मंगलवार, जून 02, 2015

अघोर वचन - 32

" यदि कोई ऐसे संत मिलें जो थिर हों, भक्तिपूर्ण हों, अपने अभ्यन्तर की चेतना के प्रकाश के प्रति जागृत हों, तृप्त हों, जिनकी बुद्धि पर पोथी नहीं लदी हो, सरल हों सु - भाव में, ऐसे व्यक्ति का उसी प्रकार अनुसरण करें जैसे गौ के बछड़े अपनी माँ गाय का अनुसरण करते हैं ।"
                                                         ०००

इस वचन में कही गई बातों, स्थितियों की जानकारी पाना या परीक्षा करना एक सामान्य मनुष्य के लिये असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है । उसे जब स्थिरत्व की न तो अनुभव है और न जानकारी ही है तो कैसे जाने कि संत महाराज थिर हैं कि नहीं । अभ्यंतर की चेतना का प्रकाश तो और भी सूक्ष्म है और जानना उतना ही कठिन भी । हाँ संत के स्वभाव तथा पोथी के विषय में कही गई बातों को संत का साथ करके, गहन निरीक्षण से किसी हद तक जाना जा सकता है । पहचाना जा सकता है ।

आज जो संत बहुप्रचारित, बहुश्रुत और प्रसिद्ध हैं उनकी बुद्धि पर लदी हुई पोथी दूर से ही दीखती है । उनका मूल्याँकन उनके शास्त्र ज्ञान से ही किया जाता है । उनका आडंबर पूर्ण प्रवचन, कौतुक पूर्ण व्याख्यान तथा अनुसरण करने की कठिनाईयाँ उनका सरल नहीं होना दर्शाती हैं । सु भाव के विषय में तो कुछ कह पाना यथार्थ की जगह आरोपित ही अधिक रहता है ।

उक्त कठिनाईयों के हल के लिये हमें कुछ बातों का ख्याल रखना होगा । पहला यह कि जिन किन्ही के विषय में हम जानना चाहते हैं वे प्रवचनकार या व्याख्याकार न होकर संत होना चाहिये । संत शास्त्र की नहीं अनुभव की बात करते हैं । शास्त्र में उनकी बातों का विवरण मिल जाय ऐसा हो भी सकता है । दूसरा यह कि संत को शिष्य बनाने, प्रचारित होने या ज्ञान बघारने की उत्कँठा नहीं होती । तीसरा यह कि संत के समीप जाने मात्र से मन थिर होने लगे, शाँति का अहसास हो और ईश्वर की याद आये । चौथा और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि हमारा अभ्यँतर यह कहने लगे कि यही वे हैं जिनकी मुझे खोज है ।

इन सब गुणों से युक्त व्यक्ति को गुरू के रूप में ग्रहण करना चाहिये । उनका संग साथ करना चाहिये । उनका अनुसरण करना चाहिये । श्रद्धा करना चाहिये । पूजा करनी चाहिये ।
                                                                                  ०००



गुरुवार, मई 28, 2015

अघोर वचन -31

" जगत के किसी भी नाशवान पदार्थ, यहाँ तक कि पार्थिव शरीर तक से जिसको अनभिज्ञता हो जाय उसे ही सहज समाधि, स्वात्मा, अज्ञात और बोधमय चित्त की उपलब्धि होती है । बोधमय चित्त में फिर कोई, किसी का चिंतन नहीं होता । उसमें चित्त ही चित्त का चिंतन करता है । यह अवस्था प्राप्त करने पर इस पार्थिव शरीर में अपने आप कुंठित कंठ से धुन उत्पन्न होने लगती है, तरंगें उत्पन्न होने जगती हैं, इन्द्रियाँ निगृहित हो जाती हैं और मस्तिष्क के शुष्क तंतु जागृत हो उठते हैं ।"
                                                    ०००

जगत में जितने भी पदार्थ हैं सभी नाशवान हैं । महाप्रलय में यह धरती, ग्रह, नक्षत्र सभी का नाश हो जाता है । मनुष्य अपना शरीर सामान्यतः 70 से 100 वर्षों के भीतर छोड़ देता है ।

