सोमवार, सितंबर 14, 2009

अघोराचार्य बाबा कालूराम

अघोराचार्य बाबा कालूराम
क्रींकुण्ड गद्दी की महंथ परम्परा
१,बाबा कालूराम
२,महाराज कीनाराम
३, बाबा बीजाराम
४, बाबा धौतारराम
५, बाबा गइबीराम
६, बाबा भवानीराम
७,बाबा जयनारायणराम
८, बाबा मथुराराम
९,बाबा सरयूराम
१० बाबा दलसिंगारराम
११, बाबा राजेश्वररा


















कीना कीना सब कहै, कालू कहै न कोय ।
कालू कीना एक भये, राम करें सो होय ।। "पोथी विवेकसार"


सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के आख्यान से सभी परिचित हैं । उन्होने स्वयं को बेचकर डोम के दास के रुप में काशी के श्मशान में मुर्दा जलाने के शुल्क वसूली का काम करते थे । वे पतित पावनी गंगा के जिस घाट पर यह कार्य किया करते थे उस घाट का नाम बाद में उनके नाम पर हरिश्चन्द्र घाट पड़ गया था । यहीं पर उनके पुत्र रोहितास के शव को दाह संस्कार के लिये लाया गया था । जिस डोम ने राजा हरिश्चन्द्र को खरीदा था, उसका नाम कालू था । उसी कालू ने क्रींकुण्ड के आसपास की सारी भूमि अघोराचार्य को दान दिया था । इसलिये पुरातन काल से ही इस गद्दी पर बैठनेवाले आचार्यों को यहाँ की जनता कालूराम कहकर सम्बोधित करने लगी ।
बाबा कालूराम के विषय में नामोल्लेख के अलावा कोई अधिक विवरण प्राप्त नहीं होता । बाबा कालूराम और बाबा कीनाराम जी के प्रथम भेंट का विवरण बड़ा ही रोचक है । कथा कहती है कि बाबा कीनाराम जी हिमालय में बहुत दिनों तक तपस्या करने के बाद काशी लौटकर हरिश्चन्द्र घाट स्थित श्मशान पहुँचे । उन दिनों वहाँ बाबा कालूराम का डेरा जमा हुआ था । वे श्मशान में दाह के लिये आने वाले मृतकों की पड़ी हुई खोपड़ियों को अपने सिद्धिबल से पास बुलाते थे और उन्हें चना खिलाया करते थे । यह चमत्कार देखकर बाबा कीनाराम जी चकित रह गये । उन्होंने भी अपनी शक्ति का परिचय दिया । बाबा कीनाराम जी ने ऐसा स्तंभन किया कि जब बाबा कालूराम ने खोपड़ियाँ बुलाईं तो वे आईं ही नहीं । बाबा कालूराम ने ध्यान लगाकर सब माजरा जान लिया । वे बाबा कीनाराम जी को भी पहचान गये । बाबा कीनाराम जी ने आगे बढ़कर कहाः " महाराज ! यह क्या खेल कर रहे हैं, चलिये अपने स्थान पर चलिये । " बाबा कालूराम ने कहा कि "मुझे बड़ी भूख लगी है, मछली खिलाओगे ।" बाबा कीनाराम जी ने तत्काल गंगाजी से कहा, "गंगिया ला एक मछली तो दे जा ।" बाबा का इतना कहना भर था कि एक बड़ी सी मछली पानी से बाहर रेत पर आकर पड़ रही । बाबा कीनाराम जी ने उसे भूना और सबने उसे भोग लगाया । यह घटना संवत् १७५४ विक्रमी के आस पास की है ।
बाबा कीनाराम जी का इतना परिचय प्राप्त करने के उपरांत बाबा कालूराम ने बाबा कीनाराम जी को अपना वास्तविक स्वरुप का दर्शन कराया । उन्हें क्रीं कुण्ड ले गये । वहीं बाबा कीनाराम जी को अघोर मंत्र देकर अपना शिष्य बना लिया । इसके पश्चात बाबा कीनाराम जी क्रींकुण्ड गद्दी के महंथ हो गये ।
बाबा कालूराम का कहीं कहीं छिटपुट उल्लेख मिलता है, जिसका यथास्थान उल्लेख किया जायेगा ।
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क्रमशः










1 टिप्पणी:

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