गुरुवार, नवंबर 18, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः आशीर्वचन

भगवती, सोगड़ा आश्रम ( माँ सर्वेश्वरी )


शक्ति

"जब से सृष्टि की रचना हुई, उसी समय से शक्ति की प्रधानता चली आ रही है और तब से ही सारा समाज शक्ति की ही आराधना करता रहा है । शक्ति का अर्थ है कार्य करने की क्षमता । जीवन में यदि शक्ति शब्द की व्याख्या  की जाय तो यह स्वतः सिद्ध है कि शक्तिहीन मानव ही मृत्यु की सँज्ञा पाता है । वह किसी भी कार्य को करने में समर्थ नहीं हो सकता । अस्तु प्रत्येक प्राणी के लिये शक्ति संचय का अभ्यास डालना आवश्यक है । आज के समाज में इसका नितान्त अभाव है जिसके कारण लोग आत्मबल और विवेक शून्य सा हो गये हैं । शक्ति मनुष्य के जीवन की आधारभूत जननी है और इसी के द्वारा संसार में उसकी उत्पत्ति भी होती है । शक्ति की ही कृपा पर संसार में जीवनयापन एवँ उसके लिये आवश्यक साधन स्रोतों का संकलन भी होता है । तात्पर्य यह है कि आदि स्वरुप शिव भी शक्ति में ही निहित हैं । शक्ति के अभाव में,  शिव भी शून्य सदृश हैं और अन्तिम रुप उसे शव का दिया जाता है ।

गायत्री जाप, पृथ्वी लीपकर पूजा करना आदि शक्ति उपासना ही है । धनी व्यक्तियों के मंदिरों एवँ विग्रहों में वह आभा एवँ प्रेरणा या गु्दगुदी नहीं मिलती । शक्ति उपासना आदि उपासना है । पहले केवल शक्ति की ही उपासना होती थी । आपसी मतभेदों ने अनेक देवताओं को जन्म दिया । कुजात काढ़ने पर देवता बंट जाते हैं । बैकुण्ट और कैलाश की कल्पना बाद में हुई । पहले मणिद्वीप की ही कल्पना थी । बाद में मुसलमानों के मुकाबला में वैष्णव आँदोलन चला । " ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः " का नारा लगा । अवतार वाद भी बाद में आया । श्री रामानंद जी इलाहाबाद के ब्राह्मण थे । उन्होंने वैष्णवी दीक्षा लेकर भी  हिन्दूत्व को बचाया । उन्होने अपने मत में समन्वय किया । उन्होंने यह व्यवस्था दी कि कंठी धारण करने वाला व्यक्ति चमार भी हो तो पंक्ति में बैठकर एक साथ खा सकता है । रविदास, नाभा, कूवा आदि जैसे महात्मा उनके पन्थ में हुए । चूँकि मुसलमान मँदिर तोड़ते थे, उन्होने उपासना पद्धति की सुरक्षा के लिये शालिग्राम की उपासना प्रारँभ कराई । उनके भक्त उद्यमी हैं । धार्मिक सेनाओं का लाभ राजाओं ने उठाया । वैष्णव, नागा सेनाओं ने मुसलमानों को लूटा । उसी से मठों का निर्माण हुआ । निद्रा देवी बिष्णु को सुलाती हैं । ब्रह्मा की स्तुति पर वे जगे, मधु कैटभ को मारे । इनसे उस परमेश्वर को आप जानेंगे । निजी प्राण को जगाओ । सद् बुद्धि एवँ गुणों से भी  अनुभूति होगी ।


चराचर में सभी प्राणी शक्ति के प्रतीक हैं और सभी शक्ति के बिना शवतुल्य हैं । किसी भी देवी देवता के पूजन में आस्थापूर्वक विश्वास करने का ही फल प्राप्त होता है । विश्वास के वगैर कोई भी सजीव धारणा उत्पन्न ही नहीं हो सकती । शक्ति का आदिरुप सर्वेश्वरी है, जिनकी कृपा से सभी कुछ सुलभ है । अतः आज के मानव के लिये यह आवश्यक है कि अपने में आत्मबल उत्पन्न करे और भौतिक चमत्कारों के बाह्याडम्बर से अपने को परे रखकर सादा जीवन और उच्च विचार का अभ्यास डाले । इसका परिणाम यह होगा कि आज का अधोगति प्राप्त मानव पुनः नई ज्योति प्राप्त करेगा जिससे उसके अज्ञान और अन्धकार का विनाश होकर एक नये युग का निर्माण होगा ।

