सोमवार, मई 25, 2015

अघोर वचन -30

" देवता का आगमन.......पहले अपने में उसका आविर्भाव होता है । अपना मन खुद ही महसूस कर लेता है । हाँ ! यह ऐसा ही होगा, हो जायेगा । पहले ही महसूस कर लेता है । जब अपना मन महसूस नहीं करता है तब आप सोचिये कि कहीं मुझमें त्रुटि है । और उस त्रुटि के कारण मुझे बहुत दूर दिख रहा है, अन्धकार दिख रहा है । वह त्रुटि मैं कैसे सुधारूँ ? यह अपने उन महाजनों से पूछिये ।"
                                                     ०००

धरती के सभी मनुष्य उस अज्ञात को अपनी भाषा में कोई नाम देकर, कल्पना के रँगों से रँगा हुआ कोई आकार देकर, निराकार मानकर भी अनेक गुण आरोपित कर, आदि नाना प्रकार से जानते है, मानते हैं, पूजते हैं, प्रार्थना करते हैं । इस प्रकार की क्रियाओं में शरीर तो नियुक्त रहता ही रहता है, धन भी लगता है और समय भी लगता है । जहाँ कहीं भी किसी मनुष्य पर उस अज्ञात की कृपा बरसती है तो उसे मालुम चल जाता है । उसके मन में कुछ अलग प्रकार का अनुभव होने लगता है । सबकुछ सुहावना सा हो जाता है । गुनगुनाने का मन करता है । नाचने का मन करता है । एकाँत में रहने का मन होता है । उस समय वह बिल्कुल नहीं सोचता कि लोग क्या कहेंगे । मैं कैसा दिख रहा हूँ । उसे समय, काल आगा, पीछा, सुन्दर असुन्दर कुछ भी तो नहीं सूझता । यह सब दिव्यत्व का आविर्भाव होने से होता है ।

अधिकाँश मनुष्य में दिव्यत्व का आविर्भाव नहीं होता या वह जान नहीं पाता । अघोरेश्वर कहते हैं हर मनुष्य में इसकी पूरी संभावना मौजूद है कि उस अज्ञात का, दिव्यत्व का आविर्भाव हो, तभी तो वे कहते हैं कि यदि कोई ऐसा महसूस नहीं करता तो वह समझे कि उसमें, उसकी पूजा में, प्रार्थना में कहीं कोई त्रुटि है ।

अपनी त्रुटि मनुष्य को खुद पहचाननी होती है । उसे भगवत तत्व दूर दिखता है । चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार दिखता है । मुँह से प्रार्थना के रटेरटाये बोल फूटते रहते है और दृष्टि कहीं होती है तो मन कहीं और होता है । फूल चढ़ाना, दीप दिखाना, घन्टी बजाना या शँख फूकना रोज के नियम की तरह निपटाये जाते हैं व्यक्ति उस समय कहीं और होता है । जाप करते समय ध्यान सुमेरू की तरफ लगा रहता है कि कब आये । दिखावा एक ऐसा तत्व है जो हमारी पूजा, प्रार्थना में अनिवार्य रूप से उपस्थित होता है । ये सब अपनी त्रुटियाँ हैं जो हमें नहीं दिखती ।

यदि मनुष्य अपनी त्रुटियाँ पहचान लेता है तो सुधार के लिये उसे संत, महात्माओं के निकट बैठकर सीखना चाहिये ।
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