अनभिज्ञता को समझने के लिये एक कथा सुनते हैं । महर्षि व्यास पुत्र सुकदेव घर छोड़कर अरण्य जाने लगे । पुत्र मोह में व्यास जी घर लौटने के लिये गुहार लगाते उनके पीछे दौड़े । सुकदेव आगे आगे व्यास देव पीछे पीछे । आगे एक तालाब था जिसमें युवा कन्यायें वस्त्रहीन होकर स्नान कर रही थीं । सुकदेव अपने में मस्त उस तालाब से आगे निकल गये । कन्यायें यथावत स्नान करती रहीं । जब महर्षि व्यास तालाब के पास पहुँचे तो कन्याओं ने झट दौड़कर वस्त्र उठा लिया और अपने शरीर को ढ़ँक लिया । कन्याओं को ऐसा करते देखकर महर्षि व्यास जी ने पूछा कि उनके इस व्यवहार का क्या कारण है । उन कन्याओं ने कहा कि सुकदेव जी इस संसार से अनभिज्ञ हैं । उन्हें तो स्त्री और पुरूष के भेद का भी नहीं पता, जबकि आपकी स्थिति ऐसी नहीं है । इसलिये हमने ऐसा व्यवहार किया । सुकदेव जी सहज समाधि में निमग्न रहते थे । संसार से अनभिज्ञ थे ।

अनभिज्ञता की स्थिति की प्राप्ति के लिये उपाय के रूप में संत कबीर दास जी ने इस प्रकार कहा है ।
" तनथिर मनथिर सुरतनिरतथिर होय ।
कह कबीर इस पलक को, कलप न पावे कोय ।।"

साधक जब आसनस्थ होकर शरीर को स्थिर कर लेता है, मन को विक्षेपों से अलग हटाकर एक लक्ष्य पर स्थिर करता है और स्मृति को गुरू प्रदत्त मँत्र में लगाकर स्थिर हो जाता है तब उसे न तो यह संसार भाषता है और न शरीर की ही सुध बुध रह जाती है । तभी अनभिज्ञता घटित होती है ।
                                                                   ०००



  

सोमवार, मई 25, 2015

अघोर वचन -30

" देवता का आगमन.......पहले अपने में उसका आविर्भाव होता है । अपना मन खुद ही महसूस कर लेता है । हाँ ! यह ऐसा ही होगा, हो जायेगा । पहले ही महसूस कर लेता है । जब अपना मन महसूस नहीं करता है तब आप सोचिये कि कहीं मुझमें त्रुटि है । और उस त्रुटि के कारण मुझे बहुत दूर दिख रहा है, अन्धकार दिख रहा है । वह त्रुटि मैं कैसे सुधारूँ ? यह अपने उन महाजनों से पूछिये ।"
                                                     ०००

धरती के सभी मनुष्य उस अज्ञात को अपनी भाषा में कोई नाम देकर, कल्पना के रँगों से रँगा हुआ कोई आकार देकर, निराकार मानकर भी अनेक गुण आरोपित कर, आदि नाना प्रकार से जानते है, मानते हैं, पूजते हैं, प्रार्थना करते हैं । इस प्रकार की क्रियाओं में शरीर तो नियुक्त रहता ही रहता है, धन भी लगता है और समय भी लगता है । जहाँ कहीं भी किसी मनुष्य पर उस अज्ञात की कृपा बरसती है तो उसे मालुम चल जाता है । उसके मन में कुछ अलग प्रकार का अनुभव होने लगता है । सबकुछ सुहावना सा हो जाता है । गुनगुनाने का मन करता है । नाचने का मन करता है । एकाँत में रहने का मन होता है । उस समय वह बिल्कुल नहीं सोचता कि लोग क्या कहेंगे । मैं कैसा दिख रहा हूँ । उसे समय, काल आगा, पीछा, सुन्दर असुन्दर कुछ भी तो नहीं सूझता । यह सब दिव्यत्व का आविर्भाव होने से होता है ।

अधिकाँश मनुष्य में दिव्यत्व का आविर्भाव नहीं होता या वह जान नहीं पाता । अघोरेश्वर कहते हैं हर मनुष्य में इसकी पूरी संभावना मौजूद है कि उस अज्ञात का, दिव्यत्व का आविर्भाव हो, तभी तो वे कहते हैं कि यदि कोई ऐसा महसूस नहीं करता तो वह समझे कि उसमें, उसकी पूजा में, प्रार्थना में कहीं कोई त्रुटि है ।