मातृत्व की उपासना भारत माता की उपासना तो है ही, वन्देमातरम् माँ की उपासना का महामन्त्र है । इसी मन्त्र से प्ररित होकर हमारे लोगों ने मातृत्व उपासना का जाप करके उसे हृदय, वाणी और कर्मों में जागृत किया तथा पवित्रता और शक्ति उपलब्ध की । उन्होने स्वराज्य के लिये संघर्ष किया । फलस्वरुप विदेशी भागे । अपना राज स्थापित हुआ । तमाम निर्माण कार्य हुए । लोगों को धर्म, विचार और क्रिया की स्वतंत्रता मिली । इतिहास बना । उसमें बन्देमातरम् का एक अध्याय जुड़ा । हमारा इतिहास मातृत्व उपासना की ऐसी कितनी ही प्रेरणाओं से भरा है । लोगों को उससे प्रेरणा मिलती है । 

मानव प्रकृति पर कुछ विजय पाने के कारण अहं भाव में अपने को समर्थ और शक्तिमान समझने लगा है । समर्थ होने के वास्तविक कारण पर कभी भी विचार करने का उसके पास समय ही नहीं रह गया है । वह अपने कार्यकलाप और गतिविधियों में शक्ति की उपेक्षा कर रहा है । यही कारण है कि दीर्घायु होने की बात स्वप्नवत दीखने लगी है । लोग अल्पायु होते जा रहे हैं । पूर्व की अपेक्षा शरीर का गठन जर्जर होता जा रहा है । मनुष्य असुर प्रवृत्ति का पोषक हो गया है । दानवता की लहर सजीव है । घृणा, द्वेष, अनाचार और अत्याचार आज सदगुण माने जाने लगे हैं । इन सभी बुराइयों का एकमात्र कारण शक्ति का ह्रास होना है । यदि समाज ने शक्ति का संतुलन न खोया होता तो आज की विकट समस्याएँ कभी भी उत्पन्न न होतीं । इनके निराकरण के निमित्त प्रत्येक मानव का कर्तव्य है कि वह शक्तिपूजन के साथ साथ शक्तिसंचय का भी अभ्यास डाले । तभी कल्याण होगा ।"

क्रमशः 

बुधवार, नवंबर 03, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जीः आशीर्वचन


भगवत् कृपा प्राणीमात्र के कल्याण के निमित्त सन्त, महात्मा, अवधूत, अघोरेश्वर, ॠषि, महर्षि, की वाणी के रुप में प्रकाशित होती रही है । आज भी हो रही है । भविष्य में भी होती रहेगी ।
यहाँ पर स्वनाम स्वरुप, योगीराज, करुणामय, परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी के श्रीमुख से प्रवाहित कतिपय वाणी का सँकलन प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा  है । इन वाणियों का अध्ययन, तद् नुसार आचरण, मानव मात्र के लिये कल्याणकारी हो, यही अघोरेश्वर से विनम्र निवेदन है ।

शाँति

" मन रुपी शिला पर पद्मासन लगाइये और चित्त को एकाग्र कर आत्माराम को प्राप्त कीजिये । जिस प्रकार कापालिक वेशधारी भगवान शाँत रहते हैं, उसी प्रकार सब लोग इन्द्रियों की लोलुपता को त्यागकर शाँत हों । जिस प्रकार आकाश के उड़ते हुए पक्षी वृक्ष देख लेने पर उस पर जा बैठते हैं और विश्राम पाते हैं , उसी प्रकार सब लोग पावें । जिस प्रकार जीव मन, वाणी और शरीर से अलग होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और जगत अशान्ति से शान्ति को प्राप्त हो जाता है, उसी प्रकार सब लोग शान्ति को प्राप्त होवें । यह प्रपञ्च रुप दृष्य मृगतृष्णा की तरह भासता है । उसको त्यागकर अभिलषित चित्त में जाकर सब लोग शाँत हों । अमावस्या तिथि को जैसे समुद्र शाँत रहता है उसी की तरह हम लोग शाँत हों । जिस तरह हिमालय शाँत है, जैसे साधु लोग अपनी इन्द्रियों का दमन कर शाँत होते हैं, जैसे अवधूत लोग मान और अपमान से अलग होकर शाँत होते हैं, जैसे ब्रह्मनिष्ठ लोग प्राणीमात्र में अपनी आत्मा को देखकर शाँत होते हैं, उसी प्रकार हम लोग शाँत हों । जैसे निर्विकल्प आत्मा का साक्षात्कार हो जाने पर मन भुने बीज के समान परिकल्पित होता है, उसी प्रकार हम लोग भी परिकल्पित हों । " 

