गुरुवार, नवंबर 18, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः आशीर्वचन

भगवती, सोगड़ा आश्रम ( माँ सर्वेश्वरी )


शक्ति

"जब से सृष्टि की रचना हुई, उसी समय से शक्ति की प्रधानता चली आ रही है और तब से ही सारा समाज शक्ति की ही आराधना करता रहा है । शक्ति का अर्थ है कार्य करने की क्षमता । जीवन में यदि शक्ति शब्द की व्याख्या  की जाय तो यह स्वतः सिद्ध है कि शक्तिहीन मानव ही मृत्यु की सँज्ञा पाता है । वह किसी भी कार्य को करने में समर्थ नहीं हो सकता । अस्तु प्रत्येक प्राणी के लिये शक्ति संचय का अभ्यास डालना आवश्यक है । आज के समाज में इसका नितान्त अभाव है जिसके कारण लोग आत्मबल और विवेक शून्य सा हो गये हैं । शक्ति मनुष्य के जीवन की आधारभूत जननी है और इसी के द्वारा संसार में उसकी उत्पत्ति भी होती है । शक्ति की ही कृपा पर संसार में जीवनयापन एवँ उसके लिये आवश्यक साधन स्रोतों का संकलन भी होता है । तात्पर्य यह है कि आदि स्वरुप शिव भी शक्ति में ही निहित हैं । शक्ति के अभाव में,  शिव भी शून्य सदृश हैं और अन्तिम रुप उसे शव का दिया जाता है ।

गायत्री जाप, पृथ्वी लीपकर पूजा करना आदि शक्ति उपासना ही है । धनी व्यक्तियों के मंदिरों एवँ विग्रहों में वह आभा एवँ प्रेरणा या गु्दगुदी नहीं मिलती । शक्ति उपासना आदि उपासना है । पहले केवल शक्ति की ही उपासना होती थी । आपसी मतभेदों ने अनेक देवताओं को जन्म दिया । कुजात काढ़ने पर देवता बंट जाते हैं । बैकुण्ट और कैलाश की कल्पना बाद में हुई । पहले मणिद्वीप की ही कल्पना थी । बाद में मुसलमानों के मुकाबला में वैष्णव आँदोलन चला । " ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः " का नारा लगा । अवतार वाद भी बाद में आया । श्री रामानंद जी इलाहाबाद के ब्राह्मण थे । उन्होंने वैष्णवी दीक्षा लेकर भी  हिन्दूत्व को बचाया । उन्होने अपने मत में समन्वय किया । उन्होंने यह व्यवस्था दी कि कंठी धारण करने वाला व्यक्ति चमार भी हो तो पंक्ति में बैठकर एक साथ खा सकता है । रविदास, नाभा, कूवा आदि जैसे महात्मा उनके पन्थ में हुए । चूँकि मुसलमान मँदिर तोड़ते थे, उन्होने उपासना पद्धति की सुरक्षा के लिये शालिग्राम की उपासना प्रारँभ कराई । उनके भक्त उद्यमी हैं । धार्मिक सेनाओं का लाभ राजाओं ने उठाया । वैष्णव, नागा सेनाओं ने मुसलमानों को लूटा । उसी से मठों का निर्माण हुआ । निद्रा देवी बिष्णु को सुलाती हैं । ब्रह्मा की स्तुति पर वे जगे, मधु कैटभ को मारे । इनसे उस परमेश्वर को आप जानेंगे । निजी प्राण को जगाओ । सद् बुद्धि एवँ गुणों से भी  अनुभूति होगी ।


चराचर में सभी प्राणी शक्ति के प्रतीक हैं और सभी शक्ति के बिना शवतुल्य हैं । किसी भी देवी देवता के पूजन में आस्थापूर्वक विश्वास करने का ही फल प्राप्त होता है । विश्वास के वगैर कोई भी सजीव धारणा उत्पन्न ही नहीं हो सकती । शक्ति का आदिरुप सर्वेश्वरी है, जिनकी कृपा से सभी कुछ सुलभ है । अतः आज के मानव के लिये यह आवश्यक है कि अपने में आत्मबल उत्पन्न करे और भौतिक चमत्कारों के बाह्याडम्बर से अपने को परे रखकर सादा जीवन और उच्च विचार का अभ्यास डाले । इसका परिणाम यह होगा कि आज का अधोगति प्राप्त मानव पुनः नई ज्योति प्राप्त करेगा जिससे उसके अज्ञान और अन्धकार का विनाश होकर एक नये युग का निर्माण होगा ।

मातृत्व की उपासना भारत माता की उपासना तो है ही, वन्देमातरम् माँ की उपासना का महामन्त्र है । इसी मन्त्र से प्ररित होकर हमारे लोगों ने मातृत्व उपासना का जाप करके उसे हृदय, वाणी और कर्मों में जागृत किया तथा पवित्रता और शक्ति उपलब्ध की । उन्होने स्वराज्य के लिये संघर्ष किया । फलस्वरुप विदेशी भागे । अपना राज स्थापित हुआ । तमाम निर्माण कार्य हुए । लोगों को धर्म, विचार और क्रिया की स्वतंत्रता मिली । इतिहास बना । उसमें बन्देमातरम् का एक अध्याय जुड़ा । हमारा इतिहास मातृत्व उपासना की ऐसी कितनी ही प्रेरणाओं से भरा है । लोगों को उससे प्रेरणा मिलती है । 

मानव प्रकृति पर कुछ विजय पाने के कारण अहं भाव में अपने को समर्थ और शक्तिमान समझने लगा है । समर्थ होने के वास्तविक कारण पर कभी भी विचार करने का उसके पास समय ही नहीं रह गया है । वह अपने कार्यकलाप और गतिविधियों में शक्ति की उपेक्षा कर रहा है । यही कारण है कि दीर्घायु होने की बात स्वप्नवत दीखने लगी है । लोग अल्पायु होते जा रहे हैं । पूर्व की अपेक्षा शरीर का गठन जर्जर होता जा रहा है । मनुष्य असुर प्रवृत्ति का पोषक हो गया है । दानवता की लहर सजीव है । घृणा, द्वेष, अनाचार और अत्याचार आज सदगुण माने जाने लगे हैं । इन सभी बुराइयों का एकमात्र कारण शक्ति का ह्रास होना है । यदि समाज ने शक्ति का संतुलन न खोया होता तो आज की विकट समस्याएँ कभी भी उत्पन्न न होतीं । इनके निराकरण के निमित्त प्रत्येक मानव का कर्तव्य है कि वह शक्तिपूजन के साथ साथ शक्तिसंचय का भी अभ्यास डाले । तभी कल्याण होगा ।"

क्रमशः 

3 टिप्‍पणियां:

  1. शक्तिपूजन के साथ साथ शक्तिसंचय का भी अभ्यास डालना आवश्यक है. आपकी बात १०० % सही है.

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  2. राजेंद्र शर्मा18 अक्तूबर 2013 को 7:12 am

    अवधूत सेवा की गुणवत्ता को मैं नमन करता हूँ
    आज ही आनलाईन बापू रूप भगवान राम के तीर्थंकर का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ अवधूत सेवक का आपको भी नमन
    बापू की बचपन १९७१ में हुई पहली मुलाकात को लेकर विश्लेषण का प्रयास करता हूँ और पाता हूं कि माई पुनरुत्थान के लिए भारत में कालरात्रि माई का आधार है

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