अपनी त्रुटि मनुष्य को खुद पहचाननी होती है । उसे भगवत तत्व दूर दिखता है । चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार दिखता है । मुँह से प्रार्थना के रटेरटाये बोल फूटते रहते है और दृष्टि कहीं होती है तो मन कहीं और होता है । फूल चढ़ाना, दीप दिखाना, घन्टी बजाना या शँख फूकना रोज के नियम की तरह निपटाये जाते हैं व्यक्ति उस समय कहीं और होता है । जाप करते समय ध्यान सुमेरू की तरफ लगा रहता है कि कब आये । दिखावा एक ऐसा तत्व है जो हमारी पूजा, प्रार्थना में अनिवार्य रूप से उपस्थित होता है । ये सब अपनी त्रुटियाँ हैं जो हमें नहीं दिखती ।

यदि मनुष्य अपनी त्रुटियाँ पहचान लेता है तो सुधार के लिये उसे संत, महात्माओं के निकट बैठकर सीखना चाहिये ।
                                                                ०००   

शनिवार, मई 23, 2015

अघोर वचन- 29

"जब किसी काम को होना होता है तो उसका पहला एक लक्षण, दो लक्षण अपने सामने से गुजर जाता है । हम मार्क करें तो हम यह समझ सकते हैं कि अब उसका आगमन होने वाला है, और सचेत हो जाँय, और सचेत हो जाँय । और नहीं यदि हम ऐसे ही गुमराह में पड़े हैं तो गुमराह में पड़े रहेंगे ।"
                                                             ०००

मनुष्य विशेष करके गृहस्थ के जीवन में अनेक काम बड़े महत्व के होते हैं जैसे बच्चों की शिक्षा, शादी, मकान बनाना, आदि आदि । व्यक्ति पहले किसी काम के होने की कामना करता है, फिर प्रयत्न । कभी काम सध जाता है कभी नहीं सधता । वचन में कहा गया है कि हम थोड़ा स्थिर चित्त होकर घट रही घटनाओं पर ध्यान दें, संयोगों को पहचानने के लिये सचेष्ट हों तो जब काम को होना होता है तब उसके आसार दिखने लगते हैं । ऐसा संयोग बनता चला जाता है कि काम यथासमय पूर्ण हो जाता है । हम साधारणतः इन लक्षणों को, संयोगों को कभी पहचान पाते हैं और कभी नहीं पहचान पाते । स्थिर चित्त होंगे तो पहचानने लगेंगे ।

भगवत भक्त, साधक के जीवन में साधना के कई पड़ाव होते हैं । वही उसका काम है । जब गुरू कृपा या भगवत कृपा साधक पर होने वाली होती है तो उसके लक्षण पहले ही प्रकट होने लगते हैं । साधक का हृदय उल्लास से भरने लगता है । बिघ्न बाधायें दूर भाग जाती हैं । उपासना में मन रमने लगता है, आदि । साधक इन लक्षणों को देख समझ कर सचेत हो जाता है । वह जान जाता है कि उस अज्ञात की कृपा उस पर होने ही वाली है । वह धन्य हो उठेगा ।

काम के सधने में इस प्रकार की जानकारी का बड़ा महत्व है । कभी कभी जब काम होने वाला ही होता है हम अनजाने में वापस हो लेते हैं, काम को छोड़ देते हैं, प्रयत्न में शिथिलता आ जाती है और होने वाला काम भी नहीं होता । जब मनुष्य लक्षण पहचान लेता है, वह प्रयत्न में और भी अधिक गँभीरता से जुट जाता है । उसे छोड़ता
नहीं ।
                                                              ०००

गुरुवार, मई 21, 2015

अघोर वचन - 28

" वह पूर्ण विश्वास दे कि तुम्हें मैं अपनाया, और तुम अपना ही हमें भी मानो, और हम, जो तुम में है, उसे ही समझो । वही मेरी आत्मा, वह है । जो इस तरह करने के लिये मुझे बाध्य कर के इस विशेष अवस्था तक पहँचाया, जब इतना हो जाता है तब उसका दुलार, प्यार, लाड़ और वह आनन्द और वह सुख विभोर होता है । उसे कहा जाता है अवधूत, सन्त, महात्मा, महापुरूष ।"
                                                       ०००

