रविवार, जनवरी 16, 2011

अघोरेश्वर के आशीर्वचन

कर्म

सुधर्मा ! मैं देखता हूँ निष्क्रिय जीवन जीने वाले कुकृत काया हो जाते हैं । बूढ़ा रोता है । मान लो कि उसकी सभी इन्द्रियाँ थिर हो गई हैं, मस्तिष्क  उसका भड़क उठा है । बच्चा रोता है । तुम मान लो कि उसकी अज्ञानता है, उसको कुछ भी शुभ अशुभ का ज्ञान नहीं है । जब नौजवान को रोते देखता हूँ तो आश्चर्य होता है । तरुण, क्लेश कहकर, असफलता कहकर सर धुनता है । जीवन से निराश होने का क्या कारण है ?  एक तरुण में निष्क्रियता, कलुषित काया जब मैं देखता हूँ सुधर्मा, आश्चर्य होता है । क्योंकि वही क्षण और समय उसके जीवन की सार्थकता की तरफ प्रेरक होना चाहिये और उसमें मुदिता होनी चाहिये । ऐसा मैं नहीं देखता हूँ, सुधर्मा ।  इसका कारण निष्क्रियता, कुकृत काया है ।

जो तरुण क्रियाशील है, शुद्ध काया वाला है, उसके जीवन में उमंग, आल्हाद और हर तरह के कार्यों की क्षमता, कुशलता, गौरव के साथ, सम्मान के साथ, उत्साह के साथ देखता हूँ सुधर्मा । निष्क्रियता के पात्र को क्लेश के सिवाय कुछ भी हाथ नहीं आता । क्रियाशील को मिलता है उत्साह, उमंग और वह वेग जो हर कार्य को सुगम और सहज बना देता है । ऐसा ही मैं देखता हूँ, सुधर्मा । यह आश्चर्य है ! आश्चर्य है ।

सुधर्मा ! प्रयत्न के बगैर पुरुषार्थ रुपी दिब्य गुण नहीं प्राप्त होता । प्रयत्न करने वाला मनुष्य अपने को अँधकार में नहीं रखता है,  प्रकाश की तरफ ले जाता है । चाहे जैसी परिस्थिति भी उपस्थित हो जाय, शरीर भी सुखाना पड़े तो शरीर सुखाता है । अपने को लोलुपता से छुड़ाना पड़े तो लोलुपता से छुड़ाता है । मन को मारता है तो तन को वश में करता है । सुधर्मा ! वही पुरुष , पुरुषार्थी कहा जाता है । पुरुषार्थ ही मनुष्य का जीवन है, मोक्ष का मार्ग है, अर्थ का मार्ग है,  धर्म का मार्ग है ।

क्रमशः

1 टिप्पणी:

  1. यह बात तो शाश्वत सत्य है.........

    लेकिन सत्य की राह में बारबार दिल टूट क्यों जाता है..

    मन थक जाता है.. और तड़प कर रह जाता है..

    आखिर क्यों.. व्यवधानों के आगे घुटने टेक देता है मन..

    कमी कहाँ है.. कुछ बताईये..

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