शनिवार, मई 08, 2010

अघोर परम्परा के प्रसिद्ध स्थल

बिंध्याचल
बिंध्य की पर्वत श्रृँखला एवं उसमें अवस्थित माँ बिंध्यवासिनी का शक्तिपीठ भारत ही नहीं अपितु समग्र विश्व में प्रसिद्ध है । मिरजापुर इस स्थल का रेलवे स्टेशन है, जहाँ से इसकी दूरी मात्र आठ किलोमीटर है । सड़क मार्ग से यह स्थान बनारस, इलाहाबाद, मऊनाथभंजन, रीवा, और औरंगाबाद से जुड़ा हुआ है । बनारस से ७० किलोमीटर तथा इलाहाबाद से ८३ किलोमीटर की दूरी पर बिंध्याचल धाम स्थित है ।

कहा जाता है कि महिषासुर बध के पश्चात माता दूर्गा इसी स्थान पर निवास हेतु ठहर गईं थीं, इसीलिये यहाँ की अधिष्ठात्री देवी माता दूर्गा को बिंध्यवासिनी के रुप में पूजन किया जाता है । इस स्थल में तीन मुख्य मन्दिर हैं । विन्ध्यवासिनी, कालीखोह और अष्टभुजा । इन मन्दिरों की स्थिति त्रिकोण यन्त्रवत् है । इनकी त्रिकोण परिकरमा भी की जाती है । इस पर्वत में अनेक गुफाएँ हैं, जिनमें रहकर साधक साधना करते हैं । आज भी अनेक साधक , सिद्ध, महात्मा, अवधूत, कापालिक आदि से यहाँ भेंट हो सकती है । इनके अलावा इस स्थल में सैकड़ों मन्दिर बिखरे पड़े हैं ।
बिंध्याचल पर्वत में तीन मुख्य कुण्ड हैं । प्रथम सीताकुण्ड है । कहते हैं रावण बध के पश्चात भगवान रामचन्द्र जी की वापसी यात्रा के समय भगवती सीता जी को बड़ी प्यास लगी । रामअनुज लक्ष्मण जी के तीर चलाने से इस कुण्ड का निर्माण हुआ और भगवती सीता माई की प्यास का शमन हुआ । यहीं से मन्दिर के लिये सीढ़ियाँ जाती हैं । पहले अष्टभुजा मन्दिर है । अष्टभुजा मन्दिर में ज्ञान , विवेक की देवी माता सरस्वती बिराजती हैं । उससे उपर कालीखोह है । यह स्थान यथा नाम काली जी का है । फिर आता है बिंध्याचल का मुख्य मन्दिर माता बिंध्यवासिनी मन्दिर ।
अघोरेश्वर भगवान राम जी अपने साधना काल में कई वर्षों तक बिंध्याचल में रहे थे । बिंध्याचल में अष्टभुजा मन्दिर से कालीखोह की तरफ थोड़ी दूरी पर एक स्थान आता है, भैरव कुण्ड । यहाँ से प्रायः तीन सौ मीटर की उँचाई पर एक गुफा है । इसी गुफा में अघोरेश्वर रहते थे । आपको याद होगा इसी गुफा में जशपुर के महाराजा स्वर्गीय बिजयभूषण सिंह देव ने अघोरेश्वर का प्रथम दर्शन किया था । बाबा के इस स्थल पर निवास, तपस्या की स्मृति में एक कीर्ति स्तम्भ स्थापित किया गया है, जिसके चारों ओर बाबा के संदेश अँकित हैं । गुफा के भीतर भक्तों, श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ अघोरेश्वर की चरण पादुका एक चट्टान में जड़ दी गई है । यहाँ कई एक साधक आकर नाना प्रकार की साधनाएँ करते और अघोरेश्वर की कृपा से सिद्धी पाकर कृतकृत्य होते हैं ।
भैरवकुण्ड के स्वामी अक्षोभ्यानन्द सरस्वती , जो अघोरपथ के पथिक तो नहीं थे, परन्तु आचार, व्यवहार, शक्ति,और विद्या के मामले में अधिकारी विद्वान थे । स्बामी जी शाक्त परम्परा के कुलावधूत थे । आपको वाक् सिद्धी थी । आपकी प्रसिद्धी दूर दूर तक थी । गृहस्थ से तप के मार्ग में चलकर जिन गिनेचुने महान आत्माओं ने अध्यात्म की उच्चावस्था को प्राप्त किया है, उनमें से एक भैरवकुण्ड के स्वामी अक्षोभ्यानन्द सरस्वती जी भी हैं ।
क्रमशः



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