यह वचन आध्यात्मिक साधना की सम्पूर्ण क्रिया विधि का विवरण समेटे हुये है । गुरू के समक्ष शिष्य के समर्पण करने से लेकर संत में रूपान्तरित होने तक की त्रुटिहीन प्रक्रिया का आलेखन अघोरेश्वर जैसे अधिकारी पुरूष द्वारा ही संभव है । जो जिस राह चला हो वही उस रास्ते का हाल बता सकता है । उसके अवरोधों, कठिनाईयों, आलोक या अँधकार का विवरण देकर मार्गदर्शन कर सकता है । ऐसा ही मार्गदर्शन साधक को सिद्ध और फिर महापुरूष बनने में सहायक होता है । अघोरियों में एक कहावत प्रचलित है कि गुरू शिष्य नहीं बनाता, वह तो गुरू बनाता है ।

श्रद्धालु जब अवधूत, संत, महात्मा के समक्ष ज्ञान के लिये निवेदन करता है तब दीक्षा देकर गुरू रूप में वे विश्वास देते हैं कि वे शिष्य के अपने हैं । यहाँ गुरू शिष्य की आत्म स्थिति एकीकरण की ओर बढ़ती है । गुरू आगे स्पष्ठ करते हैं कि हे ! शिष्य हम ही तुममें हैं । तुम कोई और नहीं हो । यह अद्वैत की स्थिति है । आगे है कि तुममें जो मैं, आत्मा के रूप में हूँ, उसी को तुम्हें समझना है । जानना है । मानना है ।

गुरू, शिष्य के हृदय में स्थापित हो जाता है । यह स्थापना शिष्य को हर समय सचेत करती रहती है । शिष्य कभी भी अपने को अपने ईष्ट से, अपने देवता से दूर नहीं पाता । उसके लिये सब कुछ आसान हो जाता है । धीरे धीरे उसके संचित संस्कारों का क्षय होता जाता है और वह परमानन्द में डूबकर सुखविभोर हो जाता है । इसी स्थिति को कहते हैं अवधूत, सन्त, महात्मा और महापुरूष ।
                                                                ०००

मंगलवार, मई 19, 2015

अघोर वचन - 27

"पाप के हटने ना हटने से, पुन्य के उदय होने न होने से जीव का उद्धार हो जाय सो समझ में नहीं आता । पूर्णतः मान्य नहीं होता । पूर्णतः मान तो तभी होता है कि उस अज्ञात के साथ वार्तालाप हो, पहुँचें, मिलें, मिलने के बाद देखा देखी हो, देखा देखी के बाद वह के पास हम बैठें और वह मुझे बैठावे, और इसको क्या कहते हैं... उपासना । उप्य आसन ।"
                                           ०००

तीन बातें हैं । पाप, पुन्य और उद्धार । संसार के सभी धर्मों में किसी ना किसी नाम, रूप से ये तीनों बातें पाई जाती हैं । कहा जाता है कि पापी का उद्धार नहीं होता, उद्धार के लिये पुन्यात्मा होना जरूरी है । अब यह कौन बताये कि मनुष्य का उद्धार कैसे होगा, क्या करना होगा, पाप कैसे हटे, पुन्य कैसे उदय हो, आदि आदि । इसका उत्तर तो उद्धारकर्ता ही दे सकता है और उद्धारकर्ता है वह अज्ञात, परमेश्वर ।

अघोरेश्वर साफ साफ कहते हैं कि पाप और पुन्य का मनुष्य के उद्धार में कोई सरोकार नहीं है । पाप न करने भर से किसी का उद्धार होने से रहा । पुन्य एकत्र करके कोई उद्धार हो लेगा सही नहीं लगता क्योंकि दोनों ही स्थितियों में उद्धारकर्ता वह ईश्वर अनुपस्थित है । उद्धार करना नहीं करना उसी का निर्णय है ।

वचन कहता है कि मनुष्य का उद्धार तभी होता है जब वह उस अज्ञात, जो उद्धारकर्ता है, से मिले । अज्ञात से कैसे मिलें ? उपासना से । हमारी उपासना ऐसी हो कि उनके आसन के समीप हमारा भी आसन लगे और उन्हें हम साकार देखें, बात करें, उनके पास बैठें आदि आदि । परन्तु मनुष्य के लिये उस अज्ञात से ऐसा होना सम्भव नहीं दिखता । फिर क्या हो?