एक अन्य अवसर पर अघोरेश्वर जी ने कहाः

" इन्द्रियों का समुदाय है । उनकी अपनी खुराक है । इनको बाँधकर नहीं रख सकते । इनका स्वभाव है विषयों की ओर दौड़ना । केवल सँयम रखें । इच्छाओं को अवरुद्ध कर हम आस्तिकता की गठरी नहीं प्राप्त कर सकते । हमें विषयों के प्रति आकर्षण की प्रवृत्ति को मारना चाहिये ।  सहस्त्रों वृक्षों को काटकर व्यक्ति छाया नहीं पा सकता, शाँति नहीं पा सकता । आप अपने को तपायेंगे तो शाँति मिलेगी । हालांकि आपको यह पता नहीं चलेगा । ठीक उसीतरह से जिस तरह से सेन्ट के दुकानदार को सेन्ट की गन्ध नहीं मालूम होती, किन्तु उसी गन्ध को अनुभव कर दूसरे लोग उससे सेन्ट खरीदकर ले जाते हैं ।उसी तरह आपकी तपस्या, आनन्द, गौरव को दूसरे ही देख सकेंगे ।"

क्रमशः


रविवार, अक्टूबर 03, 2010

अवधूत गुरुपद सँभव राम जी

















सन् १९८२ ई० में अर्ध कुम्भ पड़ा था । प्रयाग में त्रिवेणी स्थल पर अघोरेश्वर का केम्प लगा हुआ था । केम्प में अघोरेश्वर विराजमान थे । पूरे क्षेत्र में साधूओं का मेला सा लगा हुआ था । सभी सम्प्रदाय, अखाड़ा, मठ, आश्रम, आदि से साधुजन तथा धर्मप्रेमी, तीर्थवास के अभिलाषी श्रद्धालुजन पुण्यसलिला गँगा के तट पर बालुका पर छोलदारियों में निवास कर रहे थे । ध्यान, धारणा, प्रवचन, आशीर्वचन की अविरल धारा निरन्तर प्रवहमान हो रही थी । इस धारा में जिसकी जैसी मति, गति थी अवगाहन कर अपनी तृप्ति हेतु प्रयास रत था ।
एक दिन केम्प में प्रातःकालीन नित्यकर्म की चहल पहल शान्त हो चुकी थी । जगह जगह रात में जलाये गये अलाव शाँत हो चुके थे । कुछ साधुओं | मठाधीशों के स्थान पर प्रवचन सुनने के लिये श्रद्धालुओं का जुटना शुरु हो चुका था । लगभग सभी जगह भोग राँधने की तैयारी होने लगी थी । रविनारायण थोड़ा ऊपर चढ़ चुके थे । ऐसे समय एक किशोर अपना सँक्षिप्त सा सामान उठाये श्री सर्वेश्वरी समूह वाली छोलदारी में प्रवेश करते हैं । किशोर का उच्च ललाट, चौड़ा सीना, लम्बी और बलिष्ट भुजाएँ और ओज पूर्ण चेहरा देखकर सहज ही ठह अनुमान लगाया जा सकता है यह किसी सम्पन्न और सुसँस्कृत परिवार के लाल हैं ।
अघोरेश्वर के निकट पहुँचकर किशोर उनके चरण कमल में अपना माथा रखकर प्रणाम निवेदित करते हैं और अघोरेश्वर का इशारा पाकर चरणों के निकट ही बैठ जाते हैं ।
ये किशोर हैं महाराज कुमार यशोवर्धन सिंह जी, नरसिँहगढ़, मध्यप्रदेश ।



 यह आना कुमार का अँतिम आना था क्योंकि उसके बाद जाना नहीं हुआ । वे अघोरेश्वर के साथ अर्धकुम्भ की समाप्ति तक प्रयाग में मेला स्थल पर ही रहे । उसके बाद उनके साथ बनारस चले आये ।

