गोप्य पूजा स्थल भी है ।
क्रमशः
साधकों के लिये इस स्थल के गर्भगृह में भी पूजा करने के लिये काली मन्दिर बना है । साधकों को बाहरी आवागमन से विध्न उपस्थित नहीं होता, अतः यह गोप्य पूजा स्थल भी है ।
क्रमशः
सदस्यता लें
संदेश (Atom)