इसके लिये दो वाक्य की एक कविता कही गई है । " भजन तजन के मध्य में हम करें विश्राम । हमारी भजन राम करें, हम करें आराम ।" अर्थात उपासना के मध्य में ऐसी स्थिति बने कि अपने में ना कुछ उदय हो ना अस्त । स्वयँ को खो दें यानि विश्राँति में चले जाँय और हमारी जो उपासना है, भजन है वह करे हमारा आत्माराम । अब बात स्पष्ठ हो गई कि जब मनुष्य का आत्माराम भजन करेंगे तो वह अज्ञात अज्ञात नहीं रह जायेगा । और उस मनुष्य का उद्धार निसंदेह होना है ।
                                                                  ०००
  

रविवार, मई 17, 2015

अघोर वचन - 26

" शुद्ध मन जिन कार्यों की अनुमति नहीं देता, उन्हें ऐसे कार्यों के लिये मत मनाओ, मत उकसाओ, अन्यथा वह बोझिल एवँ दुस्सह हो उठेगा । अनुचित कार्यों के लिये मन पर दबाव डालने से मस्तिष्क पर कुप्रभाव पड़ेगा और कंठ कुण्ठित हो जायेगा ।"
                                                               ०००

विकार रहित मन शुद्ध मन कहा जायेगा । मन के मुख्यतः चार विकार कहे गये हैं । १, काम २, क्रोध ३, लोभ ४, मोह । मनुष्य का मन इन जैसे अनेक वृत्तियों से मिलकर बना है अतः मन अपनी वृत्तियों से रहित नहीं हो सकता । जब तक मन की ये वृत्तियाँ अपनी स्वाभाविक अवस्था में होती हैं तब तक ये विकार नहीं कहलाती । लेकिन जब मनुष्य काम, क्रोध, लोभ और मोह का दास हो जाता है । मन हर हमेशा इनकी चिन्ता में लगा रहता है, ये अस्वाभाविक रूप से उग्र हो जाते हैं और मनुष्य का सम्पूर्ण अस्तित्व उस वृत्तिमय हो जाता है तब मन शुद्ध नहीं रह जाता अशुद्ध कहा जाता है । ऐसा अशुद्ध हुआ मन मनुष्य को गलत रास्तों की ओर ले जाता है ।

मन की शुद्धि के लिये उससे लड़ने की जरूरत नहीं है । महापुरूषों, संतों ने इसके लिये दो उपाय बताये हैं ।

पहला यह कि हम जागरूक हों । मन के क्रियाकलापों पर दृष्टि रखें । ये वृत्तियाँ जब भी विकार का रूप ग्रहण करने लगें हम इन्हें पहचानें, देखें और विचार करें । इतना ही विकार के शमन के लिये पर्याप्त है ।  

दूसरा है मन को किसी लक्ष्य पर टिकाये रखना । इसके लिये अजपा जाप की विधि सर्वोत्तम है, हालाँकि सबके लिये यह सँभव नहीं होता । कई लोग स्वाँस पर मन को टिकाने, गुरू मँत्र का निरँतर जाप करते रहने और सद् वृत्तयों जैसे मैत्री, करूणा, मुदिता और उपेक्षा आदि को बढ़ावा देने की विधि भी बतलाते हैं ।

कोई भी कार्य, चाहे वह गलत हो या सही, को करने का कारण हमारा मन है । यही मन गलत सही का निर्णय भी करता है । हमें रोकता भी है । हमें टोकता भी है । वचन में यही कहा गया है कि जब भी मन रोके, टोके हम उस पर ध्यान दें । सही गलत को परखें । ना कि मन को ही मनाने लग गये । इससे मन जो सूक्ष्म है स्थूल होने लगेगा । बोझिल हो जायेगा । हम भ्रमित हो जायेंगे । हमारा मस्तिष्क इस अवस्था में अस्वाभाविक व्यवहार करने लगेगा जो निश्चय ही हमारे लिये शुभ नहीं हो सकता ।
                                                                 ०००