अघोरेश्वर ने महाराज कुमार यशोवर्धन सिंह जी को मुड़िया दीक्षा सँस्कार के बाद नाम दिया गुरुपद सँभव राम ।
जन्मः
आपका जन्म दिनाँक १५ मार्च १९६१ को मध्यप्रदेश के इँदौर शहर में हुआ था । आपका बाल्यकाल नरसिंह गढ़ के भानूनिवास पैलेश में बीता । आपके जन्म तक राजपरिवार नरसिंहगढ़ के किले में रहता था । सन् १९६२ ई० में भानूनिवास पैलेश बनकर तैयार हुआ और राजवँश इस नये पैलेश में रहने आ गया । भारतवर्ष के राजवँशों में शायद यह अकेला राजवँश है जो आजादी के बाद तक अपने किले में रहता था ।
कुल परम्परा
आपकी कुल परम्परा परमार कुल का क्षत्रीय राजवँश है । यह परमार राजवँश वही है जिसमें उज्जयिनी के महाप्रतापी, धर्मपरायण, न्यायकुशल एवँ अक्षुण्ण कीर्ति के स्वामी सम्राट विक्रमादित्य हो चुके हैं । विक्रम सँवत् सम्राट विक्रमादित्य ने ही चलाया था । आपकी बेताल कथाएँ जगत प्रसिद्ध हैं तथा सभी आयु वर्ग के पुरुष और नारियों को आज भी आकर्षित करती हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य के पश्चात इसी परमार वँश में एक सम्राट हुए महामहिम भर्तृहरि । आपका हृदय परिवर्तन हो गया और आप राजपाट त्यागकर सन्यस्त हो गये । आप जिस गुफा में रहकर साधना करते थे वह आज भी विद्यमान है तथा देश विदेश के पर्यटक यहाँ आते रहते हैं । सम्राट भर्तृहरि जी की प्रसिद्धि साधु भरथरी के रुप में अक्षुण्ण बनी हुई है । आपके द्वारा रचित नीति शतक, श्रृँगार शतक, वैराग्य शतक साहित्यिक निधि मानी जाती हैं । आपकी स्तुतियाँ, प्रार्थनायेँ, गीत आदि आज भी देश के कोने कोने में गाये जाते हैं । इस गायन का नाम ही भरथरी पड़ गया है ।
इसी परमार राजवँश में तीसरे महा प्रतापी, न्याय प्रिय, प्रजा वत्सल, सम्राट भोज हुए ।
परमार राजवँश मगध, अवँतिका, उत्तराखण्ड, राजस्थान, सिन्ध, तथा नेपाल में शासन करते थे । प्रसिद्धी है कि " परमार यानि पृथ्वी, पृथ्वी यानी परमार । " ये पृथ्वी पति कहलाते थे तथा समय समय पर सप्त खण्ड पृथ्वी पर राज करते रहे हैं । 


पिता













महाराज कुमार यशोवर्धन सिंह (अवधूत गुरुपद सँभव राम जी ) के पिता परमार कुलभूषण नरसिंहगढ़ के महाराजा श्रीमन्त भानूप्रकाश सिंह जी हैं । महाराजा साहब की शिक्षा दीक्षा डॉली कालेज, इन्दौर तथा मेयो कालेज, अजमेर में हुई थी । आप अपनी जवानी के दिनों में शिकार करने के शौकीन रहे हैं, तथा बड़े अच्छे शिकारी भी हैं  । आपका विवाह सन् १९५० ई० को बिकानेर के प्रसिद्ध शासक हि. हा. सर गँगा सिंह जी की पौत्री और महाराज कुमार बिजल सिंह जी की पुत्री  लक्ष्मी कुमारी के साथ हुआ था । आपका राज्याभिषेक १७ जुलाई १९५७ ई० को नरसिंहगढ़ के किले में स्थित पैलेश में सम्पन्न हुआ था । आपने किले से बाहर शहर में झील के किनारे नया महल "भानू निवास" बनवाया और सन् १९६२ ई० में सपरिवार किला छोड़कर रहने चले गये ।
महाराजा भानूप्रकाश सिंह जी सन् १९६२ ई० में देश की राजनीति में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई । सन् १९६७ ई० में आपके ज्ञान और योग्यता को परखकर आपको केन्द्र में राज्यमँत्री बनाया गया । स्वतँत्र विचारों और त्वरित निर्णय शक्ति के कारण आप ज्यादा समय तक सक्रिय राजनीति में नहीं रह सके । पार्टी तथा देश के प्रति आपके अवदानों को मान्यता देते हुए आपको गोवा का राज्यपाल बनाया गया । आप राज्यपाल के रुप में गोवा में  १८.०३.१९९१ से लेकर ०४.०४.१९९४ तक रहे । यह वही समय था जब कोंकण रेलवे की नीँव पड़ रही थी । कोंकण रेल के निर्माण में आपका योगदान अतुलनीय है । गोवा के तत्कालीन मुख्यमँत्री तथा ईसाइ धर्मगुरु कोकण रेलवे नहीं बनने देना चाहते थे । ये दोनो मुखर विरोधी थे । राज्यपाल के रुप में आपके लिये यह एक बड़ी चुनौती थी । ईसाइ धर्म गुरु को तो आपने राजभवन बुलवाकर कोंकण के प्रकरण से दूर रहने की चेतावनी देकर शाँत कर दिया, परन्तु मुख्यमँत्री समझाइस नहीं मान रहे थे । अँततः आपने राज्यपाल के सँवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए मुख्यमँत्री एवँ उनके मँत्री मँडल को बर्खास्त कर दिया । ऐसा साहसपूर्ण कार्य महाराजा साहब जैसे शासक से ही सँभव था ।

