शनिवार, जुलाई 03, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः शिष्य समुदाय


सन् १९६७ ई० के नेपाल भ्रमण के पश्चात बाबा जशपुरनगर के आश्रमों की व्यवस्था तथा अनुष्ठान आदि के लिये सोगड़ा चले गये । बाबा के पास विभिन्न मन्तव्य लेकर अनेकानेक लोग आने लगे थे । उनका ध्येय ज्यादातर लौकिक समृद्धि, आल औलाद, नौकरी चाकरी, शादी ब्याह आदि के लिये याचना करना और अघोरेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करना होता था । अघोरेश्वर इस बात से दुखी हो उठते थे । उनके पास अध्यात्म की विशाल सम्पदा थी और वे उस सम्पत्ति को मुक्त हस्त से बाँटना भी चाहते थे, पर उनके पास आने वालों में से ज्यादातर लोगों की रुचि अध्यात्म की ओर नहीं थी। उन्ही के बीच कुछ दिब्य आत्माओं ने भी बाबा से सम्पर्क साधा और उनका आशीर्वाद पाकर कृतकृत्य भी हुए । कतिपय ऐसी ही आत्माओं का संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है ।

आदरणीय पारस नाथ जी सहाय

सहाय जी का जन्म पटना में हुआ था । पिता दीवान थे अतः आपका लालन पालन राजपरिवार में हुआ । गौर वर्ण, लम्बा, दुबला पर स्वस्थ काया, अजान बाहू, भेदक दृष्टी, आप दिब्य दर्शन पुरुष हैं । आप दो भाई हैं । आपकी बहनें भी दो थीं । सबसे बड़ी बहन आरा बिहार में ब्याही थी । दूसरी बहन पूर्व रायगढ़ जिला में जशपुरनगर में व्याही थी । दूसरी बहन के पास रहने के उद्देश्य से आप जशपुरनगर आ बसे तथा क्लर्क की सरकारी नौकरी करने लगे थे । सभी लोग इसीलिये आपको सहाय बाबू के नाम से ही जानते हैं ।
एकबार आपने बतलाया था कि "वे अभी किशोर ही थे । अपनी दीदी के यहाँ आरा गये हुए थे । वहीं अघोरेश्वर से उनकी भेंट किसी एकाँत जगह पर हो गई थी और गुरू का आशीर्वाद अनायास ही प्राप्त हो गया था । "

बाद में आपकी शादी हो गई और आप जशपुरनगर आ गये थे । एक बार आपने लेखक को बतलाया था कि सोगड़ा आश्रम में आपका दीक्षा संस्कार हुआ था । आप उस समय के साधक हैं जब अघोरेश्वर मुक्तहस्त से साधनाएँ बाँटा करते थे । जिसने जो माँगा वह मिला । जिसने जो जानना चाहा बता दिया । बाद में तो बाबा भी ठोक बजाकर शिष्य बनाते थे और उसके पात्र के अनुसार ही साधना बतलाते थे ।
इस लेखक की भेंट सहाय बाबू से सन् १९७२ ई० में हुई थी तथा आज भी सम्पर्क बना हुआ है । आदरणीय सहाय बाबू ने ही लेखक को अघोरेश्वर के चरणों में शरण लेने के लिये प्रेरित किया था ।
सहाय बाबू मुड़िया साधू तो नहीं हैं । गृहस्थ हैं , परन्तु योगी दीक्षा प्राप्त सम्पूर्ण योगी हैं । अघोरेश्वर के जशपुर आगमन के पश्चात प्रारंभिक शिष्यों में से एक सहाय जी गृहस्थ होते हुए भी साधू का जीवन जीते हैं । लेखक को सहाय बाबू को पास से देखने का अनेक बार अवसर मिला है । वे अत्यंत ही सादा जीवन जीते हैं । उनकी आवश्यकताएँ अत्यंत ही अल्प मात्रा में होती हैं । उनकी साधना बड़े ही गोपनीय ढ़ँग से चलती रहती है । यदि आप साथ हैं तो वे आपको कभी सोते हुए नहीं मिलेंगे । आज लगभग ७५ वर्ष की आयु में भी आप अधेड़ दिखते है तथा शरीर में वही चुस्तीफुर्ती विद्यमान है । चेहरे का तेज तो बस देखते ही बनता है ।
आदरणीय सहाय बाबू सिद्ध महात्मा हैं । उनके अनेक अलौकिक कृत्य लेखक ने देखा सुना है । आप " आत्म चरितम् न प्रकाशयेत " में विश्वास रखते हैं । आजकल आप साधारण गृहस्थ का जीवन जीते हुए रायगढ़, छत्तिसगढ़ में निवास कर रहे हैं ।