माता
 









महाराज कुमार यशोवर्धन सिंह (अवधूत गुरुपद सँभव राम जी ) की माता का नाम महारानी लक्ष्मी कुमारी साहिबा है । आप बीकानेर के महाराज कुमार बिजल सिँह जी की पुत्री हैं । आप धर्म परायण एवँ विदुषी महिला हैं । आपकी अघोरेश्वर पर अपार श्रद्धा एवँ भक्ति है । महाराज कुमार यशोवर्धन सिंह को बालपन में माता द्वारा दिये गये उच्च सँस्कारों का भी उनके सन्यस्त होने में पर्याप्त योगदान रहा है ।
महाराज कुमार यशोवर्धन सिंह अपने माता पिता के सबसे छोटे सुपुत्र हैं । महाराजा भानूप्रकाश सिंह जी और  महारानी लक्ष्मी कुमारी साहिबा जी के पाँच पुत्र हुए ।
१, महाराज कुमार शिलादित्य सिंह,  १९५१
२, महाराज कुमार राज्यवर्धन सिंह,  १९५३
३, महाराज कुमार गिरिरत्न सिंह,       १९५५
४, महाराज कुमार भाग्यादित्य सिंह,  १९५७
५, महाराज कुमार यशोवर्धन सिंह,    १९५९

 महारानी लक्ष्मी कुमारी साहिबा जी का मायका बीकानेर है और अघोरेश्वर के सखा, भक्त जशपुर के महाराजा बिजयभुषण सिंह देव जी की धर्मपत्नि महारानी जयाकुमारी साहिबा जी का मायका भी बीकानेर है । इसके अलावा महाराज कुमार राज्यवर्धन सिंह जी का विवाह जशपुर के महाराजा बिजयभुषण सिंह देव जी की सुपुत्री राजकुमारी कल्पनेश्वरि देवी जी के सा् हुआ है । यह दोनों राज परिवार इस प्रकार से अति  निकट के सम्बंधी होते हैं । यह निकट सम्बन्ध निश्चय ही महाराज कुमार यशोवर्धन सिंह जी को अघोरेश्वर के निकट पहुँचाने में किसी न किसी रुप में सहयोगी रहा है ।

शिक्षा
महाराज कुमार यशोवर्धन सिंह (अवधूत गुरुपद सँभव राम जी ) की शिक्षा का प्रबन्ध महाराजा साहब ने राजकुमारों के लिये बने डॉली कालेज, इन्दौर में किया तथा स्नातकोत्तर शिक्षा के लिये देश की राजधानी दिल्ली भेजा । सन् १९८२ ई० में आप दिल्ली से ही प्रयाग आये थे ।

मुड़िया दीक्षा या सन्यास दीक्षा
महाराज कुमार यशोवर्धन सिंह जी को सन् १९८२ ई० में अघोरेश्वर भगवान राम जी द्वारा सन्यास दीक्षा प्रदान किया गया । दीक्षा के उपराँत आपको नाम दिया गया गुरुपद सँभव राम । आप सन्यास क्रम में अवधूत सिंह शावक राम जी, अवधूत प्रियदर्शी राम जी के पश्चात तीसरे मुड़िया साधु हुए ।
सन्यस्त होने के पश्चात आपकी कठोर तप और साधना शुरु हुई जो बरसों चलती रही । अघोरेश्वर साधना की गूढ़ प्रक्रियाओं, जीवनादर्शों , तथा सामाजिक आदर्शों के विषय में अपने शिष्यों, भक्तों को शिक्षा देते समय प्रायः आपको और अवधूत प्रियदर्शी राम जी को सम्बोधित करते रहे हैं । इस क्रम में अघोरेश्वर आपको कभी सँभव, कभी सँभव साधक, कभी सौगत उपासक, कभी मुड़िया साधु आदि विभिन्न नामों से सम्बोधित करते रहे हैं । इससे ज्ञात होता है कि आप अघोरेश्वर के प्रिय शिष्य रहे हैं । उनकी अपरिमित कृपा दृष्टि प्राप्त होने के कारण निश्चय ही आप आध्यात्मिक उँचाईयों पर आरुढ़ होने में सक्षम रहे हैं । सन् १९८२ ई० से सन् १९९२ ई० तक अघोरेश्वर के श्री चरणों में सतत निरत रहकर अघोर दर्शन, परम्परा एवँ दृष्टि से आपने ज्ञान के भँडार को परिपूरित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा है ।
आप अवधूत पद पर प्रतिष्ठित हैं ।
आप वर्तमान में श्री सर्वेश्वरी समूह के अध्यक्ष हैं । इसकी चर्चा हम यथासमय करेंगे ।
क्रमशः

 













मंगलवार, सितंबर 21, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम जी के मुड़िया साधु शिष्य

औघड़ सिंह शावक राम जी

सन् १९६६ ई० में अघोरेश्वर भगवान राम जी ने प्रथम सन्यासी शिष्य के रुप में औघड़ सिंह शावक राम जी को सँस्कारित किया था । पूर्व में आपके विषय में प्राप्त समस्त जानकारी दी जा चुकी है । साधना की दस वर्ष की अवधि बीत जाने के पश्चात आपको गुरु ने मुक्त कर दिया । आप यात्रा पर निकल पड़े । आपने सन् १९७७ ई० में दिलदारनगर , गाजीपुर में गिरनार आश्रम की स्थापना कर " अघोर सेवा मण्डल " नामक एक संस्था बनाया । इसके पश्चात आपने अनेक जगहों पर आश्रम, कुटिया का निर्माण कराया । आपके द्वारा स्थापित अघोर सेवा मण्डल प्राकृतिक विपदा के समय सेवा का उत्कृष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता रहा है ।

अवधूत सिंह शावक राम जी ने अपना अँतिम समय मसूरी , हिमाचल प्रदेश में निर्मित " हिमालय की गोद" आश्रम में बिताया । ११ सितम्बर सन् २००२ ई० को आपने शिवलोक गमन किया ।

औघड़ सिंह शावक राम जी



अवधूत प्रियदर्शी राम जी

अघोरेश्वर भगवान राम जी के सानिध्य में अनगिनत लोग आये । उनमें गृहस्थ थे, साधु थे, श्रद्धालु थे, भक्त थे, सेवक थे, योगी थे, तान्त्रिक थे, मान्त्रिक थे, हिन्दु के अलावा मुसलमान थे, क्रिस्चियन थे, सिक्ख थे, बौद्ध थे, पारसी थे, भारतीयों के अलावा अफगान थे, इटेलियन थे, अमरीकी थे, अँग्रेज थे, और न जाने कौन कौन थे । अघोरेश्वर देश, काल, जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि से उपर थे । वे ब्रह्म में सदैव रमण करने वाले चिदानन्द स्वरुप थे ।

सन् १९८० ई० में एक किशोर अघोरेश्वर की शरण में आये । किशोर का दीक्षा सँस्कार हुआ और अघोरेश्वर ने नामकरण किया प्रियदर्शी राम । अघोरेश्वर के साथ लम्बे समय तक अवधूत प्रियदर्शी राम जी रहे हैं । अघोरेश्वर अघोर साधना, समाज, तथा जीवन दर्शन के अनेक विषयों में दर्शी जी को सम्बोधित कर प्रवचन दिया है । इन प्रवचनों को लिपिबद्ध किया गया और सर्वेश्वरी समूह द्वारा अनेक ग्रँथों के रुप में प्रकाशित कर साधकों, श्रद्धालुओं को सुलभ कराया गया है । अवधूत प्रियदर्शी राम जी प्रारँभ से ही गुरु भक्त एवँ नैष्ठिक साधक रहे हैं । अघोरेश्वर के श्री चरणों में बैठकर अवधूत प्रियदर्शी राम जी ने मानस तीर्थों का अवगाहन तो किया ही किया , मानसिक पारमिता भी सिद्ध करने में लगे रहे । उन्होंने अघोरेश्वर के आदेशानुसार देश के स्थावर और जँगम तीर्थों का साक्षात्कार भी किया ।

आजकल आप अपने बनोरा, रेणुकूट, शिवरीनारायण, आदर, डभरा तथा आश्रमों में रमते रहते हैं ।

अघोरेश्वर के प्रिय मुड़िया योगी अवधूत प्रियदर्शी राम जी के जीवन वृत्त के विषय में अधिकाँश जानकारी के अभाव में हम यहाँ पर अभी इतना लिखकर ही सन्तोष कर रहे हैं । जानकारी एकत्र करने की प्रक्रिया जारी है । हम बाद में आपके विषय में अलग से अधिकतम जानकारी देने का प्रयास करेंगे ।

हमारा योगीराज, अवधूत बाबा प्रियदर्शी राम जी के श्री चरणों में कोटिशः प्रणाम ।

अवधूत प्रियदर्शी राम जी


क्रमशः











रविवार, अगस्त 29, 2010

अघोरेश्वर वन्दे जगत् गुरुम्

 परमपूज्य अघोरेश्वर कीनाराम जी महाराज

गुरुदेव अघोरेश्वर भगवान राम जी 


ईश्वरानुग्रँहादेव पुँसानद्वेत वासना ।
महद्भयपरित्राणा विप्राणामुपजायते ।।
( महान भय (मृत्यु भय) से रक्षा करनेवाली अद्वेत की वासना मनुष्यों में, विप्रों में ईश्वर के अनुग्रह से ही उत्पन्न होती है । )