अवधूत श्याम राम जी

आपका पूर्व नाम श्री विरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव था । आपका जन्म छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में धर्मजयगढ़ में हुआ था । आपका परिवार धर्मजयगढ़ का उच्च और सम्मानित कायस्थ परिवार है । आपका परिवार पढ़ा लिखा बुद्धिजीवीयों के परिवार के रुप में जाना जाता है । आप पूर्व धर्मजयगढ़ स्टेट में थानेदार के पद पर कार्यरत थे । स्टेट बिलय के पश्चात आप मलेरिया इन्स्पेक्टर के पद पर कार्य करने लगे । आप शुरू से ही नैतिकवान तथा सच्चरित्र अधिकारी के रुप में विख्यात थे ।
एक बार अपनी नौकरी के सिलसिले में दौरा करते समय आपको जँगल में अघोरेश्वर भगवान राम जी का दर्शन लाभ हो गया । दर्शन लाभ होते ही आपका मन सँसार से उचाट हो गया । आप नौकरी छोड़कर अघोरेश्वर की शरण में सोगड़ा आश्रम पहुँच गये । आपके साधु बनने के समय पत्नि, सन्तान, भाईयों सहित भरा पूरा परिवार था । परिवार ने भी प्रसन्नतापूर्वक आपको अपने पारिवारिक दायित्वों से मुक्त कर साधु जीवन स्वीकारने में सहयोग प्रदान किया था ।
दीक्षा के उपराँत आपका नाम श्याम बाबा अघोरी हो गया । आप यौगिक क्रियाओं में अत्यँत ही प्रवीण थे । आपकी गुरु निष्ठा अद्वितीय थी । क्षेत्रीय जनता के लिये आप बड़े विचित्र अघोरी थे । आपने ज्यादातर समय जशपुरनगर के पास स्थित " गम्हरिया आश्रम " में ही बिताया था ।

इस लेखक को धर्मजयगढ़ निवास काल में यदाकदा श्याम बाबा के आतिथ्य का सुयोग मिलता था । चर्चा भी होती थी । आप सदैव लेखक को अघोरेश्वर के और निकट जाने तथा साधना हेतु मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिये अभिप्रेरित किया करते थे । आप कहा करते थे " दौड़िये पण्डा जी दौड़िये, बाद में मौका नहीं मिलेगा । " आपकी बात सच हो गई ।

श्याम बाबा देश के विभिन्न राज्यों में बहुत घूमे हैं । आपको भूतपूर्व राज परिवारों से सम्मान और सहयोग मिलता रहता था ।

एक बार साधना विषयक चर्चा में आपने लेखक को बतलाया थाः

" वे हमारी साधना के प्रारंभिक दिन थे । गुरु का आदेश हुआ कि जाइये भ्रमण कीजिये । यह भी आदेश था कि भ्रमण में पैसा को नहीं छूना है । हम भ्रमण पर निकल पड़े । पास में कुछ था नहीं । कपड़ा लत्ता हमने लिया नहीं । जशपुर बस स्टैण्ड पर राँची जाने वाली बस खड़ी थी । कण्डक्टर पहचानता था । पूछाः "बाबा कहाँ जाइयेगा ? ।" हम कहेः " चलते हैं ! जहाँ मन करेगा उतर जायेंगे ।" हम बस में सवार हो गये । बस चली । रास्ते में मन विरक्त होने लगा । एक बस स्टाप पर हम उतर गये ।

जहाँ हम उतरे थे वह छोटा सा गाँव था । हमें कोई पहचानता नहीं था । हम किधर जावें सोचते सड़क पर खड़े थे । हमने देखा कि एक ओर हरियाली दिख रही है । हम उधर ही पैदल चलने लगे । साँझ को किसी श्मशान में रात बिताने के लिये ठहर जाते । भोर में फिर चल पड़ते । कोई खाना दे देता तो खा लेते नहीं तो दो, दो तीन दिन तक जल पीकर गुजारा करना पड़ जाता था । उस समय हम तिथि, वार, दिशा , समय से मुक्त हो गये थे । पता नहीं कितने दिनों के बाद बाबा का आदेश मिला और हम गम्हरिया आश्रम लौट आये ।"


श्याम बाबा की अँतिम यात्रा भी विचित्र ढ़ँग से हुई थी ।

"उन दिनों अघोरेश्वर गम्हरिया आश्रम में ही थे । एक दिन प्रातःकाल में श्याम बाबा अघोरेश्वर के निकट उपस्थित हुए । उन्होने दोनो हाथ जोड़कर अघोरेश्वर के चरणों में प्रणिपात करने के बाद निवेदन किया कि वे भ्रमण में जाना चाहते हैं । अघोरेश्वर कुछ काल तक श्याम बाबा को अपलक देखते रहे, फिर पास खड़े एक सेवादार से कहा कि वे जाकर उनका बड़ा वाला टार्च ले आवें । टार्च आ जाने के बाद अघोरेश्वर ने श्याम बाबा को पास बुलाया और टार्च देते हुए कहा कि लीजिये रास्ता देखने में काम आयेगा ।

श्याम बाबा गुरू की आज्ञा पाकर भ्रमण में निकल पड़े । कुछ दिनों के पश्चात आप बगीचा नामक कस्बे में अपने भक्त के यहाँ पहुँचे । भक्त बड़ा आनन्दित हुआ । दुसरे दिन प्रातः पद्मासन में बैठकर आपने यौगिक क्रिया द्वारा शरीर से प्राण को मुक्त कर दिया ।"

श्याम बाबा की समाधि का समाचार सुनकर अघोरेश्वर भी उदास हो गये थे ।

क्रमशः


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