सन १९७३ का मई का महीना था । अघोरेश्वर भगवान राम जी जशपुर के आश्रमों में आये हुए थे । वे  कभी सोगड़ा आश्रम में निवास करते तो कभी गम्हरिया में । कभी नारायणपुर भी चले जाते थे । जशपुर में सभी जानते रहते थे कि अघोरेश्वर आज कहाँ हैं । जिसको जब समय सुविधा होती अघोरेश्वर का सानिध्य प्राप्त करने के लिये पहुँच जाते थे । अघोरेश्वर भी उन दिनों सबको भरपूर समय देते । सबकी सुनते । सबको कहते । वार्तालाप की यह कड़ी घँटों चलती ।  इसी बीच श्रद्धालुओं, भक्तों , शिष्यों की शिक्षा भी चलती रहती । वे जिसको जो सिखाना चाहते बात बात में सिखा देते । उनकी अचिंत्य लीला वही जानते थे ।

लेखक का विवाह जशपुर के राज ज्योतिषी महापात्र परिवार में सात आठ माह पूर्व ही हुआ था । वहीं आदरणीय बाबू पारस नाथ जी सहाय से भेंट हुई थी । साधु पुरुष सहाय बाबू जब भी भेंट होती लेखक को अघोरेश्वर का दर्शन करने तथा  दीक्षा की याचना करने के लिये अभिप्रेरित करते रहते थे । लेखक भी बचपन से ही साधु सँगत में रस पाते थे । लेखक पूर्व में दो तीन बार अघोरेश्वर के दर्शन की मँशा से जशपुर की यात्रा कर चुके थे, पर दर्शन नहीं हो पाया था । जब तक लेखक जशपुर पहुँचते अघोरेश्वर का बनारस प्रस्थान हो चुका होता था ।

इस बार समय पर समाचार मिला था । लेखक तत्काल चल पड़े थे । तीन मई १९७३ को गम्हरिया आश्रम के सामने उस महा विभूति का दर्शन लाभ हुआ । जीवन धन्य हो गया । दर्शन मात्र से हृदय में यह भाव जागा कि जिस पथ प्रदर्शक, शिक्षक, ज्ञानी, ध्यानी, गुरु की खोज आज तक लेखक करते आ रहे थे वे यही हैं । इन्ही की शरण में, छत्रछाया में इस जीवन का कल्याण होना है । भटकन समाप्त हो गया । 

उसके बाद लगभग सालभर का समय बीत गया । अघोरेश्वर का या तो दर्शन लाभ नहीं हुआ या दर्शन हुआ भी तो उचित समय, सुयोग नहीं मिला कि अघोरेश्वर से शरण हेतु विनय किया जा सके ।

सन् १९७४ ई० के नवम्बर माह की १९ तारीख को अघोरेश्वर  का सोगड़ा आश्रम में पुनः दर्शन लाभ हुआ । समय सुयोग सब अनुकूल थे । लेखक अघोरेश्वर के श्री चरणों में विनयावनत होकर अपनी शरण में लेने हेतु निवेदन किया । लेखक का निवेदन तत्काल स्वीकार हो गया । आदेश हुआ कि दूसरे दिन यानि दि. २०. ११. १९७४ को सुबह छै बजे उनके चरणकमल की छाँह लेखक के सिर पर होगी । उस दिन जशपुर लौट जाने का निर्देश हुआ ।

उस दिन का बचा हुआ भाग और रात्री कैसे कटी अभिव्यक्त कर पाना दूष्कर कार्य है । शरीर इतना हल्का हो गया था कि पाँव मानो जमीन पर नहीं पड़ रहे थे । मन स्वतः अन्तर्मुखी होता जा रहा था । न किसी से बात करने का मन होता था और न किसी को देखने का । रात्री अर्ध सुसुप्ति की अवस्था में कब कट गई पता ही नहीं चला । भोर में चार बजे बिस्तर त्याग दिया । नित्यकर्म से निवृत होकर दीक्षा संस्कार हेतु निर्दिष्ट सामग्री के साथ सुबह पाँच बजे सोगड़ा आश्रम जाने के लिये तैयार हो गया ।

जशपुर नगर से सोगड़ा आश्रम की दूरी तेरह किलोमीटर है । उन दिनों कोई पव्लिक ट्राँसपोर्ट की सुविधा उपलब्ध नहीं थी । लोग पैदल जाते थे या सायकल से जाते थे । बीच में एक नदी पड़ती है, जिसपर उन दिनों पुल नहीं बना था । जशपुर से सोगड़ा इन बाधाओं को पार कर पहुँचने में ४५ मिनट से एक घँटा का समय लग जाता था ।  लेखक भोर में पाँच बजे जशपुरनगर से सोगड़ा के लिये चलकर छै बजे के कुछ मिनट पहले अघोरेश्वर के चरणों में पहुँच गये ।

सोगड़ा आश्रम के बाहरी गेट से थोड़ा ही आगे एक विशाल महुवे का वृक्ष खड़ा था । वृक्ष के नीचे अलाव जल रहा था । अघोरेश्वर अपनी चिर परिचित मनमोहिनी मुद्रा में वृक्ष और अलाव के बीच रखी कुर्सी पर विराजमान थे । अघोरेश्वर के श्रीचरणों में प्रणाम निवेदन करते ही उनके श्रीमुख पर स्मित की रेखा उभर आई । बोलेः "आ गये हो बबुआ । बइठ ।"

" जी बाबा । "

कुछ समय उपराँत उन्होने कहाः " अच्छा चल मँदिर में चल ।"


लेखक मँदिर की ओर चले । अघोरेश्वर भी उठे पर कहाँ गये नहीं पता ।

लेखक के मँदिर पहुँचने के तीन चार मिनट के भीतर अघोरेश्वर भी मँदिर पहुँच गये ।

दीक्षा सँस्कार के पश्चात लेखक को लौट जाने का आदेश हो गया । लेखक सोगड़ा से जशपुर लौटे तथा उसी दिन सँध्या समय निर्देशानुसार उन्होने जशपुर भी छोड़ दिया ।

येनेदं पुरितं सर्वमात्मनैवात्मनात्मनि ।
निराकारं कथं वन्दे ह्याभिन्नं शिवमव्ययम् ।।


( यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत जिस आत्मा द्वारा, आत्मा से, आत्मा में ही पूर्ण हो रहा है, उस निराकार ब्रह्म का, मैं किस प्रकार वन्दन करुँ क्योंकि वह जीव से अभिन्न है, कल्याण स्वरुप है, अव्यय है । )


क्रमशः



मंगलवार, अगस्त 24, 2010

अघोरेश्वर भगवान राम कुष्ट सेवा आश्रम , वाराणसीः कुछ चित्र





गुरुदेव निवास, पड़ाव वाराणसी 
एको व्यापक अव्यय सर्वज्ञ परम रम्य, हर कारण सृष्टि स्थिति, नित्य व्यापक आद्या ।
अघोर घोर महाकपालेश्वर, भुक्ति मुक्ति दातार, तिनके पद बन्दन करौं, कोटी कोटी प्रणाम ।

श्री सर्वेश्वरी मँदिर, पड़ाव वाराणसी
 

गणेश पीठ , पड़ाव , वाराणसी
अघोर चक्र
अघोरेश्वर भगवान राम कुष्ट चिकित्सालय
अघोरेश्वर भगवान राम महा विभूति स्थल, गँगातट, पड़ाव वाराणसी
अघोरेश्वर भगवान राम महा विभूति स्थल, गँगातट, पड़ाव वाराणसी

रविवार, जुलाई 25, 2010

गुरु पूर्णिमा २०१० दि. २५.०७.२०१०

गुरुमूर्ति अघोरेश्वर भगवान राम जी

                                                                                                                                     

।  वन्दे गुरुपद द्वंद्वँ, वाङ् मनश्चित्तगोचरम् ।
।।  श्वेत रक्तप्रभाभिन्नं,  शिवशक्त्यात्मकं परम् ।।

मैं शक्ति से युक्त शिव, वाणी, मन, चित्त आदि इन्द्रियों में व्याप्त, श्वेत रक्त प्रभा से अभिन्न श्रेष्ठ गुरुपदकमलयुगल की वन्दना करता हूँ ।

अघोरेश्वर भगवान राम जी के चरण कमल की वन्दना कर उनके मुखारबिन्द से निनादित वाणी में से गुरुतत्व का सूत्र सँकलित है । अघोरेश्वर कहते हैंः


" गुरु कोई खास हाड़, चाम के नहीं होते या कोई खास जाति, कास्ट के व्यक्ति नहीं होते हैं । गुरु तो वही होता है जिसे देखने पर हमें ईश्वर याद आये,  जिसे देखने पर माँ जगदम्बा के चिँतन की तरफ उत्सुकता हो ।

आप तो अपने कहीं , किसी भी पीठ में चाहे जड़ हो या चेतन हो, उसमें गुरुपीठ स्थापित करके, उस गुरुत्व आकर्षण की तरफ खिंचा सकते हैं । पर कभी स्थापित ही नहीं किये हों तो उस गुरुत्व के आकर्षण की तरफ आप जा भी नहीं सकते । भले आप ब्रह्मा, विष्णु, शिव या बहुत बड़े व्यक्ति भी हो सकते हैं । मगर अपनी निजी जो प्राणमयी भगवती हैं, उनके साथ आपकी तन्मयता नहीं हो सकती ।"